भारतीय सिनेमा में जब भी अंधविश्वास, तांत्रिक अनुष्ठान और लोककथाओं से जुड़े भय को पर्दे पर उतारा जाता है, तो दर्शकों का कौतूहल कई गुना बढ़ जाता है। इसी मनोवैज्ञानिक आकर्षण और अलौकिक रोमांच को केंद्र में रखकर निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा अपनी नई हॉरर-थ्रिलर फिल्म लेकर आए हैं। डिजिटल मंच पर रिलीज हुई 'झाड़ फूंक रिव्यू' के नजरिए से देखें तो यह प्रस्तुति उत्तराखंड की बर्फीली और सुनसान घाटियों की पृष्ठभूमि में एक ऐसी रूह कंपा देने वाली दास्तान बुनती है, जो दर्शकों को अंधकार और लोक विश्वासों की रहस्यमयी दुनिया में खींच ले जाती है। सुंबुल तौकीर खान, यशपाल शर्मा और पद्मिनी कोल्हापुरी जैसे मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी इस डरावने ताने-बाने को पर्दे पर गहराई देती है।
सड़क दुर्घटना और अनजान हवेली का गहरा रहस्य
कहानी की शुरुआत देवभूमि उत्तराखंड के बेहद शांत मगर डरावने पहाड़ी रास्तों से होती है। आस्था अपने साथी राजवीर के साथ एक तेज रफ्तार गाड़ी में सफर कर रही है। आस्था गर्भवती है और उसके मन में राजवीर के प्रति भारी आक्रोश है, क्योंकि राजवीर ने अपने परिवार के सामने उनके रिश्ते और शादी को लेकर अब तक कोई पहल नहीं की है। सफर के दौरान दोनों के बीच तीखी नोकझोंक चल रही होती है, तभी अचानक सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद अजीब और रहस्यमयी औरत उनकी कार के सामने आ धमकती है।
उस औरत को बचाने की हड़बड़ाहट में कार अनियंत्रित होकर सड़क किनारे एक विशाल पेड़ से जा टकराती है। यह टक्कर इतनी जबर्दस्त होती है कि दोनों गंभीर रूप से लहूलुहान होकर बेहोश हो जाते हैं। जब आस्था की आंखें खुलती हैं, तो वह खुद को अस्पताल के बजाय एक पुराने और अनजान मकान में बिस्तर पर पाती है। उसके सामने उस घर के मालिक मोहन ठाकुर और उनकी पत्नी कामिनी ठाकुर मुस्कुराते हुए चेहरे लिए खड़े दिखाई देते हैं।
होश में आते ही आस्था घबराकर राजवीर के बारे में पूछती है, लेकिन दंपती का जवाब उसके पैरों तले जमीन खिसका देता है। मोहन और कामिनी का कहना है कि जब उन्होंने दुर्घटनास्थल से उसे बचाया, तब कार में आस्था बिल्कुल अकेली थी और वहां कोई दूसरा व्यक्ति मौजूद नहीं था। मानसिक उलझनों से घिरी आस्था को पहले लगता है कि शायद शादी और बच्चे की जिम्मेदारी के डर से राजवीर उसे इस हाल में छोड़कर भाग निकला है। वह तुरंत दिल्ली लौटने का फैसला करती है, लेकिन मोहन और कामिनी उसकी नाजुक हालत और बाहरी खतरों का हवाला देकर उसे उसी मकान में रुकने पर मजबूर कर देते हैं।
मंजरी का साया और अजन्मे बच्चे पर मंडराता खतरा
उस अजनबी घर में समय बीतने के साथ ही आस्था को दीवारों के पीछे से डरावनी फुसफुसाहटें और खौफनाक आवाजें सुनाई देने लगती हैं। अनहोनी की आशंका से सिहर उठी आस्था जब अपने इस खौफ को ठाकुर दंपती से साझा करती है, तब जाकर उस मकान और उस इलाके का सबसे स्याह सच सामने आता है। मोहन और कामिनी खुलासा करते हैं कि कार के आगे आने वाली वह औरत कोई जीवित प्राणी नहीं, बल्कि मंजरी नाम की एक अभागी औरत का भटकता हुआ प्रेत है।
सालों पहले गांव के लोगों ने मिलकर गर्भवती मंजरी और उसके पेट में पल रहे बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी थी। दर्द और अपमान की आग में जलती हुई मंजरी ने मरते वक्त यह भयानक श्राप और कसम ली थी कि वह इस इलाके में किसी भी औरत की कोख से बच्चा पैदा नहीं होने देगी। अब आस्था एक ऐसे भयानक चक्रव्यूह में फंस चुकी है, जहां से बच निकलने का हर रास्ता बंद नजर आता है। क्या आस्था अपने अजन्मे बच्चे को उस प्रतिशोधी साये से सुरक्षित रख पाएगी, और आखिर उस मनहूस रात राजवीर का असल में क्या हुआ था, यह पूरी पहेली कहानी के अंतिम पड़ाव में जाकर सुलझती है।
कलाकारों का सधा हुआ प्रदर्शन
इस डरावनी पटकथा को जीवंत बनाने में फिल्म के सभी कलाकारों ने अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है। केंद्रीय पात्र आस्था के रूप में सुंबुल तौकीर खान ने बेहद जटिल और भावनात्मक रूप से थका देने वाली भूमिका को सहजता से निभाया है। एक भीषण हादसे के बाद अजनबियों के बीच लाचार पड़ी गर्भवती स्त्री का डर, अकेलापन, मानसिक तनाव और अपने बच्चे को हर हाल में बचाने की तड़प को सुंबुल ने अपनी आंखों और हाव-भाव से पर्दे पर बखूबी उतारा है।
अनुभवी अभिनेता यशपाल शर्मा ने मोहन ठाकुर के रहस्यमयी किरदार में कई शेड्स डालकर इसे बेहद प्रभावशाली बना दिया है। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी दर्शकों के मन में लगातार यह सवाल बनाए रखती है कि वह मददगार हैं या कोई साजिशकर्ता। वहीं पद्मिनी कोल्हापुरी का धीमा, शांत और रहस्य से भरा व्यवहार फिल्म के सस्पेंस को लगातार गाढ़ा करता है। छोटे किरदारों में नजर आए हर्ष राजपूत और अप्रतिम सिंह ने भी अपनी सीमित उपस्थिति के बावजूद कहानी के प्रवाह में पूरा न्याय किया है।
निर्देशन और शिल्प का संतुलन
किसी भी हॉरर फिल्म की सबसे बड़ी परीक्षा उसके डर और रहस्य के बीच संतुलन साधने की क्षमता में होती है। यदि रहस्य बहुत जल्दी खुल जाए तो रोमांच खत्म हो जाता है और यदि तर्कहीन घटनाएं बिना वजह जोड़ दी जाएं तो दर्शक का जुड़ाव टूट जाता है। निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा ने इस संतुलन को साधने में अपनी पूरी सूझबूझ दिखाई है। उन्होंने उत्तराखंड की बर्फीली घाटियों, स्थानीय मान्यताओं और अंधविश्वास के तत्वों को एक मजबूत धागे में पिरोया है, जिससे कहानी की गति धीमी नहीं पड़ती और दर्शक लगातार घटनाओं से बंधे रहते हैं।
विजुअल ट्रीटमेंट के मामले में फिल्म की सिनेमैटोग्राफी काफी असरदार साबित होती है। उत्तराखंड की सुनसान वादियां, कोहरे से ढकी अंधेरी सड़कें और वह पुराना सन्नाटेदार घर पर्दे पर एक अजीब सी सिहरन पैदा करते हैं। कैमरामैन ने लो-की लाइटिंग और परछाइयों के खेल का इतना सधा हुआ इस्तेमाल किया है कि दृश्य अपने आप ही एक स्वाभाविक ठंडापन और डर पैदा करते हैं।
ध्वनि संयोजन और कुछ कमजोर पहलू
फिल्म का संगीत और ध्वनि संयोजन इसकी सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरता है। आम तौर पर हॉरर फिल्मों में भारी-भरकम बैकग्राउंड स्कोर का अत्यधिक प्रयोग दृश्यों को बनावटी बना देता है, लेकिन यहां निर्देशक और संगीतकार ने बेहद संयम बरता है। फिल्म में जरूरत के मुताबिक लंबे सन्नाटे का उपयोग किया गया है, जिसके चलते अचानक होने वाली रहस्यमयी हलचलें दर्शकों की धड़कनें तेज कर देती हैं। डरावनी धुनों का सूक्ष्म प्रयोग रोमांच के स्तर को ऊंचा उठाता है।
हालांकि, खूबियों के बीच कुछ कमजोरियां भी साफ झलकती हैं। मध्यांतर के आसपास कहानी में आने वाले कुछ मोड़ों का अंदाजा सतर्क दर्शक पहले से ही लगा लेते हैं, जिससे सस्पेंस का प्रभाव थोड़ा हल्का पड़ जाता है। इसके अलावा कुछ दृश्यों में विजुअल इफेक्ट्स यानी वीएफएक्स का स्तर और बेहतर हो सकता था, जिससे भूतिया माहौल अधिक विश्वसनीय दिखता। पटकथा में कुछ घटनाओं के पीछे के कारणों को भी और अधिक स्पष्टता के साथ समझाया जा सकता था। इन हल्की कमियों के बावजूद यह फिल्म हॉरर और अंधविश्वास के शौकीनों के लिए एक असरदार रोमांचक अनुभव प्रस्तुत करती है।



















