भारत की स्वतंत्रता से ठीक तीन दिन पहले 12 अगस्त 1947 की सुबह देश के कई हिस्सों में अभूतपूर्व अनिश्चितता और तनाव छाया हुआ था। एक तरफ बंगाल और पंजाब में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही थी, तो दूसरी तरफ देसी रियासतों के भविष्य को लेकर राजनीतिक शह-मात का खेल जारी था। कोलकाता के पास स्थित सोडेपुर आश्रम में महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा से लेकर लाहौर की गलियों और श्रीनगर के राजमहल तक, इस एक दिन में कई दूरगामी फैसले और घटनाएं हुईं जिन्होंने देश की भावी तस्वीर तय कर दी।
कोलकाता में शांति का अनूठा प्रयोग और गांधी की कड़ी शर्त
12 अगस्त की सुबह कोलकाता के सोडेपुर आश्रम में इकट्ठा हुए लोग बेहद बेचैन थे। आश्रम के वातावरण में यह सवाल तैर रहा था कि 5,000 से अधिक हिंदुओं की हत्या के जिम्मेदार माने जाने वाले एच एस सुहरावर्दी पिछली रात अचानक महात्मा गांधी से मिलने क्यों पहुंचे थे। महात्मा गांधी लोगों की इस मनःस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्होंने सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान ही स्थिति स्पष्ट करने का निर्णय लिया।
महात्मा गांधी ने प्रार्थना सभा में एकत्र जनसमूह को संबोधित करते हुए सुहरावर्दी को सुहरावर्दी साहब कहकर पुकारा। उन्होंने बताया कि सुहरावर्दी पिछली रात आश्रम आए थे और उन्होंने सलाह दी थी कि कोलकाता में जब तक हालात पूरी तरह शांत न हो जाएं, तब तक गांधी को शहर छोड़कर नहीं जाना चाहिए। गांधी ने इस सलाह पर सहमति जताई, लेकिन इसके बदले में एक बेहद सख्त और अनोखी शर्त रख दी।
गांधी ने सुहरावर्दी के सामने शर्त रखी कि सुहरावर्दी को उनके साथ कोलकाता के सबसे अधिक दंगा प्रभावित इलाके में एक ही छत के नीचे रहना होगा। इस दौरान उस स्थान पर न तो कोई पुलिस बल मौजूद रहेगा और न ही सेना की कोई तैनाती होगी। सुहरावर्दी ने इस जोखिम भरी शर्त को स्वीकार कर लिया। प्रार्थना सभा में गांधी ने यह भी कहा कि सीमा आयोग एक या दो दिन में बंटवारे की आधिकारिक रेखाओं की घोषणा कर देगा, इसलिए हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को आयोग के निर्णय का पूर्ण सम्मान करना चाहिए।
गोवा, दमन, दीव और पुदुचेरी पर गांधी की चेतावनी
प्रार्थना सभा के दौरान महात्मा गांधी ने देश के अन्य तटीय क्षेत्रों में उपज रहे घटनाक्रम पर भी अपना मत व्यक्त किया। उन्हें जानकारी मिली थी कि गोवा, दमन, दीव और पुदुचेरी में रहने वाले कुछ स्थानीय नागरिक 15 अगस्त 1947 के दिन ही अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करने की योजना बना रहे थे। उस समय ये क्षेत्र क्रमशः पुर्तगाल और फ्रांस के औपनिवेशिक शासन के अधीन थे।
गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ये नागरिक 15 अगस्त को स्वतंत्रता का ऐलान करते हैं तो यह एक गंभीर मूर्खता होगी। उन्होंने समझाया कि ब्रिटिश सरकार भारत छोड़ने पर सहमत हुई है, लेकिन फ्रांस और पुर्तगाल ने अभी ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। ऐसे समय में कानून हाथ में लेना अहंकार का परिचय होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में ये क्षेत्र भी स्वतंत्र हो जाएंगे, इसलिए संयम और धैर्य बनाए रखना आवश्यक है।
लाहौर में रेडक्लिफ की अफवाह और डिप्टीगंज में कत्लेआम
पंजाब में 11 अगस्त की रात और 12 अगस्त की सुबह लाहौर शहर में एक भीषण अफवाह जंगल की आग की तरह फैल गई। शहर में खबर उड़ी कि सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता वाले सीमा आयोग ने लाहौर को भारत का हिस्सा बनाने का फैसला कर लिया है। इस अफवाह ने पहले से दंगे की आग में जल रहे लाहौर के माहौल को और अधिक हिंसक बना दिया।
मुस्लिम नेशनल गार्ड के उपद्रवियों ने हिंदू और सिख बाहुल्य बस्तियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। लाहौर के हिंदू बहुल इलाके डिप्टीगंज में 11 अगस्त की रात से ही भारी हिंसा और मारकाट शुरू हो गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस कत्लेआम में 50 से अधिक हिंदू और सिख नागरिकों की जान गई, हालांकि वास्तविक मृतकों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा थी। शाम ढलते-ढलते लाहौर से भड़की यह हिंसा गुरदासपुर और लायलपुर के जिलों तक फैल गई।
कश्मीर में राजनीतिक तख्तापलट और रामचंद्र काक की नजरबंदी
उसी दिन जम्मू और कश्मीर रियासत के राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ आया। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना किसी भी कीमत पर कश्मीर का विलय पाकिस्तान में चाहते थे। वहीं भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भी महाराजा हरि सिंह को पाकिस्तान के साथ जाने की सलाह दी थी। महाराजा हरि सिंह ने माउंटबेटन की इस सलाह को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।
हालांकि महाराजा हरि सिंह के इस रुख से उनके तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक सहमत नहीं थे। काक ने नई कूटनीतिक चाल चलते हुए महाराजा को भ्रमित करना शुरू कर दिया। काक की मंशा थी कि यदि कश्मीर का पाकिस्तान में विलय संभव न हो तो उसे एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रखा जाए। पंडित जवाहरलाल नेहरू को जब काक की इन चालों की भनक लगी, तो उन्होंने महात्मा गांधी से इस विषय पर हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
महात्मा गांधी ने श्रीनगर की यात्रा के दौरान महाराजा हरि सिंह से भेंट की और रामचंद्र काक की गतिविधियों की जानकारी दी। महात्मा गांधी से चर्चा के बाद महाराजा हरि सिंह ने 12 अगस्त 1947 को बड़ा कदम उठाया। महाराजा ने रामचंद्र काक को प्रधानमंत्री पद से तत्काल बर्खास्त कर दिया और उनके स्थान पर जनक सिंह को जम्मू और कश्मीर का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इसके साथ ही, राज्य से भागने का प्रयास कर रहे रामचंद्र काक को उनके ही आवास में नजरबंद कर दिया गया।



















