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भरण पोषण मामले में पत्नी की कमाई और संपत्ति पर जिरह कर सकेगा पति, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द किया निचली अदालत का फैसलाछत्तीसगढ़
2 सित॰ 2026, 8:37 pm (22 दिन पहले)· 2

भरण पोषण मामले में पत्नी की कमाई और संपत्ति पर जिरह कर सकेगा पति, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द किया निचली अदालत का फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में माना है कि गुजारा भत्ता मुकदमों में निष्पक्ष न्याय के लिए पति को पत्नी की आय के स्रोतों पर सवाल उठाने की पूरी अनुमति होनी चाहिए। अदालत ने दुर्ग फैमिली कोर्ट द्वारा रोक लगाने वाले आदेश को खारिज करते हुए आगामी सुनवाई में जिरह का रास्ता साफ किया है।

वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता से जुड़े मुकदमों की प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण के मामलों में पति को अपनी पत्नी की आय, वित्तीय साधनों और कमाई के स्रोतों पर जिरह करने का पूर्ण कानूनी अधिकार प्राप्त है। इस व्यवस्था के साथ ही उच्च न्यायालय ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के उस पूर्व आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके जरिए पति को पत्नी के वित्तीय ब्योरे पर सवाल पूछने से रोक दिया गया था।

आय विवरण पर निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत

उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने अपने आदेश में जोर देकर कहा कि किसी भी कानूनी मामले की निष्पक्ष सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को अपनी बात साबित करने का समान अवसर मिलना अनिवार्य है। जिस प्रकार एक पत्नी को अपने पति की कुल आय, चल-अचल संपत्ति और वित्तीय स्थिति के बारे में सवाल करने का अधिकार होता है, ठीक उसी तरह पति को भी पत्नी की तरफ से दिए गए आय विवरण की सच्चाई जांचने का पूरा हक है। अदालत का मानना है कि इस प्रक्रिया से भरण-पोषण की राशि तय करते समय दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति पारदर्शी रूप से सामने आ सकेगी।

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दुर्ग फैमिली कोर्ट के पाबंदी वाले आदेश से उपजा विवाद

यह पूरा कानूनी मामला रायपुर निवासी एक महिला द्वारा दायर भरण-पोषण याचिका से जुड़ा हुआ है। महिला ने अपने पति के विरुद्ध दुर्ग स्थित फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दिया था। न्यायिक कार्यवाही के दौरान महिला ने अपनी संपत्ति और मासिक आय से संबंधित जानकारियों का ब्योरा एक शपथ पत्र के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया था। जब पति के वकील ने शपथ पत्र में दिए गए आंकड़ों और दावों पर सवाल उठाने चाहे, तब 3 अगस्त को दुर्ग फैमिली कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित कर दिया। इस आदेश के तहत पति को पत्नी की आय से जुड़े बिंदुओं पर किसी भी प्रकार की जिरह करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उच्च न्यायालय में याचिका और आगामी निर्देश

फैमिली कोर्ट द्वारा जिरह पर पाबंदी लगाए जाने के बाद पति ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि यदि शपथ पत्र की जानकारियों की सत्यता पर सवाल पूछने का अवसर नहीं दिया जाएगा, तो वह अदालत में अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने में पूरी तरह असमर्थ रहेगा। उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की समीक्षा करने के पश्चात निचली अदालत का फैसला निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट को निर्देशित किया है कि आगामी 11 सितंबर को प्रस्तावित सुनवाई के दौरान पति को पत्नी के आय ब्योरे पर जिरह करने की अनुमति प्रदान की जाए। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट हिदायत भी जारी की है कि जिरह की आड़ में सवालों को बार-बार न दोहराया जाए, जिससे अदालत का समय नष्ट न हो और मुकदमे की सुनवाई अनावश्यक रूप से लंबी न खिंचे।

सवाल-जवाब

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण पोषण मामले में क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण के मुकदमों में पति को पत्नी की आय और कमाई के स्रोतों पर जिरह करने का पूरा अधिकार है।
यह मामला किस जिले की फैमिली कोर्ट से शुरू हुआ था?
यह विवाद रायपुर निवासी महिला द्वारा दुर्ग स्थित फैमिली कोर्ट में दायर भरण-पोषण की अर्जी से शुरू हुआ था।
दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 3 अगस्त को क्या आदेश जारी किया था?
दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 3 अगस्त के अपने आदेश के जरिए पति को पत्नी के आय शपथ पत्र पर जिरह करने से रोक दिया था।
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए क्या तारीख निर्धारित की है?
हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट को 11 सितंबर को होने वाली आगामी सुनवाई में पति को जिरह की अनुमति देने का निर्देश दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·22 दिन पहले

यह फैसला पारिवारिक अदालतों में अक्सर आने वाले उस पेंच को सुलझाता है जहाँ भरण-पोषण के मुकदमों में केवल एक पक्ष की वित्तीय स्थिति को ही परखा जाता था। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत दोनों पक्षों को वित्तीय पारदर्शिता का समान अधिकार मिलना ही चाहिए। इस फैसले से आगे चलकर झूठे या आधे-अधूरे वित्तीय हलफनामों के जरिए अदालत को गुमराह करने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी, और मुकदमों में निष्पक्षता सुनिश्चित होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·22 दिन पहले

यह फैसला पारिवारिक विवादों की सुनवाई में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक अहम कदम है। अक्सर देखा जाता है कि वित्तीय हलफनामों की आड़ में वास्तविक आय छिपाई जाती है, जिससे सही भरण-पोषण राशि तय करने में बाधा आती है। हाईकोर्ट के इस निर्देश से निचली अदालतों में चल रहे ऐसे मामलों के ट्रायल की गति तेज होगी और दोनों पक्षों को अपने दावे साबित करने का स्पष्ट अवसर मिलेगा।

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