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अंडरकवर जासूसी से आईबी चीफ बनने तक कैसे तैयार हुआ अजित डोभाल का छह दशक लंबा सुरक्षा सफरभारत
22 सित॰ 2026, 5:48 pm (3 घंटे पहले)· 0

अंडरकवर जासूसी से आईबी चीफ बनने तक कैसे तैयार हुआ अजित डोभाल का छह दशक लंबा सुरक्षा सफर

80 वर्ष की आयु में देश की आंतरिक सुरक्षा के शीर्ष प्रतीक बने अजित डोभाल का खुफिया अनुभव दशकों में फैला हुआ है। मिजोरम, पंजाब, कश्मीर और पाकिस्तान में उनके अभूतपूर्व अभियानों ने भारत की सुरक्षा रणनीतियों को नई दिशा दी।

20 जनवरी 1945 को जन्मे अजित डोभाल ने अपने जीवन के छह दशक से अधिक का समय देश की सुरक्षा और खुफिया तंत्र को मजबूत करने में समर्पित किया है। अस्सी वर्ष की उम्र पार कर चुके अजित डोभाल का नाम भारतीय सुरक्षा गलियारों में एक ऐसे रणनीतिकार के तौर पर लिया जाता है, जिनका जमीनी अनुभव सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति के वरिष्ठ नागरिक बनने की समयावधि से भी कहीं बड़ा है। उनकी विशिष्ट पहचान केवल उम्र के इस पड़ाव की वजह से नहीं, बल्कि उस गहन और चुनौतीपूर्ण सेवाकाल से बनी है जो उन्होंने लगातार मैदानी अभियानों में बिताया। तीन दशक से अधिक समय तक प्रत्यक्ष खुफिया जिम्मेदारियां संभालने के बाद भी उनका प्रभाव निरंतर बना हुआ है।

शुरुआती जीवन और शैक्षणिक पृष्ठभूमि

अजित डोभाल का जन्म 1945 में उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता मेजर जी.एन. डोभाल भारतीय सेना में अधिकारी थे, जिससे उन्हें बचपन से ही अनुशासन और राष्ट्रसेवा का माहौल मिला। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा का सफर दिल्ली और अजमेर के विख्यात संस्थानों से पूरा किया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा। वर्ष 1967 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि ली और पूरी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान प्राप्त कर अपनी शैक्षणिक मेधा का लोहा मनवाया। अर्थशास्त्र की गहरी समझ ने बाद में उन्हें जटिल सुरक्षा तथा वित्तीय नेटवर्क के विश्लेषण में भी काफी सहायता प्रदान की।

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आईपीएस में प्रवेश और आईबी का सफर

विश्वविद्यालय से शीर्ष स्थान हासिल करने के ठीक एक वर्ष बाद, 1968 में अजित डोभाल भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS के लिए चुने गए। सेवा की शुरुआत में उन्हें केरल कैडर आवंटित किया गया, जहाँ उन्होंने पुलिस अधिकारी के तौर पर प्रशासनिक और कानून व्यवस्था के गुर सीखे। हालांकि, जमीनी चुनौतियों को भांपने की उनकी विलक्षण क्षमता और तीक्ष्ण रणनीतिक सोच के चलते उनका झुकाव जल्द ही खुफिया संकलन की ओर हो गया। इसी क्रम में वर्ष 1972 में वह देश की प्रमुख आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी IB में प्रतिनियुक्त किए गए। इसके बाद अगले तीन दशकों से भी ज्यादा समय तक उन्होंने देश और विदेश में अनगिनत संवेदनशील अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

मैदानी जासूसी और ऑपरेशंस विंग में भूमिका

अधिकांश खुफिया अधिकारियों के विपरीत, डोभाल का अधिकांश सेवाकाल फाइलों और दफ्तरों के बजाय सीधे संकटग्रस्त मैदानी इलाकों में बीता। वह मूल रूप से एक कुशल ऑपरेशंस अधिकारी रहे, जिन्होंने देश के पूर्वोत्तर राज्यों, सिक्किम, पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्रों में सीधा मोर्चा संभाला। सिक्किम के भारत में विलय के समय और उसके बाद की राजनीतिक उथल-पुथल को व्यवस्थित करने में उनकी रणनीतिक मौजूदगी बेहद निर्णायक रही। इसके अलावा उन्होंने पूर्वोत्तर के रणनीतिक समीकरणों को साधने में लगातार खुफिया नेटवर्क को धार दी।

मिजो उग्रवाद के समाधान की राह

1970 के दशक में जब भारत मिजो उग्रवाद की गंभीर आंतरिक सुरक्षा समस्या से जूझ रहा था, तब डोभाल को बेहद जोखिम भरे मिशन पर भेजा गया। वह ऐसे बीहड़ और खतरनाक इलाकों में सक्रिय रहे जहाँ हर पल जान का जोखिम बना रहता था। वहां उन्होंने पहचान छिपाकर अंडरकवर रहते हुए उग्रवादी कैडरों के भीतर अपनी विश्वसनीय पैठ बनाई। लगातार संपर्क और संवाद स्थापित करके उन्होंने विद्रोही गुटों के आंतरिक मनोबल को समझा और प्रमुख मिजो नेतृत्व को हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा की बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार किया। इस गुप्त जमीनी अभियान ने लंबे समय से चले आ रहे खूनी संघर्ष को सुलझाने में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।

पाकिस्तान में अंडरकवर मिशन

डोभाल के खुफिया करियर का सबसे साहसिक और चर्चा में रहने वाला अध्याय पाकिस्तान में उनकी तैनाती से जुड़ा है। उन्होंने वहां कुल छह वर्ष से अधिक का लंबा समय बिताया। उपलब्ध ब्योरे के मुताबिक, उन्होंने लगभग सात साल तक एक साधारण नागरिक का भेष धरकर अंडरकवर एजेंट के रूप में अत्यंत गोपनीय काम किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय उर्दू भाषा पर पूरी पकड़ बनाई और वहां के सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक ताने-बाने को गहराई से समझा। सक्रिय आतंकी संगठनों और भारत विरोधी समूहों के षड्यंत्रों की थाह लेते हुए उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को संवेदनशील सूचनाएं पहुंचाईं। इन अत्यंत जोखिम भरे अभियानों के कारण ही रक्षा विशेषज्ञों और जनता के बीच उन्हें अनौपचारिक रूप से विशेष पहचान मिली।

पंजाब उग्रवाद और ऑपरेशन ब्लैक थंडर

1980 के दशक में जब पंजाब भीषण उग्रवाद की चपेट में था, तब भी डोभाल ने खुफिया मोर्चे पर बेहद निर्णायक कार्य किया। ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान आतंकियों को स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने की योजना में उनका खुफिया योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के आसपास एक सामान्य रिक्शा चालक का भेष बनाकर लगातार कई दिनों तक आतंकियों की गतिविधियों और उनके हथियारों की टोह ली। इसके बाद उन्होंने अत्यधिक साहस दिखाते हुए खुद को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का एजेंट बताकर आतंकियों का भरोसा हासिल किया। इस युक्ति से वह स्वर्ण मंदिर परिसर के अंदर तक सुरक्षित प्रवेश करने में सफल रहे और वहां मौजूद आतंकियों के ठिकानों, गोला-बारूद और वास्तविक संख्या की सटीक जानकारी सुरक्षा बलों तक पहुंचाई, जिससे ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।

जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापना और रणनीतिक भूमिका

1990 के दशक में जब कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था, डोभाल को वहां की कमान सौंपी गई। उन्होंने घाटी में असाधारण सूझबूझ दिखाते हुए कट्टरपंथी आतंकियों और उनके सहयोगियों को मुख्यधारा में शामिल कर काउंटर-इंसर्जेंट के तौर पर तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इस साहसिक कदम ने आतंकी संगठनों के हौसले पस्त कर दिए और इसका सीधा नतीजा यह रहा कि 1996 में जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विधानसभा चुनाव आयोजित कराने की अनुकूल परिस्थितियां बन सकीं। इसके बाद के वर्षों में भी वह राज्य की नीतियों और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी से गहराई से जुड़े रहे। विशेष दर्जे से जुड़े नीतिगत निर्णयों के बाद भी वह व्यक्तिगत तौर पर जमीनी स्थिति की समीक्षा करने श्रीनगर पहुंचे थे।

संस्थागत नेतृत्व और असाधारण सम्मान

खुफिया ब्यूरो में अपने करियर के दौरान डोभाल ने लंबे समय तक आईबी के ऑपरेशंस विंग की कमान संभाली। उन्होंने देश की सुरक्षा को तकनीकी और आधुनिक रूप देने के लिए मल्टी एजेंसी सेंटर यानी MAC और ज्वाइंट टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस यानी JTFI की परिकल्पना की और इनके संस्थापक अध्यक्ष रहे। इसके साथ ही उन्होंने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में मंत्री स्तर के पद पर अपनी राजनयिक सेवाएं भी दीं। वर्ष 2004-05 के दौरान वह इंटेलिजेंस ब्यूरो के सर्वोच्च पद निदेशक के रूप में नियुक्त हुए और 2005 में वहीं से सेवानिवृत्त हुए।

राष्ट्र के प्रति उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1989 में देश के प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से अलंकृत किया गया। कीर्ति चक्र पाने वाले वह पहले पुलिस अधिकारी बने। इसके अतिरिक्त, सेवा के मात्र छह वर्ष के भीतर ही उन्हें सराहनीय सेवा के लिए प्रतिष्ठित इंडियन पुलिस मेडल प्रदान किया गया था, जबकि यह पदक आमतौर पर सत्रह वर्ष की लंबी सेवा के बाद ही विचारणीय होता है। इतने कम सेवाकाल में यह सम्मान हासिल करने वाले वह देश के सबसे युवा अधिकारियों में दर्ज हैं।

सवाल-जवाब

अजित डोभाल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
अजित डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा कहाँ से पूरी की?
उनकी स्कूली पढ़ाई दिल्ली और अजमेर में हुई, जिसके बाद 1967 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए कर प्रथम स्थान प्राप्त किया।
अजित डोभाल भारतीय पुलिस सेवा में कब शामिल हुए थे?
वह 1968 में केरल कैडर से आईपीएस में शामिल हुए और 1972 में इंटेलिजेंस ब्यूरो में प्रतिनियुक्त किए गए।
ऑपरेशन ब्लैक थंडर में उनकी क्या भूमिका थी?
उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के बाहर रिक्शा चालक का भेष बनाया और अंदर घुसकर आतंकियों के ठिकानों की महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षा बलों को दी।
अजित डोभाल को कीर्ति चक्र कब प्रदान किया गया था?
उन्हें अदम्य वीरता और असाधारण सेवाओं के लिए वर्ष 1989 में कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था।
वह इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक पद से कब सेवानिवृत्त हुए?
डोभाल 2004-05 के दौरान आईबी के निदेशक रहे और 2005 में इस पद से सेवानिवृत्त हुए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·1 घंटे पहले

अस्सी साल की उम्र में भी ऐसा करिश्माई और सक्रिय सुरक्षा सफर वाकई हैरान करने वाला है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

अस्सी साल की उम्र में भी ऐसा एक्टिव रहना और देश के लिए लगे रहना वाकई बड़ी बात है।

Neha Verma@neha-verma·1 घंटे पहले

अर्जुन जी, सही कहा आपने! इतनी उम्र में भी देश के लिए ऐसा समर्पण वाकई हैरान करने वाला है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 घंटे पहले

अजित डोभाल के काम की तारीफ तो बहुत होती है, पर क्या सिर्फ एक आदमी के बूते पर इतना बड़ा सुरक्षा तंत्र चल सकता है? मुझे इस पर थोड़ा शक है।

Ravikash Gupta@ravikash·2 घंटे पहले

करण भाई, अकेले आदमी के दम पर देश नहीं चलता, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पूरी व्यवस्था को दिशा दे देते हैं।

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