फैशन की दुनिया में युवाओं के बीच स्टाइलिश और ट्रेंडी चश्मों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। धूप से बचाव के साथ-साथ यह व्यक्तित्व को निखारने का भी बड़ा जरिया बन चुका है। ऐसे समय में जब खुदरा बाजार में ट्रेंडी एक्सेसरीज की मांग तेजी से बढ़ रही है, तब फैंसी गॉगल्स का काम कम लागत में स्वरोजगार का एक बेहतरीन जरिया बनकर सामने आया है। इस व्यवसाय की सबसे बड़ी खासियत इसका लचीलापन है, जिसे बेहद सीमित पूंजी के साथ शुरू करके समय के साथ बड़े पैमाने पर विस्तारित किया जा सकता है। बोकारो के स्थानीय चश्मा कारोबारी दीपक ने इस काम के जमीनी तौर-तरीकों, निवेश, थोक खरीद और संभावित मुनाफे की पूरी रूपरेखा समझाई है।
शुरुआती निवेश और व्यापार का पैमाना
इस कारोबार में कदम रखने के लिए किसी भारी-भरकम पूंजी की अनिवार्यता नहीं होती है। व्यापारी दीपक बताते हैं कि करीब 20 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी लगाकर इसे छोटे स्तर पर आसानी से शुरू किया जा सकता है। यदि कोई उद्यमी शुरुआत से ही बड़े पैमाने पर दुकान खोलना चाहता है, तो उसे 50 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक की पूंजी की जरूरत पड़ सकती है। कुल लागत मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि काउंटर पर कितनी तरह की वैरायटी पेश की जा रही है। कम पूंजी से शुरुआत करने वाले लोग शुरुआती चरण में चुनिंदा और सबसे लोकप्रिय डिजाइनों के साथ काउंटर सजा सकते हैं।
दुकान के लिए सही जगह का चुनाव
किसी भी खुदरा व्यापार की तरह फैंसी गॉगल्स की बिक्री में भी दुकान की लोकेशन सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। दीपक के मुताबिक, दुकान के लिए ऐसी जगह चुननी चाहिए जहां दिनभर पैदल चलने वाले ग्राहकों की भारी आवाजाही रहती हो। भीड़भाड़ वाले मुख्य बाजार, कॉलेज या युवाओं के जमावड़े वाले इलाके इस काम के लिए सबसे मुफीद साबित होते हैं। सही लोकेशन पर दुकान होने से राह चलते ग्राहक खुद-ब-खुद आकर्षित होते हैं, जिससे दैनिक बिक्री की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
थोक माल की खरीद के प्रमुख केंद्र
दुकान के लिए सस्ता और आधुनिक डिजाइन का स्टॉक जुटाने के लिए कई बड़े थोक बाजार मौजूद हैं। व्यापारी दिल्ली, कोलकाता और आसनसोल जैसे प्रमुख थोक बाजारों से थोक भाव में गॉगल्स खरीद सकते हैं। इसके साथ ही धनबाद के स्थानीय बाजार से भी माल उठाने का विकल्प व्यापारियों के पास उपलब्ध रहता है। शुरुआत में दुकानदारों को उन डिजाइनों और मॉडलों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिनकी स्थानीय स्तर पर सबसे ज्यादा मांग रहती है। इससे शुरुआती पूंजी तेजी से घूमती है और बिना रुकावट के नया स्टॉक मंगवाने में मदद मिलती है।
गुणवत्ता जांच और ट्रेंड का तालमेल
ग्राहकों का भरोसा जीतने और बार-बार आने वाले ग्राहक तैयार करने के लिए चश्मों की गुणवत्ता और डिजाइनों का नया होना बहुत जरूरी है। व्यापारी दीपक सलाह देते हैं कि थोक में माल उठाते समय हर चश्मे की बारीकी से जांच करनी चाहिए। फ्रेम में किसी भी तरह की दरार, खरोंच, ढीलापन या ग्लास में खामी नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही सोशल मीडिया और बदलते फैशन के अनुरूप नया स्टॉक अपडेट रखना बेहद जरूरी है। सदाबहार काले चश्मों के अलावा अलग-अलग रंगीन फ्रेम, ट्रेंडी शेप और यूथ-ओरिएंटेड डिजाइनों का मिश्रण दुकान में होना चाहिए, जिससे हर पसंद का ग्राहक संतुष्ट हो सके।
लागत, दैनिक बिक्री और मासिक कमाई का गणित
मुनाफे के लिहाज से यह कारोबार काफी आकर्षक माना जाता है। दीपक के अनुसार, थोक खरीद और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक का सीधा मार्जिन आसानी से मिल जाता है। 20 हजार रुपये की शुरुआती लागत में करीब 300 से 500 पीस तक चश्मों का शुरुआती स्टॉक तैयार हो जाता है। यदि कोई दुकानदार रोजाना 15 से 20 चश्मे बेचने में सफल रहता है, तो प्रतिदिन 1000 से 1500 रुपये की बिक्री हो जाती है। इस औसत पर सामान्य दिनों में हर महीने 15 हजार से 20 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो सकती है। वहीं शादी-ब्याह के मौसम, त्योहारों और स्थानीय मेलों के दौरान मांग में भारी उछाल आने पर यह कमाई बढ़कर 30 हजार से 40 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंच सकती है।



















