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बहराइच में घाघरा नदी की तबाही, घर-खेत गंवाकर जंगल में शरण लेने को मजबूर ग्रामीणभारत
29 अग॰ 2026, 10:39 am (33 दिन पहले)· 3

बहराइच में घाघरा नदी की तबाही, घर-खेत गंवाकर जंगल में शरण लेने को मजबूर ग्रामीण

बहराइच जिले में घाघरा नदी के भीषण कटान ने कई ग्रामीणों को बेघर कर दिया है। अपनी जमीन और आशियाना खोने वाले ये लोग अब पास के घने जंगल में तिरपाल और फूस के सहारे अंधेरे और जंगली जानवरों के खौफ के बीच दिन गुजार रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में घाघरा नदी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिसके चलते कई बस्तियां पानी में विलीन हो चुकी हैं। नदी के विकराल रूप और लगातार जारी कटान के कारण उपजाऊ खेत और रिहायशी मकान जलमग्न हो गए हैं। सर्वस्व गंवा चुके इन बेबस परिवारों के सामने रहने का कोई ठिकाना नहीं बचा है, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में पास के घने जंगलों का रुख करना पड़ा है। जानकीनगर और उसके आसपास के तमाम इलाकों में हालात बेहद भयावह बने हुए हैं, जहां लोगों की जिंदगी पूरी तरह उजड़ चुकी है।

जंगल बना आशियाना और अंधेरे में कटती रातें

बाढ़ के पानी और कटान में अपने आशियाने गंवा चुके लोग अब जंगल के बीच कच्चे छप्पर और तिरपाल डालकर रहने को मजबूर हैं। तीरथ का कहना है कि सब कुछ नदी में समा जाने के बाद उनके पास जंगल में रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। वहीं 65 वर्षीय बुजुर्ग गंगाराम ने बताया कि पिछले साल भादव के महीने में उन्हें अपना सबकुछ छोड़कर जानकीनगर से तीन से चार किलोमीटर दूर इस बियाबान जंगल में शरण लेनी पड़ी और यहीं फूस का आशियाना बनाना पड़ा। इस इलाके में बिजली न होने के कारण रात होते ही घना अंधेरा छा जाता है, जिससे लोगों का जीवन और भी दुष्कर हो गया है। कुछ लोग काम चलाने के लिए मुनौचवा टॉर्च लाइट का सहारा लेते हैं, जबकि कई परिवारों के पास वह भी नसीब नहीं है।

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जानवरों का मंडराता खतरा और बच्चों की सुरक्षा की फिक्र

जंगल के भीतर जीवन बिता रहे इन परिवारों के लिए हर एक दिन किसी संघर्ष से कम नहीं है। नदी और जंगल के बिल्कुल पास बसे होने के कारण यहां मगरमच्छ, घड़ियाल और तेंदुओं की आवाजाही बनी रहती है, जो हर पल खौफ पैदा करती है। तीरथ बताते हैं कि कई बार जहरीले सांप सीधे उनकी झोपड़ियों के अंदर तक आ जाते हैं, जिन्हें देखकर लोग सहम जाते हैं। सबसे बड़ी मुसीबत छोटे बच्चों को सुरक्षित रखने की है क्योंकि खेलते-खेलते वे अक्सर नदी के मुहाने या खतरनाक हिस्सों तक पहुंच जाते हैं। बारिश के दिनों में जब घाघरा का जलस्तर उफान पर होता है, तब पानी जंगल के भीतर तक घुस जाता है जिससे स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक हो जाती है।

प्रशासनिक मदद का इंतजार और सुरक्षित ठिकाने की गुहार

कटान का शिकार हुए इन परिवारों का दर्द यह है कि आपदा के बाद प्रशासन की ओर से केवल कुछ ही लोगों को राहत सामग्री मिल पाई है। तीरथ और गंगाराम जैसे दर्जनों लोग आज भी सरकारी मदद और पक्के पुनर्वास की आस में अधिकारियों की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। नरकीय जीवन जी रहे इन ग्रामीणों की सिर्फ एक ही मांग है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन उन्हें जल्द से जल्द किसी सुरक्षित स्थान पर बसाए ताकि वे डर और अंधेरे के साए से बाहर आकर चैन की जिंदगी जी सकें।

सवाल-जवाब

बहराइच में ग्रामीण क्यों बेघर हुए हैं?
घाघरा नदी के भीषण कटान और प्रकोप के कारण कई ग्रामीणों के घर और खेत पानी में समा चुके हैं।
बेघर होने के बाद ग्रामीण कहां रह रहे हैं?
घर और खेत बह जाने के बाद ये पीड़ित गांव के पास स्थित घने जंगल में कच्चे छप्पर और तिरपाल डालकर रहने को मजबूर हैं।
जंगल में रहने वाले ग्रामीणों को किन खतरों का सामना करना पड़ता है?
वहां रहने वाले लोगों पर हर पल मगरमच्छ, घड़ियाल, तेंदुए और जहरीले सांपों का खतरा मंडराता रहता है।
बुजुर्ग गंगाराम ने अपनी स्थिति के बारे में क्या बताया?
गंगाराम ने बताया कि पिछले साल भादव के महीने में सब कुछ छोड़कर उन्हें जानकीनगर से 3-4 किलोमीटर दूर जंगल में आकर तिरपाल का मकान बनाना पड़ा।
ग्रामीणों की प्रशासन से मुख्य मांग क्या है?
ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें जल्द से जल्द किसी सुरक्षित स्थान पर बसाया जाए ताकि वे अंधेरे और खौफ से बाहर आ सकें।
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