मणिपुर की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस सांसद अंगोमचा विमल अकोइजम को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जेएनयू विवाद के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके खिलाफ चलाए गए व्यापक अभियान के नतीजों को लेकर अब सत्ताधारी दल के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के एक वर्ग का आकलन है कि सांसद पर सीधा और तीखा हमला बोलने से जमीनी स्तर पर प्रतिकूल असर हुआ है। विशेष रूप से इंफाल घाटी के युवाओं के बीच अकोइजम के समर्थन में हुआ उभार इस बात का संकेत दे रहा है कि आक्रामक विरोध प्रदर्शनों ने उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर करने के बजाय अप्रत्याशित रूप से सहानुभूति और मजबूती दिला दी है।
जेएनयू विवाद और इस्तीफे की मांग को लेकर गरमाया था सियासी माहौल
इस पूरे राजनीतिक टकराव की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 9 अक्टूबर को लिए गए एक बड़े फैसले के बाद हुई थी। संस्थान ने 11 छात्राओं द्वारा दर्ज कराई गई यौन उत्पीड़न की शिकायतों की आंतरिक जांच के आधार पर अकोइजम की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। हालांकि, सांसद ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विश्वविद्यालय की आंतरिक जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। उन्होंने इस कार्रवाई को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित करार दिया था।
संस्थान से बर्खास्तगी का आदेश आते ही भाजपा ने उनके खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया था। घटनाक्रम के अगले ही दिन यानी 10 अक्टूबर को भाजपा महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं ने इंफाल की सड़कों पर उतरकर कांग्रेस भवन की तरफ विरोध मार्च निकाला और सांसद से लोकसभा की सदस्यता से तुरंत त्यागपत्र देने की मांग की। इसके बाद मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से अकोइजम के इस्तीफे की मांग उठाई। उधर पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी द्वारा सांसद को दिए जा रहे राजनीतिक संरक्षण और समर्थन पर कड़ा ऐतराज जताया।
दिल्ली तक पहुंचा था प्रदर्शनों का दायरा
भाजपा का यह विरोध प्रदर्शन केवल पूर्वोत्तर के इस राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे राष्ट्रीय राजधानी तक ले जाया गया। 13 अक्टूबर को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ए. शारदा देवी के नेतृत्व में पार्टी की महिला सांसदों के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की और इस पूरे प्रकरण में सख्त प्रशासनिक हस्तक्षेप की गुहार लगाई। पार्टी की महिला इकाई ने नई दिल्ली सहित देश के कई अलग-अलग हिस्सों में सांसद के खिलाफ लगातार प्रदर्शन किए। इसके बाद 16 अक्टूबर को भाजपा की युवा शाखा ने भी इंफाल में शक्ति प्रदर्शन करते हुए एक बड़ा मार्च आयोजित किया।
सड़कों पर उतरा युवा वर्ग और समर्थन की नई लहर
एक तरफ जहां भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठन अकोइजम के इस्तीफे पर अड़े थे, वहीं इंफाल घाटी में एक समानांतर जनआंदोलन भी आकार लेने लगा। 14 अक्टूबर को इंफाल के मुख्य इलाकों में सांसद के पक्ष में एक विशाल रैली निकाली गई, जिसमें बड़ी तादाद में छात्र और नौजवान शामिल हुए। इस प्रदर्शन में शामिल लोगों ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को राजनीतिक द्वेष के चलते निशाना बना रहा है। रैली में शामिल भीड़ ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए भाजपा के प्रदेश मुख्यालय की ओर कूच किया, जिससे स्थानीय प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी।
इस पूरे मामले में सत्ताधारी दल के भीतर से भी एक अलग सुर सुनाई दिया। भाजपा विधायक टोंगब्रम रॉबिंद्रो सिंह ने अपनी ही पार्टी के कई नेताओं की मुख्यधारा की लाइन से हटकर बयान दिया। उन्होंने संसद के पटल पर मणिपुर के ज्वलंत मुद्दों को प्रखरता से उठाने के लिए अकोइजम की सराहना की और उनके प्रति व्यक्तिगत विश्वास व सम्मान प्रकट किया। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने सांसद को यह नेक सलाह भी दी कि वे अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाएं और कानूनी प्रक्रिया के जरिए खुद को पूरी तरह निर्दोष साबित करें।
दूसरी ओर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने इस विवाद के सामने आने के समय पर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्षता पर संदेह जताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि कानून को बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
भाजपा के अंदरूनी खेमे में रणनीतिक चूक पर मंथन
हालिया घटनाओं के बाद भाजपा के आंतरिक ढांचे में इस बात को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इस मामले से निपटने का तरीका सही था। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि व्यक्तिगत स्तर पर हमलों की झड़ी लगाने से बचा जाना चाहिए था। कुछ नेताओं के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष ए. शारदा देवी द्वारा जरूरत से ज्यादा आक्रामक मुद्रा अपनाना और रैलियां निकालना जमीनी नब्ज को ठीक से न भांप पाने का नतीजा था। घाटी के मेइती बहुल इलाकों में युवाओं के बीच अकोइजम का बढ़ता आकर्षण अब पार्टी के रणनीतिकारों के लिए एक विचारणीय विषय बन गया है।
जमीनी स्तर पर काम करने वाले भाजपा के युवा कार्यकर्ताओं ने भी वरिष्ठ नेतृत्व के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं। वे यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर सांसद के पक्ष में बन रहे माहौल की काट कैसे तैयार की जाए। इस पर पार्टी के रणनीतिकारों ने कार्यकर्ताओं को नई राजनीतिक लाइन पर काम करने का सुझाव दिया है।
वरिष्ठ पदाधिकारियों का सुझाव है कि युवा मोर्चा कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के उस रुख को जनता के बीच उजागर करे, जो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी NRC के विरोध में रहा है। चूंकि अकोइजम मणिपुर में स्थानीय पहचान और सुरक्षा के लिए एनआरसी लागू करने की जोरदार वकालत करते रहे हैं, इसलिए भाजपा कार्यकर्ता इस विरोधाभास को हथियार बनाकर यह संदेश दे सकते हैं कि स्थानीय सांसद की सोच उनकी अपनी ही राष्ट्रीय पार्टी के एजेंडे से मेल नहीं खाती।
आगामी राह और कांग्रेस की भीतरी चुनौतियां
यद्यपि अकोइजम को लेकर एक बड़ा जनसमर्थन दिखाई दे रहा है, लेकिन भाजपा के सभी नेता इसे अपने लिए सीधा खतरा नहीं मानते। पार्टी के एक धड़े का विश्लेषण है कि अकोइजम की राह केवल बाहरी विरोध से नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के अंदरूनी समीकरणों से भी तय होगी। मणिपुर कांग्रेस में पुरानी पीढ़ी के नेताओं का दबदबा आज भी कायम है।
विशेषज्ञों और पार्टी सूत्रों का आकलन है कि पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के प्रभाव वाले पुराने कांग्रेसी खेमे के साथ सामंजस्य बैठाना अकोइजम के लिए आसान नहीं होगा। कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी उनके इस राजनीतिक उभार को सीमित कर सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि घाटी का यह युवा समर्थन अकोइजम को किस मुकाम तक पहुंचाता है और भाजपा अपनी रणनीति में क्या बदलाव करती है।















