देश में वकीलों की सर्वोच्च नियामक संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया के भीतर गहरा प्रशासनिक संकट पैदा हो गया है, जिससे इस प्रतिष्ठित निकाय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। संस्था के को-चेयरमैन और वरिष्ठ अधिवक्ता वाईआर सदाशिव रेड्डी ने चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से उनके पद से इस्तीफा देने की मांग की है। रेड्डी ने अपने पत्र में कथित तौर पर ₹150 करोड़ के कोष की हेराफेरी, अपने रिश्तेदारों की अनैतिक नियुक्तियों और NALSAR के छात्रों के खिलाफ की गई कथित अवैध कार्रवाइयों का हवाला दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी यह मांग किसी व्यक्तिगत रंजिश के कारण नहीं है। तीन दशकों से अधिक समय से कानूनी पेशे में सक्रिय रहने और बीसीआई के निर्वाचित सदस्य होने के नाते इस पूरे मामले पर चुप रहना उनके लिए संभव नहीं था।
वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप और विशेष ऑडिट की मांग
यह पूरा विवाद संस्था के भीतर संसाधनों और वित्तीय निधियों के उपयोग को लेकर शुरू हुआ है। को-चेयरमैन वाईआर सदाशिव रेड्डी द्वारा चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को भेजे गए औपचारिक पत्र में संस्थागत प्रबंधन और वित्तीय फैसलों को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। पत्र में सबसे प्रमुख मुद्दा ₹150 करोड़ की भारी राशि के कथित डायवर्जन का है, जिसके कारण संस्था की वित्तीय निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
वित्तीय अनियमितताओं की तह तक पहुंचने के लिए रेड्डी ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और BCI Trust PEARL First के सभी वित्तीय खातों का तत्काल एक विशेष ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि देश भर के कानूनी पेशेवरों के बीच विश्वास बहाल करने के लिए खातों की पूर्ण पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही रेड्डी ने यह मांग भी रखी है कि कानून कॉलेजों, विश्वविद्यालयों या उनके प्रबंधन निकायों को दिए जाने वाले किसी भी प्रकार के अंशदान, दान या वित्तीय भुगतान पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए, जब तक कि जांच पूरी न हो जाए।
मानव संसाधन प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी पत्र में कड़े कदम उठाने की मांग की गई है। रेड्डी ने कहा कि बीसीआई के तहत कार्यरत सभी कर्मचारियों की स्थिति, उनके पदों और भर्ती विवरणों को आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और अपने परिवार के सदस्यों को पदों पर बिठाने के आरोपों की सच्चाई सामने आ सकेगी और संस्था में जवाबदेही तय होगी।
वैधानिक अधिकारों का हवाला और प्रशासनिक सुधारों का आह्वान
अपने पत्र में वाईआर सदाशिव रेड्डी ने बीसीआई के वैधानिक ढांचे का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि यह संस्था किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन Advocates Act, 1961 के तहत एक स्वायत्त वैधानिक निकाय के रूप में किया गया है। इस निकाय के पास देश के लाखों वकीलों से एकत्र किए गए कोष की कस्टडी होती है, और इसके पास वकालत के पेशे में प्रवेश, शिक्षा और नियमन से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार निहित हैं।
रेड्डी ने जोर देकर कहा कि संस्था के पास उपलब्ध संसाधनों, अधिकारों और शक्तियों का उपयोग केवल और केवल देश के वकीलों और बार के व्यापक हितों के लिए किया जाना चाहिए, न कि किसी पद पर बैठे व्यक्ति के व्यक्तिगत लाभ के लिए। चेयरमैन के साथ अपने लंबे अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वे लगभग एक दशक तक परिषद में मिश्रा के साथ काम कर चुके हैं। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में संस्था के भीतर व्यापक सुधार जरूरी हो गए हैं, और जब तक मिश्रा अपने पद पर बने रहेंगे, तब तक संस्था की स्थिति में सुधार होना संभव नहीं है।
रेड्डी ने अपने पत्र के अंत में कड़े शब्दों में कहा कि देश का कानूनी समुदाय अपनी ही नियामक संस्था से एक बेहतर और पारदर्शी व्यवस्था का हकदार है। उन्होंने मनन कुमार मिश्रा को पत्र मिलने की तारीख से 15 दिनों के भीतर अपने पद से हटने का अल्टीमेटम दिया है। इसके साथ ही उन्होंने उठाए गए सभी मुद्दों पर गहन चर्चा के लिए बीसीआई की एक तत्काल विशेष बैठक बुलाने की भी मांग की है।
इस्तीफे की मांग खारिज और टिप्पणी पर कड़ा विरोध
दूसरी तरफ, बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों और इस्तीफे की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। शुक्रवार को स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वे अपने पद से किसी भी कीमत पर इस्तीफा नहीं देंगे। उन्होंने उस विरोध प्रदर्शन का भी सख्त विरोध किया जिसे CJP के अभिजीत दीपके की ओर से समर्थन मिल रहा था। सीजेपी ने बीसीआई कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए देशभर के अधिवक्ताओं से इसमें शामिल होने की अपील की थी।
मनन कुमार मिश्रा ने विरोध प्रदर्शन के दौरान कानूनी समुदाय के लिए इस्तेमाल की गई भाषा पर अत्यधिक नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने सीजेपी की ओर से वकीलों के लिए इस्तेमाल किए गए विवादित शब्द पर कड़ा ऐतराज जताया। अपनी प्रतिक्रिया में मिश्रा ने कहा कि दोबारा कभी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने की हिम्मत न करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी वकील इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी का पात्र नहीं है, क्योंकि अधिवक्ता समाज के एक बेहद सम्मानित और बुद्धिमान वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
NALSAR विवाद और संस्था के भीतर बढ़ता तनाव
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के भीतर यह शीर्ष स्तरीय टकराव ऐसे समय में सामने आया है जब NALSAR के छात्रों से जुड़ा मामला पहले से ही चर्चा के केंद्र में था। रेड्डी ने मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ अपनी शिकायतों की सूची में एनएएलएसएआर छात्रों के खिलाफ की गई कथित अवैध कार्रवाइयों को भी एक मुख्य आधार बनाया है। इस मुद्दे ने गवर्निंग बॉडी और देश के कानूनी हलकों में असंतोष को और अधिक बढ़ा दिया है।
15 दिनों के भीतर इस्तीफे की समय सीमा, खातों का विशेष ऑडिट और बीसीआई की विशेष बैठक जैसी मांगों के सार्वजनिक होने से संस्था के भीतर का आंतरिक मतभेद अब पूरी तरह से सतह पर आ चुका है। हालांकि, कानूनी जानकारों का मानना है कि वित्तीय हेराफेरी और प्रशासनिक अनियमताओं के इन आरोपों पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों के आधिकारिक जवाब और निष्पक्ष जांच की प्रतीक्षा की जानी चाहिए।



















