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बदलते युद्धक्षेत्र में केवल हथियार बनाना काफी नहीं, सेनाध्यक्ष धीरज सेठ ने दी लंबे संघर्षों के लिए तैयार रहने की चेतावनीभारत
27 सित॰ 2026, 2:40 pm (34 मिनट पहले)· 0

बदलते युद्धक्षेत्र में केवल हथियार बनाना काफी नहीं, सेनाध्यक्ष धीरज सेठ ने दी लंबे संघर्षों के लिए तैयार रहने की चेतावनी

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने आधुनिक युद्धों के बदलते स्वरूप पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि आज के समय में कम लागत वाले स्मार्ट ड्रोन महंगे सैन्य उपकरणों के लिए भारी खतरा बन चुके हैं और सेना को दीर्घकालिक संघर्षों के लिए तैयार रहना होगा।

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने रक्षा क्षेत्र में देश की रणनीतिक प्राथमिकताओं और युद्धक्षेत्र के बदलते परिदृश्यों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। नई दिल्ली में आयोजित एक रक्षा संगोष्ठी के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का वास्तविक अर्थ केवल घरेलू स्तर पर हथियारों और सैन्य उपकरणों का निर्माण कर लेना नहीं है। इसके बजाय, भारत के पास एक ऐसी सुदृढ़ और दूरदर्शी सैन्य क्षमता होनी चाहिए जिसके बल पर वह लंबे समय तक खिंचने वाले युद्धों में अपनी सामरिक ताकत को बिना किसी रुकावट के बनाए रख सके। 'बदलते युद्ध के दौर में आत्मनिर्भरता' विषय पर व्याख्यान देते हुए सेनाध्यक्ष ने रेखांकित किया कि आधुनिक युद्धों की अवधि, तकनीक और उनके संचालन का तरीका बहुत तेजी से बदल रहा है, जिसके कारण हमारी सैन्य तैयारियों और क्षमताओं के विकास की सोच में भी लगातार लचीलापन और बदलाव होना अत्यंत आवश्यक है।

1971 के विपरीत: अब समाप्त हो चुके हैं स्पष्ट अंत वाले युद्ध

ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए जनरल धीरज सेठ ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के गौरवशाली क्षणों को याद किया। उन्होंने बताया कि ढाका में पाकिस्तानी सेना के ऐतिहासिक आत्मसमर्पण की तस्वीर उस दौर की याद दिलाती है जब युद्धों का एक स्पष्ट और निश्चित अंत हुआ करता था। पिछली सदी के संघर्षों में एक ऐसा निर्णायक क्षण आता था जिसके बाद यह पूरी तरह साफ हो जाता था कि युद्ध समाप्त हो चुका है। हालांकि, समकालीन वैश्विक परिदृश्य में ऐसे स्पष्ट अंत वाले युद्ध अब इतिहास बन चुके हैं। आज के सैन्य संघर्ष बिना किसी स्पष्ट निष्कर्ष के वर्षों तक खिंचते रहते हैं, जिनमें बीच-बीच में थोड़े समय के लिए शांति रहती है और फिर अचानक भीषण गोलाबारी और हिंसक झड़पें शुरू हो जाती हैं। थल सेनाध्यक्ष ने इस नए युद्ध प्रतिमान को 'रुक-रुक कर होने वाले युद्ध' की संज्ञा दी है। उन्होंने आगाह किया कि आधुनिक तकनीक भले ही किसी विशिष्ट लड़ाई की अवधि को कम करने में सक्षम हो, लेकिन वह समग्र युद्ध की अवधि को कम कर पाए, यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है।

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तकनीकी विकास और लंबी सैन्य खरीद प्रक्रियाओं के बीच का द्वंद्व

सेनाध्यक्ष ने इस बात पर विशेष बल दिया कि एक आधुनिक सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी अप्रचलितता से निपटना है। किसी भी नए सैन्य उपकरण या हथियार प्रणाली को डिजाइन करने, उसकी उपयोगिता को परखने, कड़े परीक्षणों से गुजारने और अंततः उसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात करने में कई वर्षों का लंबा समय लग जाता है। इसके विपरीत, आधुनिक तकनीक की दुनिया में हर कुछ महीनों में क्रांतिकारी बदलाव आ जाते हैं। इस कारण सेनाओं के सामने यह बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है कि जिस तकनीक को सेना में शामिल किया जा रहा है, वह उपयोग में आने तक पुरानी न पड़ जाए। इसलिए, भारत की आत्मनिर्भरता की नीति केवल स्वदेशी हथियारों के निर्माण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमें एक ऐसा गतिशील ढांचा बनाना होगा जो नई तकनीकों को तेजी से अपनाने और उन्हें तुरंत अपग्रेड करने की अनुमति दे।

भारतीय भूगोल की विविधता और विशिष्ट समाधानों की आवश्यकता

भारतीय सेना की परिचालन परिस्थितियां दुनिया की अन्य सेनाओं की तुलना में अत्यधिक जटिल और विविध हैं। जनरल धीरज सेठ के अनुसार, हमारे सैनिकों को समुद्र तल की तटीय सीमाओं से लेकर दुनिया के सबसे दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्रों, जैसे सियाचिन ग्लेशियर पर भी तैनात रहना पड़ता है। भारतीय सेना एक तरफ जहां थार मरुस्थल की झुलसाने वाली अत्यधिक गर्मी में सीमा की रक्षा करती है, वहीं दूसरी तरफ हिमालय की शून्य से काफी नीचे वाली जमा देने वाली ठंड का सामना करती है। ऐसी परिस्थितियों में रक्षा प्रणालियों के लिए कोई एक वैश्विक पैमाना या 'वन साइज फिट्स ऑल' का दृष्टिकोण काम नहीं आ सकता। हमारे सभी रक्षा उपकरण और रणनीतिक समाधान पूरी तरह से भारत की अपनी भौगोलिक विविधताओं, कठिन इलाकों और विशिष्ट परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप ही तैयार किए जाने चाहिए।

कम लागत वाले असममित युद्ध और ड्रोनों का बढ़ता खतरा

युद्धक्षेत्र में आ रहे क्रांतिकारी बदलावों का जिक्र करते हुए थल सेनाध्यक्ष ने सस्ते ड्रोनों की बढ़ती मारक क्षमता का उदाहरण दिया। आज के समय में महज कुछ सौ डॉलर की लागत से तैयार किए गए स्मार्ट और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध ड्रोन लाखों-करोड़ों डॉलर मूल्य के भारी-भरकम पारंपरिक सैन्य प्लेटफार्मों, जैसे अत्याधुनिक टैंकों और लड़ाकू वाहनों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। कम लागत वाली, स्मार्ट और बड़ी संख्या में उपलब्ध तकनीक अब बेहद महंगे पारंपरिक रक्षा उपकरणों को आसानी से नष्ट कर सकती है। इस असममित युद्ध ने पारंपरिक सैन्य शक्ति के संतुलन को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। तकनीक अब चुनिंदा महाशक्तियों तक सीमित नहीं है; जो उन्नत सेंसर या प्रणालियां हमारे पास उपलब्ध हैं, वैसे ही साधन हमारे प्रतिद्वंद्वियों के पास भी मौजूद हो सकते हैं। इसलिए असली रणनीतिक बढ़त केवल नई तकनीक हासिल करने से नहीं, बल्कि दुश्मन से तेजी से नए समाधान खोजने और उनकी प्रणालियों का सटीक जवाब तैयार करने से मिलेगी।

पुरानी सैन्य प्रणालियों का आधुनिकीकरण भी है बेहद अहम

जनरल धीरज सेठ ने पुरानी पड़ चुकी सैन्य प्रणालियों को जल्दबाजी में अनुपयोगी मान लेने की प्रवृत्ति के प्रति सचेत किया। उन्होंने बताया कि समकालीन युद्धों के विश्लेषण से पता चलता है कि दशकों पुरानी सैन्य प्रणालियों को यदि नए जमाने की तकनीक से जोड़ दिया जाए, तो वे बेहद घातक साबित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, दशकों पुरानी एयर डिफेंस तोपों को यदि आधुनिक सेंसरों और उन्नत फायर कंट्रोल सिस्टम के साथ एकीकृत किया जाए, तो वे कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोनों और ड्रोन समूहों को मार गिराने में सबसे उत्कृष्ट और किफायती रक्षा कवच साबित हो सकती हैं। भविष्य की सैन्य क्षमता का अर्थ केवल नए और अत्यधिक महंगे हथियारों की निरंतर खरीद करना नहीं है, बल्कि पुरानी और आजमाई हुई प्रणालियों को नए सेंसरों और तकनीकों के साथ अपग्रेड करके उनकी मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाना भी है।

जमीनी नियंत्रण का महत्व और सैनिक-केंद्रित दृष्टिकोण

सूचना युद्ध, साइबर खतरों और अंतरिक्ष रक्षा प्रणालियों जैसे युद्ध के नए उभरते क्षेत्रों के बावजूद, थल सेनाध्यक्ष ने जमीनी सेना के महत्व को सर्वोपरि बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी युद्ध में सफलता का एकमात्र प्रत्यक्ष और निर्णायक संकेतक जमीन पर नियंत्रण स्थापित करना ही होता है। दूर से मार करने वाली मिसाइलें और भारी तोपखाना युद्धक्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं और दुश्मन को कमजोर कर सकते हैं, लेकिन अंतिम रूप से जमीन पर कब्जा करने, उसे अपने नियंत्रण में बनाए रखने और उसकी रक्षा करने का दायित्व केवल एक पैदल सैनिक का ही होता है। यही कारण है कि भारतीय सेना को लंबी मारक क्षमता और मजबूत जमीनी रक्षा क्षमताओं, दोनों की समान रूप से आवश्यकता है। सेना का हर रणनीतिक निर्णय और तकनीकी नवाचार अंततः सैनिक को अधिक सक्षम, सुरक्षित और प्रभावी बनाने पर ही केंद्रित होना चाहिए।

'समर्थ' की अवधारणा और भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के आंकड़े

इन सभी समकालीन और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए थल सेनाध्यक्ष ने सैन्य क्षमता विकास के लिए 'समर्थ' की नई अवधारणा को पेश किया। उन्होंने देश के रक्षा उत्पादन क्षेत्र की प्रगति को लेकर कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और उत्साहजनक आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत में निर्मित रक्षा उत्पाद दुनिया के 80 से अधिक देशों में निर्यात किए जा रहे हैं, जो हमारी बढ़ती वैश्विक साख को प्रदर्शित करता है। इसके अतिरिक्त, भारतीय सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले 175 विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद में से 159 श्रेणियों का पूरी तरह से स्वदेशीकरण किया जा चुका है। इस विशाल स्वदेशी रक्षा उत्पादन प्रणाली में वर्तमान में देश के लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) बेहद सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आत्मनिर्भरता हमें बिना किसी बाहरी दबाव के युद्ध लड़ने की स्वायत्तता देती है, मजबूत क्षमताएं हमें मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करती हैं, और हमारे वीर सैनिक हमें जीतने की इच्छाशक्ति देते हैं।

सवाल-जवाब

थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने आधुनिक युद्धों को 'रुक-रुक कर होने वाले युद्ध' क्यों कहा?
उन्होंने कहा कि आधुनिक संघर्षों का कोई स्पष्ट अंत नहीं होता और ये लंबे समय तक चलते हैं, जिनमें भीषण लड़ाई और अपेक्षाकृत शांति की अवधियां बारी-बारी से आती रहती हैं।
सस्ते ड्रोन महंगे पारंपरिक हथियारों के लिए कैसे खतरा बन गए हैं?
महज कुछ सौ डॉलर की कीमत वाले स्मार्ट ड्रोन लाखों डॉलर मूल्य के टैंकों और लड़ाकू विमानों जैसे भारी सैन्य प्लेटफॉर्म्स को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं।
जनरल धीरज सेठ ने पुरानी सैन्य प्रणालियों के बारे में क्या सलाह दी?
उन्होंने कहा कि पुरानी एयर डिफेंस तोपों जैसी प्रणालियों को नए सेंसरों और फायर कंट्रोल सिस्टम से लैस करके ड्रोन हमलों के खिलाफ प्रभावी ढंग से दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।
भारतीय रक्षा उत्पादन में वर्तमान में कितने लघु उद्योग शामिल हैं?
भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।
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