हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में बसा कुल्लू जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ साथ पौराणिक धरोहरों के लिए भी दुनिया भर में पहचाना जाता है। यहाँ की प्राचीन राजधानी नग्गर के ठावा क्षेत्र में स्थित राधा-कृष्ण मंदिर सदियों से भक्तों की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। पूरे देश में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पावन पर्व धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है, तब इस पहाड़ी धाम की आभा देखते ही बनती है। देश भर के कोने-कोने से आने वाले तीर्थयात्री और पर्यटक यहाँ पहुँचकर मुरली मनोहर के दर्शन करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन स्थल पर सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
द्वापर युग और पांडवों के अज्ञातवास की गाथा
इस दिव्य स्थल की स्थापना का इतिहास सीधे महाभारत काल से जुड़ता है। स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक परंपराओं के मुताबिक, द्वापर युग के दौरान जब पांडव अपने बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास में हिमालय की कंदराओं से होकर गुजर रहे थे, तब उन्होंने यहाँ कुछ समय बिताया था। उसी अज्ञातवास के समय पांडवों ने इस पावन पहाड़ी पर भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज मुरली मनोहर रूप की भव्य पाषाण प्रतिमा स्थापित की थी। नग्गर उस कालखंड में कुल्लू रियासत की पुरानी राजधानी हुआ करता था, जिस कारण इस धार्मिक स्थल का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व और भी अधिक बढ़ गया। सहस्राब्दियों से यह मंदिर हिमालय की गोद में निरंतर अपनी दिव्य ऊर्जा बिखेर रहा है।
मुरली की गूंज और माता राधा के विग्रह की स्थापना
मंदिर से जुड़ी एक अत्यंत विस्मयकारी और अलौकिक गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है। मंदिर के मुख्य पुजारी नीरज आचार्य बताते हैं कि शुरुआत में गर्भगृह में केवल भगवान श्रीकृष्ण की चतुर्भुज मूर्ति ही प्रतिष्ठित थी। उस दौर में कई बार ऐसी अचरज भरी घटनाएं घटीं जब सुबह पट खुलने पर भगवान की मूर्ति गर्भगृह से गायब पाई जाती थी। मूर्ति के अंतर्ध्यान होने के बाद मंदिर के आस-पास फैले घने देवदार और चीड़ के जंगलों से दिन-रात बांसुरी की अत्यंत मनमोहक धुनें गूंजती सुनाई देती थीं। श्रद्धालुओं और साधु-संतों का मानना था कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनन्य प्रिया राधा की तलाश में जंगलों में विचरण करते हैं।
लंबे समय तक चले इस रहस्यमयी सिलसिले को विराम देने के लिए तत्कालीन राजा प्रीतम सिंह के शासनकाल में एक विशेष सभा बुलाई गई। राजदरबार और विद्वानों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ माता राधा की प्रतिमा भी स्थापित की जानी चाहिए। विधिवत पूजन और अनुष्ठान के साथ जब गर्भगृह में राधारानी का विग्रह स्थापित किया गया, उसके बाद से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति का गायब होना सदा के लिए बंद हो गया। तब से आज तक यहाँ युगल रूप में श्रीराधा और श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है, और भक्त इस युगल छवि के दर्शन कर परम शांति पाते हैं।
परिसर में मौजूद चमत्कारी अर्जुन वृक्ष
मंदिर परिसर के बाहर खड़ा एक विशाल और प्राचीन वृक्ष भी श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का विषय है। सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी यह वृक्ष हमेशा हरा-भरा रहता है और साल के बारहों महीने फलों से लदा रहता है। जनमानस में यह दृढ़ विश्वास है कि यह कोई साधारण पेड़ नहीं, बल्कि पांडु पुत्र अर्जुन का साक्षात प्रतीक है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के परम सखा और भक्त अर्जुन ने यहाँ बैठकर कठोर तपस्या की थी, और बाद में वे स्वयं एक वृक्ष के रूप में रूपांतरित होकर भगवान के पहरेदार बन गए। इसी कारण श्रद्धालु इसे अर्जुन वृक्ष कहकर पुकारते हैं। मंदिर आने वाले भक्त मुख्य गर्भगृह में शीश नवाने के साथ साथ इस पवित्र वृक्ष की भी परिक्रमा करते हैं और इसे भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य रक्षक मानते हैं।
विदेशी सैलानियों में भारतीय भक्ति का आकर्षण
नग्गर का यह मंदिर केवल स्थानीय लोगों की श्रद्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए भी आत्मिक शांति का केंद्र बन चुका है। जन्माष्टमी के उत्सव पर यहाँ कई देशों के नागरिक पारंपरिक वेशभूषा में भजन-कीर्तन करते नजर आते हैं। स्पेन से यात्रा पर आईं मारिया बताती हैं कि पिछले वर्ष जब वे पहली बार यहाँ पहुँची थीं, तो भक्तों का अगाध समर्पण और यहाँ की अनूठी परंपराएं देखकर उनका हृदय भक्ति भाव से भर गया था। उनका कहना है कि यूरोप में आमतौर पर लोग धार्मिक स्थलों पर बहुत कम जाते हैं, लेकिन भारत में जन्माष्टमी के दौरान सैकड़ों लोगों को एक साथ सामूहिक कीर्तन और प्रार्थना में लीन देखना एक अद्भुत अनुभूति कराता है, जिससे जीवन में नई सकारात्मक ऊर्जा भर जाती है।
इसी तरह एक अन्य विदेशी श्रद्धालु अदिति ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि हिमालय की तलहटी में स्थित इस मंदिर का नैसर्गिक सौंदर्य और शांत परिवेश मानसिक तनाव को पूरी तरह मिटा देता है। यहाँ का वातावरण व्यक्ति को भीतर से स्थिर और शांत बना देता है।
उत्सवों की धूम और वृंदावन जैसा अनुभव
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर सुबह की मंगल आरती से लेकर मध्यरात्रि में कान्हा के प्राकट्य तक मंदिर में निरंतर संकीर्तन का प्रवाह बना रहता है। पूरे परिसर को रंग-बिरंगे फूलों, दीपों और पारंपरिक वस्त्रों से सजाया जाता है। स्थानीय श्रद्धालु सुरेखा और रमा ठाकुर बताती हैं कि नग्गर का यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है और यहाँ केवल जन्माष्टमी ही नहीं, बल्कि वर्ष भर के सभी प्रमुख हिंदू त्योहार बड़े उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। उनका कहना है कि जो शांति और अलौकिक आनंद मथुरा और वृंदावन की गलियों में महसूस होता है, ठीक उसी तरह का रूहानी सुकून नग्गर के इस पावन धाम में आकर प्राप्त होता है। हाल के वर्षों में शांति और आध्यात्मिकता की खोज में आने वाले विदेशी साधकों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की गई है।



















