युद्ध के मैदान में एक पुरानी कहावत बहुत मशहूर है कि किसी भी लड़ाई की रणनीति वहां की जमीन और भूगोल तय करते हैं। जब किसी देश की बख्तरबंद टुकड़ियां दुश्मन के इलाके में दाखिल होती हैं, तो उनके रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट पानी के प्राकृतिक या इंसानी स्रोत बनते हैं। गहरी नदियां, उफनते नाले और चौड़ी नहरें भारी टैंकों की रफ्तार को पूरी तरह रोक देती हैं। दुश्मन सेना अक्सर इन्हीं जल बाधाओं के दूसरे छोर पर अपनी तोपें और बंकर बनाकर बैठती है। अगर आगे बढ़ रही सेना पानी के किनारे फंस जाए, तो दुश्मन का तोपखाना उस पर आसानी से भारी तबाही मचा सकता है। इसी चुनौती से निपटने और अपनी बख्तरबंद ब्रिगेड की तूफानी रफ्तार बनाए रखने के लिए भारतीय सेना ने 'सर्वत्र' ब्रिज सिस्टम को मोर्चे पर उतारा है। यह अत्याधुनिक सिस्टम महज कुछ ही मिनटों में विशाल नदियों और पक्की नहरों पर बेहद मजबूत पुल तैयार कर देता है, जिससे टी-90 और अर्जुन जैसे 70 टन वजनी मुख्य युद्धक टैंक बिना अपनी गति धीमी किए सीधे दुश्मन के इलाके में प्रवेश कर जाते हैं।
भूगोल और युद्ध रणनीति: पानी कैसे बनता है सबसे बड़ा रोड़ा
सैनिक इतिहास इस बात का गवाह है कि भूगोल ने हमेशा बड़े-बड़े युद्धों का परिणाम तय किया है। जब वर्ष 1971 का युद्ध शुरू हुआ था, तब पूर्वी मोर्चे यानी बांग्लादेश में भारतीय सेना के सामने बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियां थीं। वहां चारों तरफ फैली अनगिनत नदियां और दलदली जमीन दुश्मन के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह खड़ी थीं। इन प्राकृतिक जल स्रोतों को पार करना बेहद जोखिम भरा था, लेकिन भारतीय सेना ने बेहतरीन रणनीति और असाधारण गतिशीलता के दम पर बहुत ही कम समय में ढाका तक अपनी पहुंच बना ली। उस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने हेलीकॉप्टरों की मदद से नदियों को हवा के रास्ते लांघ लिया था, जबकि पीटी-76 एंफिबियस टैंकों ने पानी में तैरकर दुश्मन के रक्षा घेरे को तहस-नहस कर दिया था।
कुदरती बनावट को सैन्य रणनीति में हमेशा एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' यानी ताकत बढ़ाने वाले हथियार की तरह देखा जाता है। प्राचीन काल में जब ग्रीक राजा लियोनिडास ने थर्मोपाइली के बेहद संकरे दर्रे में युद्ध लड़ा था, तब उनकी महज कुछ सौ सैनिकों की छोटी सी टुकड़ी ने फारस की लाखों की विशाल सेना को दिनों तक रोके रखा था। यह ऐतिहासिक चमत्कार केवल उस संकरी भौगोलिक बनावट के कारण संभव हो पाया था। दुनिया की हर आधुनिक सेना में इसी वजह से कॉम्बैट इंजीनियर्स यानी सैपर्स की एक विशेष टुकड़ी रखी जाती है। इन कॉम्बैट इंजीनियर्स का मुख्य काम दुश्मन की प्रगति के रास्ते में कठिन रुकावटें पैदा करना होता है, जबकि अपनी सेना की आवाजाही के लिए दुर्गम रास्तों और नदियों को आसान बनाना होता है।
बख्तरबंद टुकड़ियों की रफ्तार और दुश्मन को पछाड़ने की कला
सैन्य रणनीति और रणनीतिक युद्धशास्त्र में गतिशीलता को ही विजय की सबसे बड़ी कुंजी माना गया है। प्राचीन और मध्यकालीन दौर में जो काम घुड़सवार टुकड़ियां करती थीं, आधुनिक युग में वही काम बख्तरबंद टैंक और इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल करते हैं। जब भारी बख्तरबंद गाड़ियां तेज गति से दुश्मन की सीमाओं में प्रवेश करती हैं, तो विरोधी सेना को अपनी रक्षा पंक्ति संभालने या जवाबी कार्रवाई की रणनीति बनाने का अवसर ही नहीं मिलता। दूसरे विश्व युद्ध के शुरुआती चरण में जर्मनी की 'ब्लिट्जक्रीग' यानी बिजली की सी तेज गति से हमला करने की रणनीति ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। जर्मन टैंकों की इसी गतिशीलता के कारण पोलैंड और फ्रांस जैसे देशों के बड़े भूभाग देखते ही देखते उनके कब्जे में चले गए थे।
इसी तरह हाल के दशकों में हुए खाड़ी युद्धों के दौरान भी बख्तरबंद ताकतों की यही क्षमता देखने को मिली थी। अमेरिकी सेना के टैंकों ने विशाल रेगिस्तानी इलाके में अभूतपूर्व रफ्तार से आगे बढ़कर इराकी मोर्चों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। जब बख्तरबंद टुकड़ियां दुश्मन के रक्षात्मक तंत्र को चीरते हुए तेजी से पीछे निकल जाती हैं, तो वे दुश्मन की रसद आपूर्ति यानी सप्लाई लाइन को पूरी तरह काट देती हैं। इससे अग्रिम पंक्ति में तैनात दुश्मन सैनिक अलग-थलग पड़ जाते हैं और उनके पास आत्मसमर्पण के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
सैन्य रुकावटों के चार बड़े मकसद: दुश्मन को फंसाने का खतरनाक जाल
युद्ध क्षेत्र में कॉम्बैट इंजीनियर्स द्वारा तैयार की जाने वाली रुकावटें मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं। पहली कुदरती या प्राकृतिक रुकावटें, जैसे नदियां, दलदल, पहाड़ और घने जंगल। दूसरी इंसानों द्वारा निर्मित बाधाएं, जैसे बारूदी सुरंगों के खेत, टैंक-रोधी खाइयां और कंक्रीट के अवरोध। इन सभी रुकावटों का मूल उद्देश्य विरोधी सेना की रफ्तार को धीमा करना या उसे पूरी तरह एक जगह रोक देना होता है। सैपर्स इन बाधाओं को इन्फैंट्री और तोपखाने के साथ मिलकर इस तरह डिजाइन करते हैं कि दुश्मन सीधे उनकी मारक सीमा के भीतर आ जाए।
रणनीतिक दृष्टिकोण से सैन्य बाधाओं के मुख्य रूप से चार बड़े उद्देश्य होते हैं
- डिसरप्ट करना (भंग करना): इस प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ रही दुश्मन सेना की संगठित बनावट और क्रम को तोड़ दिया जाता है। जब दुश्मन की टुकड़ियां बिखर जाती हैं, तो उन पर अलग-अलग हमला करके उन्हें नष्ट करना बेहद आसान हो जाता है।
- फिक्स करना (एक जगह रोकना): इसका मकसद दुश्मन की गतिशीलता को पूरी तरह धीमा या शून्य कर देना होता है। जब दुश्मन एक निश्चित स्थान पर रुक जाता है, तो तोपखाना उस पर बेहद सटीक और घातक गोलाबारी कर सकता है।
- टर्न करना (दिशा मोड़ना): इस रणनीति के तहत दुश्मन को उस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां पहले से ही घात लगाकर हमारी मुख्य मारक क्षमता तैनात होती है।
- ब्लॉक करना (रास्ता पूरी तरह बंद करना): इस तरीके से दुश्मन के आगे बढ़ने के सभी संभावित रास्तों को पूरी तरह सील कर दिया जाता है। जब ये चारों तरीके एक साथ मिलाकर इस्तेमाल किए जाते हैं, तो एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनता है जिसे भेदना लगभग असंभव होता है।
वाटर क्रॉसिंग की बड़ी चुनौतियां: मार्केट गार्डन से लेकर योम किप्पुर तक
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि पानी की रुकावटों ने दुनिया के बड़े से बड़े सेनापतियों और रणनीतिकारों की योजनाओं पर पानी फेरा है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने 'ऑपरेशन मार्केट गार्डन' नाम से एक बेहद महत्त्वाकांक्षी अभियान शुरू किया था। इसका मुख्य लक्ष्य नीदरलैंड्स में राइन नदी पर बने रणनीतिक पुलों पर कब्जा करना था। अगर मित्र देश उन पुलों को सुरक्षित पार कर लेते, तो वह युद्ध कई महीने पहले ही समाप्त हो जाता। हालांकि, आर्नहेम में स्थित अंतिम पुल पर समय पर कब्जा नहीं किया जा सका। इसका परिणाम यह हुआ कि मित्र राष्ट्रों को राइन नदी को पार करने में छह महीने का अतिरिक्त समय लग गया, जिसके कारण युद्ध लंबा खिंच गया।
इसके ठीक विपरीत, 1973 के 'योम किप्पुर युद्ध' में मिस्र की सेना ने जल बाधा को पार करने का एक अद्भुत कारनामा कर दिखाया था। इजरायल ने स्वेज नहर के पूर्वी किनारे पर 'बार-लेव लाइन' नाम से बालू की एक विशाल और ऊंची दीवार बना रखी थी, जिसे भेदना नामुमकिन माना जाता था। मिस्र के कॉम्बैट इंजीनियर्स ने हाई-प्रेशर वॉटर कैनन यानी तेज दबाव वाली पानी की बौछारों का इस्तेमाल करके उस विशाल बालू की दीवार को महज कुछ ही घंटों में बहा दिया। इसे सैन्य इतिहास का सबसे साहसी और सफल वॉटर क्रॉसिंग ऑपरेशन माना जाता है। भारत ने भी 1971 के युद्ध के दौरान मेघना नदी को हेलीकॉप्टरों की मदद से पार करके ऐसा ही साहसिक कारनामा किया था, जिससे पाकिस्तानी सेना की पूरी रक्षा योजना ध्वस्त हो गई थी।
पंजाब और जम्मू बॉर्डर की जमीनी हकीकत: इचोगिल नहर और बारूदी सुरंगें
यदि भारत की पश्चिमी सीमाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाए, तो पंजाब और जम्मू का मैदानी इलाका अनगिनत नदियों, बरसाती नालों और पक्की नहरों से भरा पड़ा है। इन क्षेत्रों में संभावित दुश्मन ने जल बाधाओं के आसपास बेहद मजबूत रक्षात्मक किलेबंदी कर रखी है। पाकिस्तान की सीमा के भीतर स्थित 'बमबांवाली-रावी-बेदियां' यानी इचोगिल नहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग 45 मीटर चौड़ी यह कंक्रीट नहर सीधे लाहौर शहर की रक्षा पंक्ति के रूप में कार्य करती है। युद्ध की स्थिति में इस नहर तक पहुंचने से पहले भारतीय बख्तरबंद सेना को बारूदी सुरंगों के घने और खतरनाक जाल से निपटना होगा।
सुरंगों के उस कठिन जाल को पार करने के बाद भी सेना के सामने 45 से 50 मीटर चौड़ी पानी की रुकावट खड़ी होगी। इस नहर के दूसरे किनारे पर दुश्मन अपने पक्के बंकरों में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों और तोपखाने के साथ मुस्तैद रहता है। जब भी कोई सेना पानी की रुकावट को पार करने का प्रयास करती है, तो उसकी गाड़ियों को एक संकरे पुल या पॉइंट पर जमा होना पड़ता है, जिसे सैन्य भाषा में 'चोक पॉइंट' कहा जाता है। चोक पॉइंट पर जमा हुई सेना दुश्मन के तोपखाने के लिए बहुत आसान निशाना बन जाती है।
'सर्वत्र' ब्रिज सिस्टम की क्षमता: 100 मिनट में 75 मीटर पुल और 70 टन के टैंक पार
इसी गंभीर चोक पॉइंट की समस्या का स्थायी समाधान है भारतीय सेना का 'सर्वत्र' ब्रिज सिस्टम। 'सर्वत्र' एक मल्टी-स्पैन मोबाइल ब्रिजिंग सिस्टम है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशाला 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (इंजीनियर्स)' ने भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) और अन्य स्वदेशी साझेदारों के साथ मिलकर विकसित किया है। यह सिस्टम 8x8 मल्टी-एक्सल टाट्रा ट्रकों के चेसिस पर स्थापित होता है।
जब सेना को किसी चौड़ी नहर या नदी को पार करना होता है, तो 'सर्वत्र' की 5 अलग-अलग गाड़ियां मौके पर पहुंचती हैं। इस सिस्टम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं
- विस्तार क्षमता: सर्वत्र का प्रत्येक स्पैन (भाग) 15 मीटर लंबा होता है। जब इसके 5 स्पैन आपस में कैंची की तरह जुड़ते हैं, तो यह 75 मीटर चौड़ी जल बाधा पर एक अखंड पुल तैयार कर देता है।
- असाधारण लोड क्षमता: यह पुल 'मिलिट्री लोड क्लास 70' (MLC 70) मानकों के अनुरूप है। इसका अर्थ यह है कि इस पर से 70 टन तक वजनी बख्तरबंद गाड़ियां आसानी से गुजर सकती हैं। भारत का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 'भीष्म' (वजन लगभग 48 टन) और अत्यधिक भारी 'अर्जुन' टैंक (वजन लगभग 62 से 68 टन) इस पुल से पूरी रफ्तार में निकल सकते हैं।
- कम समय में तैनाती: सैपर्स की टीम महज 100 मिनट के भीतर पूरे 75 मीटर लंबे पुल को जोड़कर चालू कर देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि दुश्मन को अपनी तोपें या मिसाइलें नए पॉइंट पर तैनात करने का मौका ही नहीं मिलता।
- स्वचालित तंत्र: इस सिस्टम में पूरी तरह से हाइड्रोलिक और कंप्यूटर-नियंत्रित मैकेनिज्म का उपयोग किया गया है, जिससे सैनिकों को दुश्मन की गोलाबारी के बीच कम से कम जोखिम उठाना पड़ता है।
सर्वत्र ब्रिज सिस्टम की तैनाती ने भारतीय सेना की बख्तरबंद कोर को वह आक्रामक बढ़त प्रदान की है, जिससे पश्चिमी सीमाओं पर स्थित नहरों और नदियों का सुरक्षा कवच पूरी तरह बेअसर हो जाता है। अब न तो इचोगिल जैसी नहरें और न ही पंजाब-जम्मू की नदियां भारतीय टैंकों का रास्ता रोक सकती हैं।














