भारतीय पशुधन विविधता के लिए एक बेहद चिंताजनक आंकड़े के बीच सफेद रंगत वाले मालवी ऊंट विलुप्ति के बेहद करीब पहुंच गए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में अब इस खास नस्ल की कुल आबादी सिमटकर मात्र 102 रह गई है। अगर समय पर इनके बचाव और संवर्धन के वैज्ञानिक उपाय नहीं अपनाए गए तो यह अनमोल पशुधन केवल सरकारी दस्तावेजों और किताबों के पन्नों तक ही सीमित होकर रह जाएगा। इसी गंभीर खतरे को भांपते हुए राजस्थान के बीकानेर स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (NRCC) ने इस दुर्लभ प्रजाति को बचाने का बीड़ा उठाया है। केंद्र ने अपनी खास फार्म ब्रीडिंग योजना के तहत मालवी नस्ल के कुनबे को दोबारा बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू कर दी है।
संरक्षण की नई पहल: 12 ऊंटों की खरीदारी से शुरू हुआ फार्म ब्रीडिंग मॉडल
इस अनमोल आनुवंशिक संपदा को सुरक्षित रखने की दिशा में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र ने जमीनी कदम बढ़ा दिए हैं। संस्थान ने हाल ही में 12 शुद्ध मालवी ऊंटों की खरीदारी की है, जिनमें 3 नर और 9 मादा ऊंट शामिल हैं। इन चयनित ऊंटों के जरिए बीकानेर स्थित अनुसंधान फार्म पर नियंत्रित और शुद्ध प्रजनन कार्यक्रम संचालित किया जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि फार्म आधारित इस व्यवस्थित ब्रीडिंग मॉडल से मालवी ऊंटों की प्रजनन दर में सुधार होगा और नई पीढ़ी की शुद्धता बनी रहेगी।
मामले की गंभीरता पर बात करते हुए NRCC के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने स्पष्ट किया कि संस्थान इस संकटग्रस्त नस्ल को बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, "प्रजनन कार्यक्रम के माध्यम से इस संकटग्रस्त नस्ल को बचाने और इसकी संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।" वहीं संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वेदप्रकाश का मानना है कि यदि यह संरक्षण अभियान अपनी योजना के अनुसार सफल रहता है, तो आने वाले समय में मालवी नस्ल की संख्या बढ़ाने के साथ ही भारत की इस समृद्ध आनुवंशिक विरासत को भी भविष्य के लिए सुरक्षित किया जा सकेगा।
सफेद रंग और छोटा कद: जानिए मालवी नस्ल की अनूठी खासियतें
पशु वैज्ञानिकों के अनुसार मालवी ऊंट अपनी शारीरिक विशेषताओं और क्षमताओं के कारण भारत की अन्य ऊंट नस्लों से बिल्कुल अलग पहचान रखते हैं। आकर्षक सफेद रंग और अपेक्षाकृत छोटा कद इस नस्ल का सबसे प्रमुख लक्षण माना जाता है। इसके अलावा दूध उत्पादन के मामले में भी यह काफी उपयोगी मानी जाती है, जहां एक मादा मालवी ऊंट एक बार में लगभग चार से पांच किलो तक दूध देने में सक्षम होती है।
भौगोलिक प्रसार की बात करें तो मालवी ऊंट मुख्य रूप से राजस्थान और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में पाए जाते हैं। राजस्थान के कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिलों के ग्रामीण अंचलों में इनकी मौजूदगी रही है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के मालवा और आसपास के क्षेत्रों जैसे मंदसौर, नीमच, रतलाम और ग्वालियर में भी यह नस्ल पारंपरिक रूप से पाली जाती रही है।
नस्ल वैज्ञानिकों के तय मानकों के अनुसार किसी भी ऊंट प्रजाति में यदि मादा ऊंटों की कुल संख्या 300 से कम रह जाती है, तो उसे वैज्ञानिक रूप से संकटग्रस्त और लुप्तप्राय श्रेणी में दर्ज किया जाता है। मालवी नस्ल में मादाओं की संख्या इस तय सीमा से काफी नीचे जा चुकी है, जिसके चलते आनुवंशिक संसाधनों का वैज्ञानिक संरक्षण और नियंत्रित प्रजनन ही इन्हें बचाने का एकमात्र विकल्प बचा है।
देश की 9 मान्यता प्राप्त ऊंट नस्लें और मालवी का स्थान
भारत में पशुधन वैज्ञानिक स्तर पर ऊंटों की कुल 9 नस्लों को आधिकारिक मान्यता दी गई है। इन मान्यता प्राप्त किस्मों में बीकानेरी, जैसलमेरी, कच्छी, मेवाड़ी, जालौरी, मेवाती, मालवी, मारवाड़ी और खराई शामिल हैं। इन सभी प्रजातियों के बीच मालवी ऊंट अपने मनमोहक सफेद रंग, शांत स्वभाव और घटती संख्या के कारण विशेष ध्यानाकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बीकानेर केंद्र द्वारा शुरू की गई यह वैज्ञानिक मुहिम अगर कामयाब रहती है तो भारत की इस विलुप्तप्राय ऊंट नस्ल को एक नया जीवनदान मिल सकेगा।


















