उत्तर भारत के छह प्रमुख राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना आखिरकार धरातल पर उतरने जा रही है। लगभग छह दशकों से फाइलों और बैठकों में उलझा यह साझा जल समझौता 15 सितंबर को औपचारिक सहमति में तब्दील हो रहा है। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में दोपहर 12 बजे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में इस ऐतिहासिक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस बड़े अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेंगे। इसके अलावा केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल भी इस समझौते के गवाह बनेंगे।
समझौते की रूपरेखा और राज्यों की भागीदारी
इस बहुप्रतीक्षित परियोजना को लेकर जून महीने में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें सभी हितधारक राज्यों के बीच बुनियादी सहमति तैयार हो गई थी। मंगलवार को होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर उसी आम सहमति को वैधानिक और प्रशासनिक अमलीजामा पहनाएंगे। इस समझौते से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के आपसी जल और विद्युत बंटवारे का एक नया ढांचा स्थापित होगा। वित्तीय बोझ को संतुलित रखने के लिए केंद्र सरकार ने इस परियोजना के जल घटक का 90 प्रतिशत खर्च खुद वहन करने का फैसला किया है, जबकि शेष 10 प्रतिशत खर्च सभी छह भागीदार राज्य आपस में साझा करेंगे।
संसाधनों के आदान-प्रदान का अनूठा फॉर्मूला
किशाऊ परियोजना के इस समझौते की सबसे प्रमुख विशेषता पानी और बिजली के बीच तैयार किया गया आदान-प्रदान मॉडल है। तय शर्तों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश के हिस्से का अधिशेष पानी दिल्ली और राजस्थान की आबादी तथा जरूरतों के लिए दिया जाएगा। इस जल आपूर्ति के बदले में दिल्ली और राजस्थान की सरकारें हिमाचल प्रदेश के पनबिजली प्रोजेक्ट में आने वाली निर्माण लागत का अपना तय वित्तीय हिस्सा चुकाएंगी। उत्तर प्रदेश भी इस पूरे तंत्र का एक सक्रिय हिस्सेदार बना है, जिससे राज्य के सीमावर्ती इलाकों में पीने के पानी और सिंचाई की गंभीर किल्लत को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकेगा।
अंतरराज्यीय जल विवादों को सुलझाने की दिशा में पहल
यह समझौता अंतरराज्यीय जल विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने की दिशा में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। इससे पूर्व बिहार और झारखंड के बीच करीब 25 वर्षों से जारी सोन नदी जल विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला गया था। इसके साथ ही नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के तहत मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के वित्तीय भुगतान संबंधी मामलों को हल किया गया था, जबकि हरियाणा और राजस्थान के बीच पाइपलाइन के जरिए यमुना का जल पहुंचाने की बाधाएं भी दूर की जा चुकी हैं। अब किशाऊ बांध के निर्माण से उत्तर भारत के लाखों किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलेगा और करोड़ों परिवारों को सस्ती बिजली की सुविधा हासिल होगी।














