भारतीय सिनेमा के इतिहास में पौराणिक महागाथाओं को परदे पर उतारने की कई कोशिशें हुई हैं, लेकिन नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी 'रामायण' का यह पहला अध्याय तकनीकी भव्यता और सांस्कृतिक आस्था का अत्यंत दुर्लभ संगम बनकर सामने आता है। यह रामायण रिव्यू (2026) इस बात की पड़ताल करता है कि कैसे 4000 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विजुअल इफेक्ट्स के बीच भी फिल्म अपनी मूल आत्मा और मानवीय संवेदनाओं को खोने नहीं देती। दिवाली 2026 के अवसर पर रिलीज के लिए तैयार यह कृति केवल भव्यता का प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा के सबसे पावन आख्यान को आधुनिक सिनेमाई भाषा में प्रस्तुत करने का साहसिक प्रयास है।
कहानी का ताना-बाना और कथा विस्तार
फिल्म का कथानक केवल जानी-पहचानी घटनाओं का दृश्य रूपांतरण नहीं करता, बल्कि इसके दर्शन और वैचारिक संघर्ष को गहराई से उभारता है। कहानी का आरंभ देवताओं और दानवों के बीच ब्रह्मांडीय स्तर पर जारी सनातन टकराव से होता है। पटकथा में रावण के आरंभिक जीवन, उसकी कठोर तपस्या और उसके अजेय बनने की यात्रा को अत्यंत प्रभावी ढंग से शामिल किया गया है। इसके बाद कथानक सूर्यवंश की पावन नगरी अयोध्या की ओर मुड़ता है, जहां राजा दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म तथा गुरुकुल में उनकी शिक्षा-दीक्षा को सलीके से दिखाया गया है।
पहले भाग का प्रमुख केंद्र बिंदु प्रभु राम के मानवीय स्वरूप और उनके दैवीय गुणों के बीच का संतुलन है। महर्षि विश्वामित्र के साथ आश्रम की यात्रा, ताड़का का संहार, अहिल्या का उद्धार और मिथिला नगरी में आयोजित सीता स्वयंवर तक की घटनाएं पहले खंड की रीढ़ हैं। नितेश तिवारी ने त्याग, कर्तव्य, मर्यादा और धर्म जैसे शाश्वत मूल्यों को इस तरह पिरोया है कि यह आज के दर्शकों से सीधा भावनात्मक संवाद स्थापित करता है।
अभिनय और किरदारों की जीवंतता
फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी इसका अभिनय पक्ष है, जहां मुख्य कलाकारों ने पौराणिक चरित्रों की गरिमा को पूरी निष्ठा से निभाया है।
रणबीर कपूर (भगवान राम): रणबीर कपूर ने मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र में संयम, सौम्यता, आंतरिक शांति और एक क्षत्रिय की अदम्य वीरता का बेजोड़ तालमेल दिखाया है। उनकी आंखों में दिखने वाली करुणा और दृढ़ता दर्शक को बांधे रखती है। युद्ध के दृश्यों में उनकी शारीरिक भाषा और संवाद अदायगी में साफ झलकता है कि इस भूमिका के लिए उन्होंने गहन साधना की है।
यश (रावण): लंकापति रावण की भूमिका में रॉकिंग स्टार यश की उपस्थिति परदे पर छा जाती है। यश ने अपनी भारी-भरकम आवाज, तीक्ष्ण हाव-भाव और प्रचंड ऊर्जा से दशानन के प्रकांड ज्ञान, अहंकार और अजेय शक्ति को जीवंत बना दिया है। उनका रावण सिर्फ एक सपाट खलनायक नहीं लगता, बल्कि एक जटिल और भीमकाय व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है।
साई पल्लवी (माता सीता): साई पल्लवी ने जानकी के किरदार में सादगी, आदर और आंतरिक दृढ़ता का सहज समावेश किया है। उनके चेहरे के भाव अत्यंत स्वाभाविक हैं। बिना किसी नाटकीयता के उन्होंने सीता के आत्मबल, करुणा और सिद्धांतों के प्रति उनके समर्पण को गरिमापूर्ण ढंग से परदे पर उतारा है।
सहायक कलाकार: अनुज लक्ष्मण के रूप में रवि दुबे ने भाई के प्रति अटूट निष्ठा और स्नेह को बहुत प्रभावशाली ढंग से दर्शाया है। वहीं महाराजा दशरथ के चरित्र में अरुण गोविल की उपस्थिति दर्शकों को भावुक कर देती है और उनकी मौजूदगी से कहानी को भावनात्मक आधार मिलता है। शेष सभी सहायक अभिनेताओं ने भी अपने-अपने संक्षिप्त किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।
निर्देशन और शिल्प
दंगल जैसी संवेदनशील फिल्में बना चुके निर्देशक नितेश तिवारी ने यह दिखा दिया है कि वे मानवीय रिश्तों की सूक्ष्मताओं को समझने के साथ-साथ 4000 करोड़ रुपये के अभूतपूर्व बजट वाले कैनवस को भी बखूबी संभाल सकते हैं। उनका दृष्टिकोण संतुलित है; वे विशालकाय सेट्स और तकनीकी चकाचौंध के बीच कहानी के भावनात्मक मर्म को ओझल नहीं होने देते। सांस्कृतिक मान्यताओं और मूल ग्रंथ की गरिमा का आदर करते हुए उन्होंने हर प्रसंग को गढ़ा है।
तकनीकी उपलब्धियां और विजुअल इफेक्ट्स
तकनीक के मोर्चे पर यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर कही जा सकती है। विजुअल इफेक्ट्स कंपनी DNEG द्वारा तैयार किए गए दृश्य अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल खाते हैं।
प्रोडक्शन डिजाइन: अयोध्या की अलौकिक वास्तुकला, जनकपुर की सांस्कृतिक छटा, स्वर्ण लंका का वैभव और ऋषियों के तपोवन इतने यथार्थवादी प्रतीत होते हैं कि दर्शक त्रेतायुग के उस वातावरण में पूरी तरह समा जाता है।
छायांकन: विशाल भू-भागों, दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की आभा और युद्ध अनुक्रमों को जिस विहंगम अंदाज में कैमरे में कैद किया गया है, वह IMAX और 3D प्रारूप में अत्यंत प्रभावी जान पड़ता है। प्रत्येक दृश्य एक सजीव चित्रकला जैसा अनुभव कराता है।
संगीत का वैश्विक संगम
सिनेमाई इतिहास में यह पहला अवसर है जब भारतीय संगीतकार एआर रहमान और हॉलीवुड के ऑस्कर विजेता संगीतकार हैंस जिमर एक साथ किसी भारतीय परियोजना के लिए जुड़े हैं। दोनों के सहयोग से फिल्म को एक अद्वितीय और समृद्ध ध्वनि संसार मिला है।
गीत: एआर रहमान द्वारा रचे गए भक्ति और माधुर्य से परिपूर्ण गीत आध्यात्मिक शांति की अनुभूति कराते हैं।
पार्श्व संगीत: हैंस जिमर का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। रावण के आगमन पर बजने वाला भव्य ऑर्केस्ट्रा जहां रोंगटे खड़े करता है, वहीं राम और सीता के प्रसंगों में बजने वाली कोमल धुनें मन को छू जाती हैं।
कमियां और समीक्षात्मक बिंदु
इतने विशाल महाकाव्य के पहले भाग में कुछ सीमाएं भी नजर आती हैं। फिल्म की कुल अवधि काफी लंबी है। मध्यांतर से पहले का हिस्सा, जिसमें रावण की पृष्ठभूमि और प्रभु राम के बाल्यकाल को अत्यधिक विस्तार से दिखाया गया है, कई स्थानों पर गति को धीमा कर देता है। इसके अलावा, DNEG का तकनीकी कार्य कुल मिलाकर उत्कृष्ट होने के बावजूद कुछ पृष्ठभूमियों और पर्यावरणीय दृश्यों में CGI का आभास अलग से होता है, जिसे और अधिक परिष्कृत किया जा सकता था।
निष्कर्ष
नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी के संयुक्त प्रयासों से बनी यह फिल्म भारतीय सिनेमा के पटल पर एक नया अध्याय रचती है। अपनी कुछ खामियों के बावजूद यह पहला खंड दर्शकों को पूरी तरह बांधने में सफल रहता है और आने वाले दूसरे भाग के लिए उत्सुकता जगाता है।
























