सोने और चांदी पर लगने वाले आयात शुल्क में जल्द ही कमी की जा सकती है। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि क्या शुल्क दरों को मौजूदा स्तर से नीचे लाया जाए, क्योंकि भारी-भरकम लेवी लगाने के बावजूद आयात के आंकड़ों में कोई खास कमी दर्ज नहीं की गई है। इसके विपरीत, ऊंचे करों के कारण देश में अनौपचारिक यानी अवैध बाजार का दायरा काफी बढ़ गया है, जिससे सरकारी तिजोरी और औपचारिक कारोबार दोनों को नुकसान हो रहा है।
क्यों पड़ी शुल्क घटाने की जरूरत
जीम्स एंड ज्वैलरी काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकदे ने एक बातचीत में यह जानकारी दी है। सरकार ने पिछले साल मई में सोने और चांदी पर आयात शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर सीधे 15 फीसदी कर दिया था। इस सख्त कदम का मुख्य उद्देश्य देश में बुलियन के आयात पर लगाम कसना और देश के एक्सटर्नल अकाउंट यानी विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करना था। हालांकि, उद्योग जगत का मानना है कि इस योजना का वह असर देखने को नहीं मिला जिसकी उम्मीद सरकार कर रही थी।
बढ़ता अवैध कारोबार और आयात के आंकड़े
राजेश रोकदे के अनुसार, सोने का आयात इस भारी-भरकम बढ़ोतरी के बावजूद लगभग वैसा ही बना रहा। कानूनी माध्यमों से आने वाले सामान की लागत बढ़ जाने के कारण कारोबारियों और खरीदारों के लिए अनौपचारिक यानी ग्रे मार्केट के जरिए सोने की खरीद करना अधिक आकर्षक हो गया। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोने के उपभोक्ताओं में से एक है और यहां घरेलू उत्पादन बेहद कम होने के कारण आयात पर भारी निर्भरता है। देश में सोने की मांग मुख्य रूप से शादियों, त्योहारों, आभूषणों की खरीद और निवेश के उद्देश्यों से जुड़ी रहती है। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि देश का सोने का आयात बिल वित्त वर्ष 2026 में 24 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 71.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि इस दौरान आयात की मात्रा घटकर 721 टन ही रह गई। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की आसमान छूती कीमतों ने देश के आयात बिल पर कितना भारी असर डाला है।
आम खरीदारों और ज्वैलर्स पर असर
सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अनौपचारिक व्यापार को बढ़ावा दिए बिना आयात पर नियंत्रण कैसे रखे। यदि आयात शुल्क में कटौती की जाती है, तो सोने की लैंडेड कॉस्ट यानी भारत आने पर कुल लागत कम हो जाएगी, जिससे कानूनी और अवैध बाजार के बीच चल रहे दामों का अंतर भी कम होगा। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि खुदरा बाजार में सोने के भाव तुरंत उसी अनुपात में नीचे आ जाएंगे। देश के भीतर सोने की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय दामों, रुपये और डॉलर के विनिमय दर, स्थानीय करों और बाजार की अन्य परिस्थितियों पर भी निर्भर करती हैं। उपभोक्ताओं को इसका पूरा फायदा तभी मिलेगा जब ये सभी कारक अनुकूल रहेंगे। दूसरी तरफ, ज्वैलर्स के लिए कम शुल्क होने से औपचारिक माध्यमों से मिलने वाला सोना अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगा और अवैध विक्रेताओं को मिलने वाले फायदे को कम करने में मदद मिलेगी।



















