अंतरराष्ट्रीय सराफा बाजार में सोने की चमक एक बार फिर फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। अमेरिका में उपभोक्ता महंगाई के अनुमान से ज्यादा गर्म आंकड़े सामने आने के बाद निवेशकों के बीच यह अंदेशा गहरा गया है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रुख अपना सकता है। इस ताजा मौद्रिक दबाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव लगभग 4,340 डॉलर प्रति औंस के करीब आ गया है। पीली धातु के लिए यह लगातार चौथा हफ्ता कमजोरी भरा साबित हो रहा है, क्योंकि इससे पहले भी लगातार तीन हफ्तों तक इसमें गिरावट दर्ज की गई थी। ऐसे हालात में बाजार में हर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि मौजूदा गिरावट महज एक अस्थायी सुधार है या सोने की ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ रैली अब अपनी रफ्तार खो चुकी है।
महंगाई के आंकड़ों ने बदला ब्याज दरों का गणित
कीमती धातुओं के बाजार में यह ताजा हलचल अमेरिका के महंगाई के ताजा आंकड़ों के सार्वजनिक होने के बाद शुरू हुई है। अगस्त के महीने में खाद्य और ऊर्जा की अस्थिर कीमतों को हटाकर आंकी जाने वाली कोर उपभोक्ता महंगाई दर में महीने-दर-महीने आधार पर 0.3% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस आंकड़े ने वित्तीय दुनिया के उन विश्लेषकों की चिंताओं को फिर से जिंदा कर दिया है, जिनका मानना था कि अर्थव्यवस्था से महंगाई को पूरी तरह खत्म करना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। जब महंगाई लगातार जिद्दी बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंकों के पास सख्त कदम उठाने के अलावा कम विकल्प बचते हैं।
सोने के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि भौतिक सोना अपने धारकों को कोई नियमित ब्याज या लाभांश नहीं देता है। वित्तीय बाजारों का यह बुनियादी नियम है कि जब केंद्रीय बैंक नीतिगत ब्याज दरें बढ़ाते हैं और सरकारी बॉन्ड यील्ड में उछाल आता है, तो निवेशकों का रुझान ब्याज देने वाले सुरक्षित वित्तीय साधनों की तरफ बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में गैर-उपज वाली संपत्ति जैसे सोने को अपने पास रखने की अवसर लागत काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि ताजा आंकड़ों के बाद फेडरल रिजर्व द्वारा दर वृद्धि की संभावना तेजी से बढ़ी है और बुलियन पर सीधा बिकवाली का दबाव देखा जा रहा है।
कच्चे तेल की तपिश और भू-राजनीतिक तनाव
सोना इस समय केवल ब्याज दरों के सीधे दबाव का ही सामना नहीं कर रहा है, बल्कि ऊर्जा बाजार की जटिलताएं भी स्थिति को बिगाड़ रही हैं। मध्य पूर्व में नए सिरे से उभरे भू-राजनीतिक संकट और दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था में विनिर्माण, ढुलाई और सामान्य कारोबारी लागत को सीधे तौर पर बढ़ा देती हैं, जिससे व्यापक स्तर पर महंगाई भड़कने का खतरा पैदा हो जाता है।
यह पूरा घटनाक्रम फेडरल रिजर्व के नीति निर्माताओं के लिए एक असहज और पेचीदा स्थिति पैदा कर रहा है। यदि महंगे तेल के कारण महंगाई ऊंचे स्तर पर टिकी रहती है, तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक के पास दरों में कटौती करने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं, केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति को और अधिक कड़ा करने के बारे में सोचना पड़ सकता है। हालिया कारोबारी सत्रों में यह संबंध बिल्कुल साफ दिखा है कि जैसे ही महंगे तेल ने सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदों को हवा दी, सोने की कीमतों पर फौरन नकारात्मक असर पड़ा।
लंबी अवधि के रुझान और सहायक कारक
हालांकि, सोने की कहानी केवल ब्याज दरों के समीकरण तक ही सीमित नहीं है। जानकारों का मानना है कि पीली धातु को कई मजबूत बुनियादी कारकों से सहारा मिल रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर बनी गहरी चिंताएं, विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की लगातार की जा रही भारी खरीदारी और सुरक्षित निवेश के रूप में निवेशकों का भरोसा अभी भी बना हुआ है। इसके अलावा भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं भी सोने को नीचे के स्तरों पर सुरक्षा प्रदान कर रही हैं।
इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में की जाने वाली किसी भी संभावित बढ़ोतरी से सोने को अल्पावधि में झटका तो लग सकता है, लेकिन इससे इसके व्यापक और दीर्घकालिक तेजी के रुझान का अंत होना तय नहीं है। कई बाजार विश्लेषकों का आकलन है कि मौजूदा बाजार भावों में फेडरल रिजर्व के संभावित कदमों का बड़ा हिस्सा पहले ही समाहित हो चुका है। ऐसे में निवेशकों की निगाहें केवल ब्याज दर के अंतिम फैसले पर टिकने के बजाय इस बात पर अधिक केंद्रित रहेंगी कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक भविष्य के नीतिगत कदमों और दिशा को लेकर क्या संदेश देता है।
भारतीय खरीदारों के लिए रुपया और डॉलर का पेच
भारत में सोने के निवेशकों और आभूषण खरीदारों के लिए वैश्विक बाजार के अलावा एक और महत्वपूर्ण पहलू काम करता है, जिसे डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की चाल कहा जाता है। चूंकि भारत अपनी सोने की अधिकांश खपत का आयात करता है, इसलिए घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय हाजिर कीमतों की हूबहू नकल नहीं करती हैं। विनिमय दर में होने वाला कोई भी उतार-चढ़ाव घरेलू स्तर पर सोने के भावों को काफी हद तक नियंत्रित करता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव अल्पकाल के लिए गिरते भी हैं, तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि भारतीय खुदरा बाजार में आभूषणों, सिक्कों या बार की कीमतों में भी उसी अनुपात में भारी गिरावट आ जाएगी। ऐतिहासिक ऊंचाई छूने के बाद अब बाजार में उतार-चढ़ाव का एक लंबा दौर देखने को मिल सकता है। भारतीय निवेशकों के लिए सोना एक संतुलित और विविध पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बना रहेगा, लेकिन एकतरफा तेज उछाल के बजाय अब दोनों तरफ के उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना समझदारी होगी।
निवेशकों के लिए आगामी तीन बड़े कारक
आने वाले दिनों में सोने की चाल को परखने के लिए निवेशकों को तीन प्रमुख घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखनी होगी
- फेडरल रिजर्व का रुख: अमेरिकी केंद्रीय बैंक की आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक और भविष्य की ब्याज दरों को लेकर उसका आधिकारिक मार्गदर्शन सबसे निर्णायक साबित होगा।
- अमेरिकी महंगाई के आंकड़े: यदि अमेरिका में मुद्रास्फीति लगातार जिद्दी बनी रहती है, तो लंबे समय तक ऊंची दरों की आशंका सोने पर लगातार दबाव बनाए रखेगी।
- कच्चा तेल और वैश्विक तनाव: तेल की कीमतों में नया उछाल महंगाई का डर तो बढ़ाएगा, लेकिन लंबे समय तक खिंचने वाला भू-राजनीतिक तनाव सोने को एक सुरक्षित आश्रय के रूप में नया समर्थन भी दे सकता है।



















