असम में हर साल मानसून के दौरान भारी बारिश और ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसकी सहायक धाराओं में आने वाली बाढ़ आम बात है, लेकिन इस बार प्राकृतिक आपदा का दायरा उन क्षेत्रों तक फैल गया जिन्हें अब तक पूरी तरह सुरक्षित माना जाता था। राज्य के शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट जिलों में इस बार ऐसा गंभीर जलभराव और सैलाब देखा गया, जिसने स्थानीय लोगों और प्रशासन को हैरान कर दिया। इन तीनों ही क्षेत्रों में सैकड़ों बस्तियां पानी में डूब गईं, हजारों नागरिकों को सुरक्षित ठिकानों पर ले जाना पड़ा और कृषि भूमि, सड़कों तथा सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह बना हुआ है कि आखिर जिन इलाकों में कभी गंभीर बाढ़ का खतरा नहीं मंडराता था, वहां इस बार इतनी भयानक तबाही क्यों देखने को मिली। पर्यावरण और जल विज्ञान के जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई प्राकृतिक और इंसानी कारण सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं।
क्यों सुरक्षित माने जाते थे ये जिले
भौगोलिक स्थिति के लिहाज से ऊपरी असम में थोड़ी अधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट को ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित क्षेत्र माना जाता था। इसके विपरीत, धुबरी, बारपेटा या मोरीगांव जैसे निचले इलाकों को हर साल ब्रह्मपुत्र के विशाल और चौड़े बहाव क्षेत्र से आने वाली आपदाओं का सामना करना पड़ता है। इन तीनों जिलों से गुजरने वाली सहायक नदियां जैसे दिखो, दिसांग और झांजी काफी संकरी प्रकृति की हैं। अतीत में यहां जब भी अचानक बाढ़ आती थी, तो उसका असर बहुत कम समय के लिए रहता था और कुछ ही घंटों में पानी उतर जाता था, जिससे हफ्तों तक जलभराव जैसी स्थिति नहीं बनती थी। हालांकि भारी मानसूनी बारिश के दौरान यहां स्थानीय स्तर पर खेतों में पानी भर जाने की छोटी-मोटी घटनाएं जरूर होती थीं, लेकिन निचले असम की तरह बड़े पैमाने पर तटबंध टूटने और व्यापक विस्थापन की स्थिति यहां शायद ही कभी सामने आई थी।
पड़ोसी राज्यों में असाधारण बारिश और ऊपरी इलाकों में भूस्खलन
इस बार की आपदा का मुख्य और सबसे तात्कालिक कारण 18 जुलाई से 20 जुलाई, 2026 के बीच पड़ोसी राज्य नागालैंड में हुई अत्यधिक और असाधारण मानसूनी बारिश थी। नागालैंड में कुल मिलाकर सामान्य से 181 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई, जबकि मोकोकचुंग जिले में तो यह आंकड़ा 493 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसके अलावा मोन जिले में जुलाई महीने की कुल औसत बारिश का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा महज आठ घंटों के भीतर ही बरस गया। इसी समयावधि में असम के चराइदेव जिले में भी 436 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई, जिससे पहाड़ों से नीचे मैदानी इलाकों की ओर पानी के बहाव का एक खतरनाक दबाव बन गया और पूरा क्षेत्र पानी के तेज वेग वाले रास्ते में तब्दील हो गया। नागालैंड की ओर से उतरने वाली तीव्र ढलान वाली सहायक नदियां सीधे शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट के समतल बाढ़-मैदानों में आकर मिलती हैं। चूंकि पहाड़ी क्षेत्र हफ्तों की लगातार बारिश के कारण पहले ही पूरी तरह संतृप्त हो चुके थे, इसलिए वे टिक नहीं पाए और ऊपरी हिस्सों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ, जिससे भारी मात्रा में मलबा, गाद और पानी निचले इलाकों की तरफ बह निकला। जब यह पानी असम के समतल मैदानों में पहुंचा, तो ढलान कम होने के कारण इसका वेग धीमा पड़ गया और तुरंत बड़े पैमाने पर भयंकर जल-जमाव हो गया।
ब्रह्मपुत्र नदी की क्षमता और तटबंधों की विफलता
पूरे राज्य में लगातार हो रही मानसूनी बारिश के कारण ब्रह्मपुत्र नदी का मुख्य जलस्तर पहले से ही खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रहा था। नदी का जलस्तर अत्यधिक होने के कारण यह अपनी सहायक नदियों जैसे दिखो और दिसांग का अतिरिक्त पानी अपने अंदर समाहित नहीं कर पाई। इससे एक प्रकार का विपरीत दबाव पैदा हुआ, जिसके कारण पानी वापस ऊपरी असम के मैदानी इलाकों की तरफ धकेल दिया गया। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए भूमि पेडनेकर और पापोन जैसी हस्तियों ने राज्य के नागरिकों के लिए मदद की पुरजोर अपील की है। इसके अलावा, राज्य में बाढ़ प्रबंधन मुख्य रूप से मिट्टी के तटबंधों के निर्माण जैसी एक ही पुरानी रणनीति पर निर्भर रहा है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां प्राकृतिक रूप से भारी मात्रा में गाद अपने साथ लाती हैं, जिससे समय के साथ नदी की तलहटी लगातार ऊपर उठती चली जाती है और इन्हें अपना मार्ग बदलना पड़ता है। ये स्थिर और कमजोर तटबंध पानी के बदलते तेवर और भारी दबाव को नहीं झेल सके। कई स्थानों पर जैसे डोरिका नदी का तटबंध टूटने से पूरी बस्तियां और नाज़िरा चाय बागानों जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र जलमग्न हो गए।
अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का असर
इस पूरे क्षेत्र में बिना किसी दूरगामी योजना के बनाए गए बुनियादी ढांचे, आवासों और सड़कों के बेतरतीब विस्तार ने महत्वपूर्ण वेटलैंड और निचले भूभागों के प्राकृतिक जलाशयों को लगभग समाप्त कर दिया है। ये वेटलैंड ऐतिहासिक रूप से एक प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते थे जो बाढ़ के अतिरिक्त पानी को अपने अंदर सोख लेते थे। इसके अतिरिक्त, पहाड़ी क्षेत्रों की तलहटी में बड़े पैमाने पर चल रहे वैध और अवैध खनन कार्यों ने नदी की तलहटी से उन मजबूत चट्टानों को हटा दिया है, जो प्राकृतिक रूप से पानी के बहाव को नियंत्रित करती थीं। इस बीच, राहत कार्यों के मोर्चे पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि प्रभावित परिवारों तक मदद पहुंचाई जा रही है।



















