कुणाल खेमू के निर्देशन में तैयार हुई फिल्म 'वाइब' का यह विस्तृत 'वाइब रिव्यू' उन सभी पहलुओं की पड़ताल करता है जो इसे पहले हिस्से में मनोरंजक और दूसरे हिस्से में कमजोर बनाते हैं। बतौर निर्देशक अपनी दूसरी सिनेमाई प्रस्तुति में कुणाल खेमू ने एक्शन, सस्पेंस, याराना, देशभक्ति और परिस्थितिजन्य हास्य का एक अनूठा संगम रचने का प्रयास किया है। कुणाल खेमू, स्पर्श श्रीवास्तव और प्रीति जिंटा जैसे कलाकारों से सजी इस कहानी की शुरुआत बेहद तेज गति और चुटीले संवादों के साथ दर्शकों को कुर्सी से बांधे रखती है। हालांकि, मध्यांतर के बाद उलझाव भरी पटकथा और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले शुरुआती उत्साह को ठंडा कर देता है, जिससे यह रचना कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की थ्रिलर कॉमेडी बनकर सिमट जाती है।
कहानी का ताना बाना और आतंकवाद का संकट
पूरी पटकथा हार्दिक के चरित्र के इर्द गिर्द घूमती है, जिसकी भूमिका खुद कुणाल खेमू ने निभाई है। हार्दिक नशामुक्ति केंद्र से बाहर निकलने के बाद अपने जीवन को एक नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। उसके इस सफर में उसका सबसे पक्का दोस्त भागीरथ उर्फ बग्स, जिसे स्पर्श श्रीवास्तव ने जीवंत किया है, कंधे से कंधा मिलाकर साथ देता है। बग्स के सहयोग से हार्दिक को एक आईटी फर्म में नौकरी हासिल होती है, जिससे दोनों को लगता है कि जिंदगी अब पटरी पर आ जाएगी। तभी अचानक एक बड़ा मोड़ आता है जब पूरे मुल्क पर एक बड़े आतंकवादी हमले का साया मंडराने लगता है।
अनजाने में ही सही, हार्दिक और बग्स दोनों सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस गहरे संकट के बीचों बीच फंस जाते हैं। इसी महत्वपूर्ण मोड़ पर कहानी में मैडम एच का प्रवेश होता है, जिनका किरदार प्रीति जिंटा ने निभाया है। मैडम एच के नेतृत्व में यह दोनों साधारण युवा एक बेहद गोपनीय और जानलेवा सुरक्षा मिशन का हिस्सा बन जाते हैं। इंटरवल तक कथा बेहद दिलचस्प, चुस्त और मनोरंजक अंदाज में आगे बढ़ती है। दोनों दोस्तों के बीच की तीखी नोकझोंक, सिचुएशनल कॉमेडी और हल्के फुल्के रोमांचक तत्व सिनेमाघर में बैठे दर्शकों का पूरा ध्यान स्क्रीन पर बनाए रखते हैं। अफसोस की बात यह है कि मध्यांतर के बाद की कहानी उस निरंतर रफ्तार और ऊर्जावान वाइब को संभाल कर रखने में पूरी तरह विफल साबित होती है।
अभिनय का स्तर और कलाकारों की जुगलबंदी
अभिनय के मोर्चे पर कुणाल खेमू ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे हिंदी सिनेमा के सबसे अनदेखे मगर सबसे भरोसेमंद कलाकारों में से एक हैं। चाहे वह हास्य का सटीक टाइमिंग हो, भावुक क्षण हों या फिर एक्शन के तेज दृश्य, कुणाल ने अपने किरदार में शत प्रतिशत समर्पण दिखाया है। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह रही कि निर्देशक और मुख्य नायक की दोहरी जिम्मेदारी संभालने के बावजूद कुणाल ने अपने साथी कलाकारों को उभरने की पूरी आजादी दी। 'मिसिंग लेडीज' से पहचान बनाने वाले स्पर्श श्रीवास्तव ने बग्स के रूप में असाधारण काम किया है। कुणाल और स्पर्श के बीच की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री और आपसी तालमेल पूरी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है।
डेब्यूटेंट वंशिका धीर, जिन्होंने करीना का किरदार अदा किया है, अपने पहले ही प्रयास में भरपूर आत्मविश्वास के साथ पेश आई हैं और एक होनहार चेहरे के रूप में उभरती हैं। दूसरी ओर, लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही प्रीति जिंटा मैडम एच की भूमिका में दर्शकों को निराश करती हैं। कुछ दृश्यों में उनका अभिनय बहुत ज्यादा लाउड और अस्वाभाविक महसूस होता है, जो फिल्म के मिजाज से मेल नहीं खाता। भोजपुरी सिनेमा के जाने माने सितारे दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' और अनुभवी चरित्र अभिनेता यशपाल शर्मा ने अपनी संक्षिप्त भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। इसके अलावा पटकथा में कुछ मनोरंजक सरप्राइज कैमियो भी शामिल किए गए हैं जो बीच बीच में ताजगी लाते हैं।
निर्देशन और कमजोर लेखन का गणित
एक निर्देशक के रूप में कुणाल खेमू भारतीय कमर्शियल सिनेमा के दर्शकों की नब्ज अच्छी तरह पहचानते हैं। उन्होंने मनोरंजन के लिहाज से एक्शन, देशभक्ति की भावना, ड्रामा और ठहाकों का मसाला झोंकने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके बावजूद निर्देशन की सबसे कमजोर कड़ी फिल्म का लेखन साबित होती है। पहले हाफ में जहां हंसी और रोमांच का संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है, वहीं सेकंड हाफ शुरू होते ही हास्य पूरी तरह गायब हो जाता है। घटनाओं को बेवजह खींचा गया है और क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते इतनी सारी बातें एक साथ घटित होने लगती हैं कि फिल्म एक अनसुलझा रायता बन जाती है, जिससे दर्शक मुख्य विषय से भटक जाते हैं।
तकनीकी पक्ष: सिनेमैटोग्राफी और संगीत
तकनीकी पहलू की बात करें तो सिनेमैटोग्राफी एक ठेठ मनोरंजक बॉलीवुड फिल्म की आत्मा से भलीभांति मेल खाती है। एक्शन के दृश्यों को काफी बड़े पैमाने पर और गतिशीलता के साथ कैमरे में कैद किया गया है। आईटी दफ्तर की बनावट से लेकर गुप्त मिशन के हाई ऑक्टेन दृश्यों तक, कैमरावर्क साफ सुथरा और आकर्षक नजर आता है। रोशनी और रंगों का चयन फिल्म के चुलबुले और जीवंत टोन को मजबूती प्रदान करता है। विजुअल अपील के मामले में यह प्रस्तुति दर्शकों को निराश नहीं करती।
फिल्म का संगीत सामान्य स्तर का है और लंबे समय तक याद रखने लायक नहीं बन पाता। हालांकि शीर्षक गीत 'वाइब' काफी सुरीला और आकर्षक है, जो सिनेमाघर से बाहर आने के बाद भी जेहन में गूंजता रहता है। यह गीत युवा ऊर्जा और कहानी के मूड को सही ढंग से अभिव्यक्त करता है। एक्शन और कॉमेडी दृश्यों में बैकग्राउंड स्कोर कुछ जान फूंकने का काम जरूर करता है, लेकिन गानों के संपूर्ण एल्बम के लिहाज से यह फिल्म और बेहतर संगीत की हकदार थी।
बड़ी खामियां और अंतिम फैसला
कुछ प्रमुख कमियां इस रचना को एक बेहतरीन थ्रिलर कॉमेडी की श्रेणी में पहुंचने से रोकती हैं
- धीमा दूसरा हाफ: मध्यांतर के बाद फिल्म अपनी दिशा से भटक जाती है और स्क्रीनप्ले काफी सुस्त व ढीला पड़ जाता है।
- हास्य का अभाव: दूसरे हिस्से में कहानी इतनी गंभीर और पेचीदा हो जाती है कि शुरुआती दौर की सहज हंसी पूरी तरह गायब हो जाती है।
- लाउड किरदार: प्रीति जिंटा का किरदार सतही लिखा गया है और उनकी अदायगी काफी अस्वाभाविक लगती है।
- असंतुलित क्लाइमैक्स: अंतिम पलों में देशभक्ति, रोमांच और बदले जैसे ढेर सारे तत्वों को जबरन एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है, जिससे अंत का असर फीका हो जाता है।
'वाइब' टुकड़ों टुकड़ों में मनोरंजन परोसने वाली फिल्म है। यदि आप इसे देखने जाते हैं, तो पहला हिस्सा और कुणाल स्पर्श की जुगलबंदी निश्चित ही आपके चेहरे पर मुस्कान बिखेरेगी। मगर ढीला दूसरा हाफ और असंतुलित लेखन अनुभव को कमजोर कर देता है। इस फिल्म को न देखने पर भी कोई बहुत बड़ी सिनेमाई कृति छूटने का मलाल नहीं रहेगा। इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार दिए जाते हैं।



















