भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में एक बुनियादी और निर्णायक परिवर्तन आ चुका है, जहाँ देश अब केवल हमलों को रोकने या सीमाओं की हिफाजत करने तक सीमित रहने के बजाय हमलावर ताकतों को कड़ा सबक सिखाने की रणनीति पर अमल कर रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 24 सितंबर को स्पष्ट किया कि भारत का सुरक्षा ढाँचा अब मात्र रोकथाम पर केंद्रित रहने के दौर से आगे निकल चुका है। देश की वर्तमान सैन्य तैयारी किसी भी संभावित विरोधी को यह साफ संदेश देने के लिए तैयार की जा रही है कि किसी भी प्रकार की आक्रामक हरकत करने पर उसे बेहद भारी और असहनीय कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने इस रणनीतिक बदलाव को रोकथाम से आगे बढ़कर दंडित करने की नीति के रूप में परिभाषित किया, जिसमें विरोधी ताकतों को किसी भी हिमाकत का त्वरित और निर्णायक जवाब दिया जाएगा।
रणनीतिक सोच में बड़ा बदलाव और कूटनीति का संतुलन
बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि देश को सक्रिय कूटनीति और मजबूत सैन्य शक्ति के बीच एक ठोस तालमेल बनाए रखना होगा। भारत ऐतिहासिक रूप से लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संवाद के जरिए विवाद सुलझाने में गहरा विश्वास रखता है, परंतु जब राष्ट्रीय संप्रभुता का सवाल आता है तो निर्णायक कदम उठाने में कोई संकोच नहीं किया जाएगा। रणनीतिक दृष्टिकोण के इस रूपांतरण को समझाने के लिए उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के साथ-साथ पूर्व में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के सफल अभियानों का उल्लेख किया। इन सैन्य अभियानों ने यह पूरी तरह स्थापित कर दिया है कि भारत अब पुरानी रक्षात्मक शैली से बाहर निकलकर आक्रामकता का मुकाबला उसी की भाषा में करने का सामर्थ्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति रखता है।
स्थिर सीमाओं के पार लगातार फैलते सुरक्षा खतरे
राष्ट्रीय सुरक्षा के वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए रक्षा मंत्री ने चेतावनी दी कि सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को अब केवल मानचित्र पर खींची गई भौगोलिक सीमाओं तक सीमित मानकर नहीं देखा जा सकता। जहाँ देश की भौगोलिक सीमाएं पूरी तरह स्थिर हैं, वहीं सुरक्षा को मिलने वाली धमकियों का दायरा लगातार गतिशील होकर नए क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा है। शत्रुतापूर्ण इरादे रखने वाली ताकतें अब केवल जमीनी भू-भाग पर अतिक्रमण करने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि वे किसी राष्ट्र की संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था, आधुनिक साइबर नेटवर्क और संवेदनशील तकनीकी बुनियादी ढाँचे को भी पंगु बनाने का षड्यंत्र रचती हैं। इसी जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी सुरक्षा योजनाओं में उन्नत तकनीकी क्षमताओं को सर्वोपरि प्राथमिकता देनी होगी ताकि देश के डिजिटल और आर्थिक आधार को सुरक्षित रखा जा सके।
संघर्ष का नया मैदान: तकनीक, भू-भाग और रणनीतिक सोच
भविष्य के रक्षा परिदृश्य का खाका खींचते हुए रक्षा मंत्री ने तीन अनिवार्य स्तंभों का उल्लेख किया, जिनमें भू-भाग, आधुनिक तकनीक और रणनीतिक सोच शामिल हैं। उन्होंने साइबर क्षेत्र को युद्ध के एक नए और बेहद संवेदनशील मोर्चे के रूप में रेखांकित किया। वर्तमान समय में युद्ध की प्रकृति पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर अंतरिक्ष, साइबर डोमेन और सूचना तंत्र के विस्तृत दायरे में फैल चुकी है। ऐसे आधुनिक संघर्षों में डेटा विश्लेषण, सटीक मारक क्षमता वाले हथियारों, ऑटोनोमस सिस्टम्स, ड्रोन और AI जैसी क्रांतिकारी तकनीकों की भूमिका दिन-प्रतिदिन निर्णायक साबित हो रही है। रक्षा मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि नरम प्रभाव और कठोर शक्ति एक-दूसरे के पूरक तो हो सकते हैं, लेकिन वे कभी भी एक-दूसरे का विकल्प नहीं बन सकते। भारत ने वैश्विक पटल पर क्वाड, बिम्सटेक और आई2यू2 जैसे बहुपक्षीय गठबंधनों में अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए अपनी जमीनी सैन्य तैयारियों को भी लगातार धार दी है।
आतंकवाद और वार्ता का साथ चलना असंभव
पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ संबंधों पर भारत का रुख दोहराते हुए रक्षा मंत्री ने दृढ़ता से कहा कि आतंकवाद, द्विपक्षीय बातचीत और व्यापारिक रिश्ते एक साथ आगे नहीं बढ़ सकते। उन्होंने अप्रैल 2025 में हुए कायराना पहलगाम आतंकवादी हमले का विशेष संदर्भ दिया, जिसने उस सीमा को पार कर दिया था जिसे भारत किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं कर सकता था। इस गंभीर घटना के बाद भारत ने ऐतिहासिक और कड़े कदम उठाते हुए वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का ऐतिहासिक फैसला किया था। रक्षा मंत्री ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि भविष्य में भारत के खिलाफ की गई किसी भी प्रकार की साजिश या दुस्साहस का सेना द्वारा मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता से सशक्त सुरक्षा
राष्ट्रीय सुरक्षा को हर संकट में अडिग बनाए रखने के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि कोई भी देश वास्तव में तभी सुरक्षित रह सकता है जब उसकी सैन्य निर्भरता दूसरों पर न हो। सरकार का मुख्य ध्यान रक्षा उपकरणों के संपूर्ण चक्र, जिसमें उनकी डिजाइनिंग, स्वदेशी विकास और घरेलू विनिर्माण शामिल है, को भारत के भीतर ही गति देने पर टिका है। इसके सकारात्मक नतीजे सामने आ रहे हैं, क्योंकि रक्षा क्षेत्र से जुड़े सार्वजनिक उपक्रम अब घाटे के दौर से बाहर आ चुके हैं और लाभ अर्जित कर रहे हैं। रक्षा मंत्री ने देश के घरेलू सैन्य-औद्योगिक आधार के विस्तार के प्रमाण के रूप में स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान, स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत और शक्तिशाली धनुष तोप का उदाहरण दिया। उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि भारत कभी युद्ध का समर्थक नहीं रहा है, लेकिन देश की शांति को किसी भी कमजोरी के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता और अपनी रक्षा के लिए देश हर चुनौती का डटकर मुकाबला करेगा।

















