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बीकानेर का 80 साल पुराना कानून: पीपल लगाने के लिए देना पड़ता था जुर्मानाराजस्थान
9 जुल॰ 2026, 11:21 pm (32 दिन पहले)· 2

बीकानेर का 80 साल पुराना कानून: पीपल लगाने के लिए देना पड़ता था जुर्माना

आज के दौर में जहां पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है, वहीं 1946-47 में बीकानेर में बिना अनुमति पीपल लगाने पर 50 रुपये का जुर्माना लगता था। यह नियम धार्मिक आस्था की आड़ में जमीन कब्जाने की कोशिशों को रोकने के लिए बनाया गया था।

वर्तमान समय में जब सरकारें और समाज पर्यावरण बचाने के लिए अधिक से अधिक वृक्षारोपण पर जोर दे रहे हैं, तब बीकानेर के इतिहास का एक अध्याय बिल्कुल उलट नजर आता है। आज से लगभग 80 साल पहले, बीकानेर रियासत में एक ऐसा कानून अस्तित्व में था जो पीपल के पौधे लगाने पर रोक लगाता था। वर्ष 1946-47 के दौरान लागू इस प्रावधान के तहत, अगर कोई व्यक्ति बिना पूर्व आधिकारिक अनुमति के पीपल का पेड़ लगाता था, तो उसे 50 रुपये का भारी आर्थिक दंड देना पड़ता था। उस समय के हिसाब से 50 रुपये की राशि काफी बड़ी मानी जाती थी।

कानून के पीछे की असली वजह

राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी और इतिहासकार डॉ. नितिन गोयल ने इस अनोखे कानून के पीछे के कारणों पर प्रकाश डाला है। हिंदू धर्म में पीपल के वृक्ष का अत्यधिक धार्मिक महत्व है और इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। इसी आस्था का लाभ उठाकर उस समय कुछ लोग सरकारी जमीनों या उसके पास की भूमि पर पीपल लगा देते थे। मकसद यह होता था कि भविष्य में धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर उस जमीन पर अवैध कब्जा किया जा सके। इस तरह के अतिक्रमण और भूमि विवादों की संख्या बढ़ने लगी थी, जिससे प्रशासन के लिए समस्या उत्पन्न हो गई थी। जनता की मांग पर ही बीकानेर दरबार ने इस व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाए थे।

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क्या थी आवेदन की प्रक्रिया?

नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति राजकीय भूमि या सरकारी सीमा से सटी अपनी जमीन पर पीपल लगाना चाहता था, तो उसे एक व्यवस्थित कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। इच्छुक व्यक्ति को सबसे पहले संबंधित तहसीलदार के कार्यालय में एक लिखित आवेदन देना होता था। प्रशासन इस आवेदन के मिलने के बाद सार्वजनिक रूप से आपत्तियां आमंत्रित करता था। यदि 30 दिनों के भीतर कोई ठोस आपत्ति दर्ज नहीं होती थी, तभी प्रशासन द्वारा पौधरोपण की औपचारिक अनुमति प्रदान की जाती थी।

जुर्माने का डर और कड़ा अनुशासन

प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत रखने के लिए दरबार ने दंड का कड़ा प्रावधान रखा था। बिना विधिवत प्रक्रिया अपनाए पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति पर 50 रुपये का जुर्माना लगाया जाता था। यह दंड उस दौर में इतना प्रभावशाली था कि लोग अनाधिकृत तरीके से पेड़ लगाने से कतराते थे। इस प्रक्रिया का पालन न करना आर्थिक नुकसान को न्योता देने जैसा था, इसलिए लोग प्रशासन के साथ मिलकर चलने के लिए बाध्य थे।

धार्मिक और प्रशासनिक संतुलन का उदाहरण

डॉ. नितिन गोयल बताते हैं कि बीकानेर रियासत की यह नीति केवल भूमि विवादों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक दूरदर्शी सोच थी। इसका उद्देश्य पीपल की धार्मिक पवित्रता को बनाए रखने के साथ-साथ भविष्य के झगड़ों को जड़ से खत्म करना था। यह आठ दशक पुरानी व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि बीकानेर के तत्कालीन शासक कानूनी व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और पर्यावरण के प्रति बेहद गंभीर थे। आज के समय में जब बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चल रहे हैं, तब यह ऐतिहासिक अध्याय हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ एक अनुशासित प्रशासनिक ढांचा भी जरूरी है।

सवाल-जवाब

बीकानेर में पीपल लगाने पर जुर्माना कब लगाया जाता था?
बीकानेर रियासत में वर्ष 1946-47 के दौरान बिना अनुमति पीपल का पौधा लगाने पर 50 रुपये का जुर्माना लगाया जाता था।
पीपल लगाने के लिए अनुमति कैसे मिलती थी?
इच्छुक व्यक्ति को तहसीलदार के कार्यालय में आवेदन करना होता था, जिसके बाद 30 दिनों के भीतर आपत्तियां मांगी जाती थीं और अनुमति दी जाती थी।
इस कानून के पीछे मुख्य कारण क्या था?
धार्मिक आस्था का फायदा उठाकर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए यह नियम बनाया गया था।
उस दौर में 50 रुपये के जुर्माने का क्या महत्व था?
उस समय 50 रुपये एक बहुत बड़ी धनराशि थी, जो लोगों को नियमों का उल्लंघन करने से रोकने के लिए काफी थी।
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