टाटा समूह की शीर्ष नियंत्रक कंपनी टाटा संस के शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने को लेकर विनियामक मोर्चे पर बड़ी हलचल देखने को मिली है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने कोर इनवेस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपना पंजीकरण वापस सौंपने के कंपनी के आवेदन को अस्वीकार कर दिया है। केंद्रीय बैंक के इस कदम के बाद समूह की मुख्य होल्डिंग फर्म के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाई गई सख्त वित्तीय व्यवस्था के तहत ऊपरी श्रेणी की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए निर्धारित नियम अब सीधे तौर पर टाटा संस पर लागू हो रहे हैं।
सीआईसी दर्जे से बाहर निकलने की कोशिश क्यों हुई खारिज
टाटा संस ने अपनी वित्तीय देनदारियों और कर्ज़ को कम करने के लिए कई अहम कदम उठाए थे। कंपनी का प्राथमिक उद्देश्य कोर इनवेस्टमेंट कंपनी के ढांचे से बाहर निकलना था, ताकि विनियामक नियमों के भारी भरकम बोझ से राहत मिल सके। कंपनी का मानना था कि सीआईसी पंजीकरण सरेंडर करने से उस पर लागू होने वाले कड़े अनुपालन नियम सीमित हो जाएंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस अर्ज़ी को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया, जिससे कंपनी के सामने सूचीबद्धता की विनियामक बाध्यता जस की तस बनी हुई है।
केंद्रीय बैंक ने बड़े वित्तीय संस्थानों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को स्केल आधारित विनियामक ढांचे में विभाजित किया हुआ है। इस व्यवस्था के अंतर्गत टाटा संस को ऊपरी स्तर यानी अपर लेयर की एनबीएफसी श्रेणी में रखा गया है। इस विशिष्ट स्तर में देश की ऐसी बड़ी और महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाओं को शामिल किया जाता है, जिनकी वित्तीय स्थिति देश की समग्र आर्थिक स्थिरता और प्रणालीगत जोखिम से सीधे जुड़ी होती है।
तीन साल की समयसीमा और अनिवार्य सूचीबद्धता का नियम
स्केल आधारित विनियामक ढांचे के नियमों के मुताबिक, जो वित्तीय संस्थान अपर लेयर श्रेणी में वर्गीकृत किए जाते हैं, उनके लिए तय समय सीमा के भीतर शेयर बाज़ार में लिस्टिंग कराना अनिवार्य होता है। इस श्रेणी में शामिल संस्थाओं को अनुपालन के लिए तीन वर्ष की तय अवधि दी जाती है। टाटा संस के लिए यह तीन साल की समयसीमा अब नज़दीक आ रही है, जिसके चलते सार्वजनिक निर्गम लाने का दबाव लगातार गहराता जा रहा है।
आमतौर पर टाटा संस को आम जनता से सीधे लेन-देन करने वाली या सार्वजनिक वित्तीय सेवाएं देने वाली कंपनी के रूप में नहीं देखा जाता है। इसके बावजूद केंद्रीय बैंक की वर्गीकरण प्रणाली का मुख्य आधार संस्थान का आकार, वित्तीय तंत्र में उसकी भागीदारी और उससे जुड़ा संभावित जोखिम होता है। यही मुख्य कारण है कि पारंपरिक तौर पर खुदरा कारोबार से दूर रहने के बावजूद टाटा संस के सार्वजनिक निर्गम का मामला विनियामक दायरे में प्रमुखता से बना हुआ है।
टाटा समूह के विशाल तंत्र में टाटा संस की केंद्रीय भूमिका
टाटा संस देश के सबसे पुराने और विशालतम कारोबारी समूहों में से एक, टाटा समूह की शीर्ष होल्डिंग इकाई है। इस कारोबारी समूह की मौजूदगी सूचना प्रौद्योगिकी, वाहन निर्माण, इस्पात, ऊर्जा, उपभोक्ता उत्पाद, होटल उद्योग, विमानन और वित्तीय सेवाओं जैसे अनगिनत क्षेत्रों में फैली हुई है। टाटा मोटर्स या टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज जैसी परिचालन कंपनियों के विपरीत, टाटा संस सीधे तौर पर ग्राहकों के साथ व्यापारिक गतिविधियां संचालित नहीं करती है।
टाटा संस की असली ताक़त और अहमियत समूह की प्रमुख सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में उसकी भारी हिस्सेदारी से आती है। यह कंपनी पूरे समूह के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक दिशा तय करने और कॉरपोरेट प्रशासन की देखरेख करने का केंद्रीय आधार है। टाटा संस के पोर्टफोलियो में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाइटन, टाटा पावर और इंडियन होटल्स जैसी बाज़ार में सूचीबद्ध दिग्गज कंपनियों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी शामिल है। ऐसे में टाटा संस के विनियामक दर्जे में होने वाला कोई भी फेरबदल समूचे टाटा समूह के वित्तीय ढांचे को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
आईएलएंडएफएस संकट के बाद बदले थे रिज़र्व बैंक के नियम
वित्तीय तंत्र में बड़े और एक-दूसरे से जटिल रूप से जुड़े संस्थानों की निगरानी को लेकर रिज़र्व बैंक ने अपने नियमों को वर्ष 2018 के बाद काफी कड़ा किया था। वर्ष 2018 में इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज यानी आईएलएंडएफएस के अचानक धराशायी होने से भारतीय वित्तीय बाज़ारों में भारी उथल-पुथल मच गई थी। उस घटना ने साफ दिखाया था कि किसी एक बड़े वित्तीय संस्थान का संकट किस प्रकार कर्ज़दाताओं, निवेशकों और समूचे वित्तीय बाज़ार में संक्रमण की तरह फैल सकता है।
इसी प्रणालीगत जोखिम से वित्तीय व्यवस्था को सुरक्षित रखने के मकसद से रिज़र्व बैंक ने स्केल आधारित विनियामक ढांचा पेश किया था। इस ढांचे के अंतर्गत एनबीएफसी को उनके आकार, व्यावसायिक गतिविधियों की जटिलता और वित्तीय जोखिम प्रोफाइल के आधार पर अलग-अलग परतों में बांटा गया। सबसे ऊपरी स्तर यानी अपर लेयर केवल उन्हीं संस्थाओं के लिए सुरक्षित रखा गया है, जिन पर अत्यधिक उच्च स्तरीय विनियामक निगरानी की आवश्यकता होती है। यह ढांचा संस्था की जटिलता, आकार और संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले उसके संभावित असर को प्राथमिकता देता है।
स्वामित्व का ढांचा और सार्वजनिक निर्गम की चुनौतियां
टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर बाज़ार और विशेषज्ञों की दिलचस्पी का एक और प्रमुख कारण इसका अनूठा शेयरधारिता पैटर्न है। कंपनी का अधिकांश मालिकाना हक़ टाटा ट्रस्ट्स के पास है, जो सामाजिक और परोपकारी कार्यों से जुड़ा निकाय है। इसके अलावा शेष हिस्सेदारी विभिन्न टाटा कंपनियों और अन्य शेयरधारकों में बंटी हुई है। यह ढांचा ऐतिहासिक रूप से एक बेहद करीबी और निजी दायरे में नियंत्रित कंपनी के तौर पर काम करता रहा है।
यदि कंपनी शेयर बाज़ार में उतरती है, तो सार्वजनिक हिस्सेदारी के प्रतिशत, कंपनी के समग्र मूल्यांकन और लिस्टिंग के बाद टाटा ट्रस्ट्स की विनियामक स्थिति को लेकर कई अहम सवाल सामने आएंगे। ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक रूप से कारोबार न करने वाली इस मुख्य होल्डिंग कंपनी में आम निवेशकों का नया वर्ग तैयार होगा, जो समूह के संचालन ढांचे में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है।



















