मानसून की शुरुआत होते ही खेतों में नेपियर घास, ज्वार और मक्का जैसी हरी फसलें लहलहाने लगती हैं और पशुपालकों के लिए यह चारा दूध बढ़ाने का सबसे आसान जरिया बन जाता है. लेकिन पशु चिकित्सकों और अनुभवी किसानों की मानें तो यही हरा चारा अगर सही तरीके से न खिलाया जाए तो पशुओं की सेहत के लिए खतरा भी बन सकता है. बारिश के मौसम में गीला या ओस से तर चारा एकदम ज्यादा मात्रा में खिला देने पर पशुओं का पेट फूलने लगता है और उन्हें दस्त की शिकायत हो सकती है, इसलिए पशुपालकों को चारे की भरमार देखकर जल्दबाजी में उसे सीधे पशुओं के आगे डालने से बचना चाहिए और एक सोची-समझी आहार योजना अपनानी चाहिए, ताकि पशु स्वस्थ रहें और दूध का उत्पादन भी घटे नहीं.
शाहजहांपुर के प्रगतिशील युवा किसान रणजोद सिंह के मुताबिक बरसात में उगने वाला हरा चारा पोषक तत्वों के लिहाज से भरपूर तो होता है, लेकिन इसमें पानी की मात्रा बहुत ज्यादा और फाइबर यानी रेशे की मात्रा काफी कम रह जाती है. यही वजह है कि इसे अचानक और बड़ी मात्रा में खिलाने पर पशु के पेट में गैस बनने लगती है. रणजोद सिंह की सलाह है कि हरे चारे को हमेशा कुछ देर धूप में सुखाकर या सूखे भूसे में मिलाकर ही पशुओं को खिलाया जाए. इसके साथ ही उन्होंने इस मौसम में पशुओं के पीने के पानी की सफाई का खास ख्याल रखने और नियमित तौर पर पेट के कीड़ों की दवा पिलाने की भी सलाह दी है. उनका कहना है कि पशुओं को मिनरल मिक्सचर देना बिल्कुल न भूलें, क्योंकि इसी से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है.
गीला चारा खिलाने से पहले बरतें ये सावधानियां
बारिश के दिनों में हरे चारे में नमी का स्तर बहुत बढ़ जाता है, इसलिए खेत से काटते ही उसे तुरंत पशुओं के आगे नहीं डाल देना चाहिए. चारा काटने के बाद उसे कुछ घंटों तक किसी छायादार और हवादार जगह पर फैलाकर रखें, जिससे उसकी अतिरिक्त नमी अपने आप उड़ जाए. अगर यह सावधानी नहीं बरती गई तो गीला और संदूषित चारा खिलाने से पशुओं में टॉक्सिसिटी यानी शरीर में जहर फैलने का खतरा बढ़ जाता है. सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि चारे को पहले साफ पानी से धो लिया जाए और फिर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर ही पशुओं को दिया जाए.
60 और 40 के अनुपात वाला फॉर्मूला अपनाएं
बरसात में सिर्फ हरा चारा खिलाते रहना पशुओं के लिए सही नहीं माना जाता, बल्कि इस मौसम में संतुलित आहार देना ही सबसे सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीका है. पशुओं के रोजाना के आहार में 60 प्रतिशत हरा चारा और 40 प्रतिशत सूखा चारा जैसे गेहूं का भूसा आपस में मिलाकर खिलाना चाहिए. ज्वार खिलाते समय एक बात का खास ध्यान रखना जरूरी है कि वह बहुत छोटी या सूखी अवस्था वाली न हो, क्योंकि ऐसी हालत में ज्वार में हाइड्रोसायनिक एसिड नाम का जहरीला तत्व बन सकता है. इसलिए पशुओं को हमेशा फूल आने के बाद वाली ज्वार ही खिलानी चाहिए.
दूध का उत्पादन बनाए रखने के लिए आहार में क्या जोड़ें
बरसात के मौसम में भी दूध का उत्पादन स्थिर बना रहे, इसके लिए पशुओं को संतुलित पशु आहार देना बेहद जरूरी माना गया है. सामान्य नियम यह है कि हर दो लीटर दूध पर कम से कम एक किलोग्राम अनाज या दाना मिश्रण पशु को जरूर खिलाया जाए. इसके अलावा रोजाना 50 ग्राम अच्छी गुणवत्ता वाला मिनरल मिक्सचर और नमक भी उनके आहार में शामिल करना चाहिए. इससे पशुओं के शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी नहीं होती, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है और साथ ही दूध का गाढ़ापन व मात्रा दोनों बेहतर बने रहते हैं.
पशुशाला की सफाई और बीमारियों से बचाव जरूरी
बरसात के मौसम में पशुओं के थनों में संक्रमण फैलने वाली थनैला बीमारी और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है. इनसे बचने के लिए पशुशाला को हमेशा सूखा और साफ रखना चाहिए और फर्श पर कीचड़ जमा न होने दें. दूध निकालने से पहले और बाद में पशुओं के थनों को पोटेशियम परमैंगनेट यानी लाल दवा के घोल से साफ करना चाहिए. साथ ही समय पर पशुओं का टीकाकरण करवाना और मच्छरों व मक्खियों से बचाव के लिए गोशाला में कपूर या नीम की पत्तियों का धुआं करते रहना भी बेहद जरूरी है.











