भारत की आजादी की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद कर रहा है। हालांकि मध्य प्रदेश के बालाघाट में वह ऐतिहासिक स्थान बदहाली का शिकार है, जहां से महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम का आह्वान किया था। सन 1933 में राष्ट्रपिता द्वारा दिए गए ऐतिहासिक भाषण की याद में बने पक्के मंच से सेनानियों की नाम पट्टिका गायब हो चुकी है और पूरा परिसर आवारा पशुओं का डेरा बन गया है। इस स्थिति से नाराज स्वतंत्रता सेनानी परिवार ने नगर पालिका प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और 15 अगस्त से पहले सम्मानजनक कार्रवाई न होने पर आमरण अनशन शुरू करने की चेतावनी दी है।
1933 की ऐतिहासिक यात्रा और धान के बोरों का मंच
भारत में ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जब पूर्ण स्वराज की मांग तेज हो रही थी, तब महात्मा गांधी ने देशव्यापी भ्रमण शुरू किया था। इसी कड़ी में सन 1933 में वह वर्तमान महाराष्ट्र के भंडारा और गोंदिया जिलों के रास्ते बालाघाट पहुंचे थे। बालाघाट पहुंचने के दौरान उनकी यात्रा लांजी, भानेगांव, किरनापुर, रजेगांव और सरेखा जैसे क्षेत्रों से होकर गुजरी थी। पूरी यात्रा के दौरान गांधी जी के स्वागत में रास्ते सजाए गए थे और हजारों की संख्या में नागरिक सड़कों पर उमड़ पड़े थे।
बालाघाट के इतवारी गंज पहुंचने पर समर्थकों ने गुजरी क्षेत्र में उनके संबोधन के लिए एक अनूठा मंच तैयार किया था। उस समय संसाधनों के अभाव में धान के बोरों को सजाकर एक अस्थायी मंच बनाया गया था। इसी मंच से महात्मा गांधी ने युवाओं से आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर भाग लेने की भावुक अपील की थी। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ समाज से छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करना भी था। गांधी जी के इस ओजस्वी भाषण का गहरा प्रभाव पड़ा और बालाघाट जिले से 365 युवा सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे।
स्वतंत्रता सेनानियों के बोर्ड की सुध भूले जिम्मेदार
देश आजाद होने के बाद इस ऐतिहासिक घटना और 365 स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को अमर बनाने के लिए प्रयास किए गए। गुजरी में धान के बोरों वाले स्थान पर एक पक्का मंच बनाया गया। इस मंच पर भारत माता का चित्र उकेरा गया और साथ में उन सभी 365 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम वाला एक बड़ा बोर्ड स्थापित किया गया था।
समय बीतने के साथ स्थानीय नगर पालिका और प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाल होती चली गई। वर्तमान स्थिति यह है कि मंच पर भारत माता की तस्वीर तो बची हुई है, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों के नामों की सूची वाला बोर्ड गायब हो चुका है। रख-रखाव के अभाव में मंच की स्थिति बेहद जर्जर हो चुकी है और वहां दिन-रात आवारा मवेशियों का जमावड़ा लगा रहता है।
अनूप सिंह बैस के आरोप और आमरण अनशन का अल्टीमेटम
इस ऐतिहासिक धरोहर की उपेक्षा पर स्वतंत्रता सेनानी गोकुल सिंह बैस के पुत्र अनूप सिंह बैस ने कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने नगर पालिका प्रशासन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन ने जानबूझकर स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान से जुड़े बोर्ड को वहां से हटा दिया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्थानीय लोग लंबे समय से पास में स्थित बूढ़ी शराब दुकान को हटाने की मांग कर रहे हैं, जिसे प्रशासन अनसुना कर रहा है।
अनूप सिंह बैस ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि नगर पालिका के प्रतिनिधि रेलवे ओवर ब्रिज के नामकरण जैसे मुद्दों पर राजनीति करते हैं, लेकिन देश को आजाद कराने वाले नायकों का सम्मान बनाए रखने के लिए गंभीर नहीं हैं। उन्होंने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि यदि 15 अगस्त से पहले पूरे सम्मान के साथ स्वतंत्रता सेनानियों का नाम पट्टिका बोर्ड वापस नहीं लगाया गया, तो वह स्वतंत्रता दिवस के दिन से ही उसी मंच पर आमरण अनशन शुरू कर देंगे।



















