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अमेरिकी संसद से हरी झंडी मिलने के बाद भी बैकफुट पर क्यों हैं डोनाल्ड ट्रंप?भारत
23 सित॰ 2026, 12:09 am (39 मिनट पहले)· 0

अमेरिकी संसद से हरी झंडी मिलने के बाद भी बैकफुट पर क्यों हैं डोनाल्ड ट्रंप?

रूसी तेल खरीद पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिलने और 18 सितंबर को हस्ताक्षर करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन पर आयात शुल्क लगाने का फैसला रोक रखा है। शीर्ष वित्तीय विशेषज्ञों और विदेश मंत्रालय की चेतावनियों के बीच अमेरिकी प्रशासन अब समझौते के रास्ते तलाश रहा है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर पिछले कुछ समय से चल रही रणनीतिक खींचतान ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक साथ सामने आई तस्वीर ने वैश्विक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस त्रिपक्षीय सामरिक संतुलन के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख अचानक नरम पड़ता दिखाई दे रहा है। अपने आक्रामक फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले ट्रंप अब भारत और चीन दोनों ही प्रमुख एशियाई ताकतों के साथ टकराव टालने और रिश्तों को साधने की कोशिशों में जुट गए हैं। इसी कड़ी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगामी अमेरिकी दौरे को लेकर विशेष तैयारियां की जा रही हैं, जहां दोनों नेताओं की आमने-सामने बातचीत प्रस्तावित है।

कानूनी मंजूरी के बावजूद आयात शुल्क के फैसले पर हिचकिचाहट

अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति को यह व्यापक अधिकार सौंप दिया है कि वे रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर शत-प्रतिशत तक दंडात्मक आयात शुल्क लगा सकें। इस विधायी कदम का उद्देश्य मॉस्को की तेल आय पर चोट पहुंचाना था। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस में कई डेमोक्रेट सांसदों के समर्थन से पारित इस विधेयक पर डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को ही हस्ताक्षर कर दिए थे, जिससे उनके आदेश को कानूनी सुरक्षा मिल चुकी है। इसके बावजूद अब तक भारत या चीन के खिलाफ कोई आधिकारिक टैरिफ अधिसूचना जारी नहीं की गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने केवल इतना कहा कि उनके पास शुल्क लागू करने का अधिकार आ चुका है और यदि आवश्यकता पड़ी तो वे इसका उपयोग करेंगे। पिछले साल अगस्त से जिस कानून को तैयार करने में पूरा प्रशासनिक अमला लगा हुआ था, उस पर अब सीधे कार्रवाई करने के बजाय प्रतीक्षारत रहने का रवैया अपनाया जा रहा है।

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अमेरिकी वित्तीय दिग्गजों की सीधी चेतावनी

व्यापारिक प्रतिबंधों को ठंडे बस्ते में डालने के पीछे अमेरिकी कॉर्पोरेट और वित्तीय जगत से मिल रही गंभीर चेतावनियां मुख्य वजह मानी जा रही हैं। वैश्विक वित्तीय क्षेत्र की अग्रणी संस्था जेपी मॉर्गन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेमी डिमोन ने स्पष्ट तौर पर इस रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। जेमी डिमोन का तर्क है कि रूस को आर्थिक रूप से घेरने के प्रयास में नई दिल्ली पर आयात शुल्क थोपना एक आत्मघाती कदम साबित होगा, क्योंकि इससे संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में विकराल संकट पैदा हो जाएगा। उन्होंने आगाह किया कि रूस पर दबाव बनाने के चक्कर में ऐसा रास्ता नहीं चुना जाना चाहिए जो भारत समेत समूचे वैश्विक तेल कारोबार को दंडित करे और अंततः इसका खामियाजा खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़े। वॉल स्ट्रीट के प्रमुख विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारतीय ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया गया तो ईंधन की वैश्विक कीमतें बेकाबू हो जाएंगी।

नई दिल्ली का दो-टूक कूटनीतिक संदेश

दूसरी तरफ नई दिल्ली ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट और दृढ़ रखा है। अमेरिकी दबाव के आगे झुके बिना भारत ने अपने रणनीतिक और ऊर्जा हितों की रक्षा का संकल्प दोहराया है। विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि किसी भी एकतरफा व्यापारिक कार्रवाई के दुष्परिणाम केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी व्यापक रूप से पड़ेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने आधिकारिक ब्रीफिंग में कहा कि इसका प्रभाव हमारे द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी इसके असर पड़ सकते हैं। भारतीय कूटनीतिक तंत्र ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भविष्य की वार्ताओं में भी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी और किसी भी दबाव के तहत संप्रभु निर्णयों से समझौता नहीं किया जाएगा।

वैश्विक ऊर्जा संतुलन और अमेरिकी दुविधा

वॉशिंगटन इस समय एक बड़ी कूटनीतिक दुविधा में फंस चुका है। यदि वह भारत पर भारी आयात शुल्क थोपता है, तो अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र और उपभोक्ताओं पर महंगाई का भारी बोझ पड़ेगा। इसके अतिरिक्त भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी तालमेल और गहरा होने का जोखिम भी बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसले को पलटे जाने का कोई कानूनी भय न होने के बावजूद ट्रंप प्रशासन का पीछे हटना दर्शाता है कि व्यावहारिक धरातल पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना उतना आसान नहीं है। वैश्विक ऊर्जा प्रवाह में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज करना अमेरिकी हितों के लिए भी संभव नहीं रह गया है। यही कारण है कि टकराव की नीति छोड़कर अब कूटनीतिक संवाद और व्यापारिक सुलह के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

सवाल-जवाब

अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति को क्या अधिकार दिया है?
अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने का वैधानिक अधिकार प्रदान किया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ संबंधी विधेयक पर कब हस्ताक्षर किए थे?
डोनाल्ड ट्रंप ने इस विधेयक पर 18 सितंबर को हस्ताक्षर किए थे, जिसके लिए प्रशासन पिछले साल अगस्त से तैयारी कर रहा था।
जेपी मॉर्गन के सीईओ जेमी डिमोन ने इस मुद्दे पर क्या राय दी?
जेमी डिमोन ने आगाह किया कि रूस पर दबाव बनाने के लिए भारत पर टैरिफ लगाना गलत रणनीति होगी, क्योंकि इससे वैश्विक तेल बाजार संकट में पड़ जाएगा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने क्या बयान दिया?
रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस कदम का नकारात्मक असर द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार दोनों पर पड़ सकता है, जिसके बारे में अमेरिका को अवगत करा दिया गया है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप ने कहा कि उन्हें शुल्क लगाने का कानूनी अधिकार मिल चुका है और आवश्यकता पड़ने पर ही वे इसका उपयोग करेंगे।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·11 मिनट पहले

जब बड़े देशों के नेता मंच पर साथ खड़े होते हैं, तो ज़मीनी समीकरण एकदम बदल जाते हैं। हमने दिल्ली और वाशिंगटन के बीच कई बार ऐसे कूटनीतिक पेंच देखे हैं जहाँ कानून बनने के बाद भी कागज़ दराज में ही रह जाते हैं। बाज़ार का दबाव और ऊर्जा संकट का डर राजनेताओं को कड़े कदम उठाने से रोक ही देता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 मिनट पहले

करण, बिल्कुल सही कहा आपने। जेपी मॉर्गन की चेतावनी और वाल स्ट्रीट का दबाव साफ बता रहा है कि कागजी कानून से बाजार नहीं चलते।

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