राजस्थान के सिरोही जिले में आबूरोड के समीप स्थित चंद्रावती का ऐतिहासिक भूगोल अपनी जल संरचनाओं और सामरिक बनावट के कारण बेहद अनूठा रहा है। तीन जलधाराओं के मिलन स्थल पर आबाद होने की वजह से इस प्राचीन नगरी को स्थानीय परंपरा में चंद्रोत्री भी पुकारा जाता था। शहर का संपूर्ण जीवन चक्र और बसावट यहां बहने वाली नदियों के प्रवाह तंत्र से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई थी। स्थानीय रहवासी तथा पूर्व सरपंच दिनेश कुमार के अनुसार, पश्चिमी बनास के तट पर विकसित इस ऐतिहासिक नगर का फैलाव सिवरनी और सुकड़ी नदी की घाटियों तक फैला हुआ था। भले ही वर्तमान समय में सिवरनी केवल एक मौसमी अथवा बरसाती नदी के रूप में नजर आती हो, लेकिन बीते दौर में इसके पूरे कछार में विशाल रिहायशी बस्तियां, भव्य मंदिर, दुर्ग और जल संचयन के लिए बावड़ियां मौजूद थीं। बरसात के दिनों में जब पर्वतीय ढलानों से तेज गति से पानी उतरता है, तो सिवरनी का बहाव काफी उफान पर आ जाता है और यह आगे जाकर पश्चिमी बनास में समाहित हो जाती है।
औद्योगिक विकास की मार और मिट्टी के कटाव से उभरते अवशेष
आधुनिक दौर में चंद्रावती क्षेत्र में रीको औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किए जाने के उपरांत स्थानीय जल स्रोतों पर विपरीत असर देखने को मिला है। संगमरमर के अपशिष्ट और मार्बल स्लरी जैसे औद्योगिक कचरे के बहाव से सिवरनी नदी में प्रदूषण का स्तर निरंतर बढ़ता गया है। इसके समानांतर, तेजी से फैलती मानवीय आबादी के दबाव के चलते जलधारा का प्राकृतिक दायरा भी सिमटता चला गया। हालांकि, आज भी जब मानसूनी बारिश के बाद पहाड़ी पानी नदी के तल में उतरता है और जलस्तर में वृद्धि होती है, तो तेज बहाव से होने वाले भू-कटाव के कारण जमीन के भीतर दबे प्राचीन निर्माण और कलात्मक मूर्तियां सतह पर उभरकर दिखने लगती हैं। स्थानीय लोग आज भी इस बस्ती को चंद्रोत्री के नाम से जानते हैं। सदियों पहले जो क्षेत्र विशाल देवालयों, राजमहलों और चहल-पहल भरे व्यापारिक रास्तों से गुलजार रहता था, वह आज एक निहायत शांत गांव के रूप में परिवर्तित हो चुका है। यहां के उत्खनन और सर्वेक्षणों में प्राप्त बहुमूल्य मूर्तियों एवं ऐतिहासिक पुरावशेषों को सुरक्षित रखने के लिए आबूरोड स्थित चंद्रावती नगरी संग्रहालय और माउंट आबू के राजकीय संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।
परमार राजाओं का राजनीतिक केंद्र और व्यापारिक चौराहा
पुरातत्व विभाग और इतिहासकारों द्वारा किए गए गहन अनुसंधानों से यह स्पष्ट तथ्य सामने आया है कि 11वीं और 12वीं शताब्दी के कालखंड में चंद्रावती परमार वंश के शासकों की एक प्रमुख राजधानी हुआ करती थी। इस शहर की भौगोलिक स्थिति सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह राजस्थान, गुजरात और मालवा के क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्गों के केंद्र पर अवस्थित था। भौगोलिक सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत पश्चिमी बनास नदी की घाटी वाले हिस्से में नगर का मुख्य सैन्य किला बनाया गया था, जबकि सिवरनी नदी के घाटी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर धार्मिक प्रतिष्ठान और आम नागरिकों की रिहायशी बस्तियां बसाई गई थीं। इतिहासकार प्रोफेसर जेएस खड़कवाल के मार्गदर्शन और नेतृत्व में संचालित किए गए पुरातात्विक उत्खनन के दौरान इस घाटी से लगभग 36 प्राचीन देवालयों और 12 ऐतिहासिक बावड़ियों के खंडहर उजागर हुए थे, जिनके कलात्मक अवशेष अब संग्रहालयों की धरोहर हैं।
स्थापत्य कला, धार्मिक समन्वय और ऐतिहासिक हमलों के निशान
सिवरनी नदी घाटी में खोजे गए धार्मिक स्थलों में शैव परंपरा के साथ-साथ जैन मत से संबंधित कई भव्य मंदिर शामिल थे। पुरातात्विक खुदाई में यहां से उत्कृष्ट नक्काशीदार शिवलिंग, नंदी की पाषाण प्रतिमाएं तथा जैन तीर्थंकर भगवान महावीर, भगवान पार्श्वनाथ और चौमुखी जैन प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त सनातन परंपरा के प्रमुख देवी-देवताओं जैसे ब्रह्मा, भगवान विष्णु, सूर्य देव और महिषासुरमर्दिनी की अनूठी मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं। इन पाषाण शिल्पों पर उकेरी गई सूक्ष्म नक्काशी उस युगीन मूर्तिकला के उच्च स्तर को बयां करती है। हालांकि, प्राकृतिक बदलावों के साथ-साथ कई आक्रामक हमलों ने इस वैभवशाली नगर को भारी नुकसान पहुंचाया। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक वर्ष 1024 में महमूद गजनवी, वर्ष 1197 में कुतुबुद्दीन ऐबक और कालांतर में अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य हमलों ने इस संपन्न नगरी की समृद्ध संरचनाओं को तहस-नहस कर दिया। वहीं, इस घाटी से मिले 12 प्राचीन जल कुंड और बावड़ियां उस काल के उन्नत जल संरक्षण और प्रबंधन प्रणाली की अद्भुत मिसाल पेश करते हैं।


















