राजस्थान के जालोर जिले में स्थित आहोर की पहचान वहां मिलने वाली खास रबड़ी से जुड़ी हुई है। यहां के राठी परिवार द्वारा तैयार की जाने वाली यह पारंपरिक मिठाई पिछले 127 वर्षों से अपने खास स्वाद और शुद्धता के लिए जानी जाती है। इस पारंपरिक स्वाद को हासिल करने के पीछे कई घंटों का कड़ा परिश्रम शामिल होता है, जिसमें शुद्ध गाय के दूध को पारंपरिक चूल्हे पर धीमी आंच में तब तक पकाया जाता है जब तक वह गाढ़ा न हो जाए। लगभग 18 से 20 किलो दूध को लगातार आंच पर खौलाने के बाद महज 4.5 किलो तैयार रबड़ी प्राप्त होती है।
कढ़ाई में घंटों की मेहनत से तैयार होती है लच्छेदार मलाई
इस अनूठी मिठाई को बनाने की विधि पूरी तरह से पारंपरिक और धैर्य की मांग करने वाली है। सबसे पहले एक बड़ी लोहे की कढ़ाई में शुद्ध गाय का दूध डालकर उसे धीमी आंच पर पकाया जाता है। जैसे-जैसे दूध उबलता है, उसके ऊपर मलाई की परत जमने लगती है। इस मलाई को हलवाई बड़ी सावधानी से हटाकर कढ़ाई के किनारों पर लगाते जाते हैं, जबकि बीच का हिस्सा लगातार उबलता रहता है। घंटों तक दूध को इसी क्रम में पकाने से उसकी मात्रा घटती जाती है और वह बेहद गाढ़ा हो जाता है। जब दूध अपनी अंतिम अवस्था में पहुंचता है, तब किनारों पर जमा की गई परतों वाली मलाई को खुरचकर उस गाढ़े दूध में वापस मिला दिया जाता है, जिससे रबड़ी को मलाईदार बनावट और दानेदार स्वाद मिलता है।
दुकान मालिक मुकेश कुमार राठी का अनुभव और रोजाना की खपत
दुकान के संचालक मुकेश कुमार राठी ने बताया कि उनका यह व्यावसायिक प्रतिष्ठान लगभग 127 साल पुराना है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है। यहां रोजाना लगभग 10 से 12 किलो रबड़ी तैयार की जाती है। जब पूरी रबड़ी पककर तैयार हो जाती है, तब इसमें स्वादानुसार शक्कर मिलाई जाती है। इसके बाद इसे सामान्य तापमान पर ठंडा होने के लिए रखा जाता है और फिर ग्राहकों को परोसा जाता है। शादियों, पारिवारिक कार्यक्रमों और अन्य आयोजनों के लिए ऑर्डर मिलने पर इसकी उत्पादन मात्रा काफी बढ़ा दी जाती है।
कीमत और उत्सवों के दौरान मांग में भारी बढ़ोतरी
बाजार में इस उच्च गुणवत्ता वाली गाय के दूध की रबड़ी की कीमत 450 रुपए प्रति किलो है। आहोर के स्थानीय निवासियों के अलावा बाहर से आने वाले पर्यटक और मुसाफिर भी इसे बेहद चाव से खरीदते हैं। शादी-ब्याह और त्योहारी सीजन के दौरान इसकी मांग में जबर्दस्त इजाफा देखा जाता है। इन मौकों पर बड़े आयोजनों के लिए भारी तादाद में अग्रिम आर्डर आते हैं, जिसकी वजह से रोजाना बनने वाली रबड़ी की मात्रा में भी काफी बढ़ोतरी करनी पड़ती है। शुद्ध दूध, धीमी आंच और पारंपरिक मेहनत का यह तालमेल ही इस 127 साल पुराने स्वाद को कायम रखे हुए है।



















