अमेरिकी आयात बाजार में स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों की आपूर्ति करने वाले भारतीय विनिर्माताओं के लिए व्यापार नियमों का एक नया संकट खड़ा हो गया है। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत से आने वाले सोलर सेल और मॉड्यूल पर भारी टैरिफ लगाने के अंतिम स्तर निर्धारित किए हैं। इस निर्णय के तहत भारतीय निर्यातकों पर 123.04 प्रतिशत का एंटी-डंपिंग मार्जिन और 126.09 प्रतिशत की काउंटरवेलिंग ड्यूटी लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है। भारत के नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण क्षेत्र को अब तक के सबसे कड़े व्यापारिक दबावों में से एक का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि घरेलू कंपनियों के लिए अमेरिका प्राथमिक विदेशी खरीददार रहा है।
घरेलू विनिर्माताओं की याचिका पर शुरू हुई कार्रवाई
यह कठोर कदम एलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड की ओर से दायर एक व्यापारिक शिकायत की विस्तृत जांच के बाद उठाया गया है। इस संगठन में फर्स्ट सोलर, हनव्वा क्यूसेल्स और मिशन सोलर एनर्जी जैसी प्रमुख विनिर्माण कंपनियां शामिल हैं। अमेरिकी संगठन ने औपचारिक आरोप लगाया था कि भारत के अलावा इंडोनेशिया और लाओस के विनिर्माता अपने उत्पादों को अमेरिकी बाजार में अनुचित रूप से बेहद सस्ते दामों पर बेच रहे हैं। इसके साथ ही इन विदेशी उत्पादकों को अपनी-अपनी सरकारों से व्यापक सब्सिडी मिल रही है, जिसके चलते अमेरिकी स्थानीय उद्योगपतियों को असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
इंडोनेशिया और लाओस पर भी लगे सख्त प्रतिबंध
अमेरिकी जांच अधिकारियों ने केवल भारतीय उत्पादों को ही नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को भी अपनी जांच के दायरे में रखा है। इंडोनेशियाई निर्यातकों के मामले में जांच एजेंसी ने 94.36 प्रतिशत का अंतिम एंटी-डंपिंग मार्जिन तय किया है, जबकि वहां के विभिन्न विनिर्माताओं के अनुसार काउंटरवेलिंग शुल्क की दर 73.2 प्रतिशत से लेकर 173.7 प्रतिशत तक रखी गई है। लाओस के उत्पादकों पर इन तीनों देशों में सबसे कम दरें लगाई गई हैं। लाओस स्थित कंपनियों के लिए 65.43 प्रतिशत का एंटी-डंपिंग मार्जिन तय हुआ है, वहीं उनकी सब्सिडी से जुड़ी काउंटरवेलिंग दरें 82.03 प्रतिशत से 153.67 प्रतिशत के बीच निर्धारित की गई हैं।
अंतिम मंजूरी के लिए अमेरिकी आयोग का निर्णय बाकी
हालांकि वाणिज्य विभाग के इस फैसले से अभी तुरंत यह शुल्क अंतिम रूप से लागू नहीं माना जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आयोग के हाथ में है। यह स्वतंत्र आयोग 14 अक्टूबर को अपना अंतिम फैसला सुनाने वाला है। आयोग यह तय करेगा कि क्या इन रियायती और सस्ते आयातों से वास्तव में अमेरिकी स्थानीय सोलर विनिर्माण उद्योग को वास्तविक नुकसान पहुंचा है। यदि आयोग का मतदान याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आता है, तो अमेरिकी वाणिज्य विभाग 2 नवंबर तक औपचारिक शुल्क आदेश जारी कर देगा।
भारतीय सोलर उद्योग और प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों पर प्रभाव
व्यापारिक दृष्टि से अमेरिका भारतीय सोलर कंपनियों का सबसे बड़ा विदेशी ग्राहक रहा है। वित्तीय वर्ष 2022-23 और वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान देश के कुल सोलर सेल और मॉड्यूल निर्यात का लगभग 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिकी बाजार में ही भेजा गया था। यही वजह है कि टैरिफ से जुड़े इस घटनाक्रम के बाद भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध सोलर कंपनियों के शेयरों पर निवेशकों की पैनी नजर रहेगी।
वारी एनर्जीज पर इस कदम का सबसे व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है, क्योंकि यह भारत की सबसे बड़ी सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल निर्माता कंपनी है और इसका अमेरिकी बाजार में काफी बड़ा कारोबार है। 11 सितंबर को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर कंपनी का शेयर 2,625 रुपये के स्तर पर बंद हुआ था। इस शेयर का 52 सप्ताह का उच्चतम स्तर 3,865 रुपये और न्यूनतम स्तर 2,403 रुपये रहा है, जबकि कंपनी का कुल बाजार पूंजीकरण लगभग 75,329 करोड़ रुपये है।
इसके अलावा प्रीमियर एनर्जीज और विक्रम सोलर जैसी अन्य बड़ी कंपनियों के शेयरों में भी तीव्र हलचल होने की संभावना जताई जा रही है। जब इस मामले में प्रारंभिक जांच और शुरुआती शुल्कों की घोषणा हुई थी, तब भी ये दोनों कंपनियां बाजार में भारी दबाव में आ गई थीं। विक्रम सोलर का लगभग 16 प्रतिशत राजस्व सीधे तौर पर निर्यात से आता है और उसकी कुल ऑर्डर बुक का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ा है, जिसके चलते अमेरिकी नीतिगत बदलावों का असर इस पर तेजी से पड़ता है। बाजार विशेषज्ञों की नजर वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज, सोलेक्स एनर्जी, सात्विक ग्रीन एनर्जी और बोरोसिल रिन्यूएबल्स जैसी कंपनियों पर भी बनी रहेगी।



















