सदियों से राजस्थान के थार रेगिस्तान की पहचान रहे ऊंटों ने न केवल परिवहन बल्कि ऐतिहासिक निर्माण कार्यों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि बीकानेर रियासत और आसपास के पश्चिमी राजस्थान के इलाकों को हरा भरा बनाने वाली प्रसिद्ध गंगनहर के निर्माण में ऊंटों ने मुख्य रीढ़ की हड्डी की तरह काम किया था। वर्ष 1920 से लेकर 1927 के दौरान जब इस विशाल नहर की खुदाई का काम चल रहा था, तब उस दौर में डंपर या जेसीबी जैसी कोई अत्याधुनिक मशीनरी मौजूद नहीं थी। ऐसे मुश्किल समय में हजारों समर्पित मजदूरों के साथ ऊंट और उनकी गाड़ियां ही इस पूरी महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य सहारा बने थे। खुदाई के दौरान निकाली गई लाखों टन मिट्टी को दूर दराज के टीलों तक पहुंचाने का सारा काम इन्हीं ऊंटों के जरिए पूरा किया गया था, जिसकी पुष्टि आज भी तत्कालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों और दुर्लभ तस्वीरों से होती है।
1899 के भयावह छप्पनिया अकाल की विभीषिका
गंगनहर का निर्माण महज एक साधारण नहर खोदने की परियोजना नहीं थी, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान के लोगों को बार बार तड़पाने वाले भयानक सूखे से मुक्ति दिलाने का एक दूरदर्शी कदम था। वर्ष 1899 से 1900 के बीच इस क्षेत्र में एक ऐसा भीषण अकाल पड़ा जिसने पूरे राजस्थान की सामाजिक और आर्थिक संरचना को झकझोर कर रख दिया था। विक्रम संवत 1956 में आने के कारण इसे स्थानीय भाषा में छप्पनिया अकाल कहा जाता है, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने अपने सरकारी रिकॉर्ड्स में 'ग्रेट इंडियन फेमिन' के नाम से दर्ज किया था।
उस दौर में बारिश की एक एक बूंद के लिए तरसे इस इलाके में सभी फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं। भुखमरी और भीषण प्यास के कारण हजारों की संख्या में इंसानों ने तड़प तड़पकर अपनी जान गंवा दी थी, जबकि लाखों बेजुबान मवेशी भी काल के गाल में समा गए थे। चारों तरफ फैली इस मानवीय त्रासदी ने क्षेत्र की तत्कालीन शासन व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया और जल सुरक्षा के लिए एक स्थायी समाधान ढूंढना अनिवार्य कर दिया।
महाराजा गंगा सिंह का दूरदर्शी जल प्रबंधन
इस विनाशकारी अकाल से उपजे संकट को गहराई से महसूस करते हुए तत्कालीन बीकानेर रियासत के शासक महाराजा गंगा सिंह ने एक स्थायी जल व्यवस्था का खाका तैयार किया। उनका स्पष्ट मानना था कि अकाल जैसी आपदाओं का मुकाबला केवल तात्कालिक राहत सामग्री बांटकर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए सिंचाई और पेयजल का एक मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। इसी दूरदर्शी सोच के तहत उन्होंने पंजाब की सतलुज नदी का पानी राजस्थान के रेतीले धोरों तक लाने का एक साहसिक प्रस्ताव तैयार किया।
महाराजा गंगा सिंह के इस क्रांतिकारी विचार को तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने भी अपना पूरा समर्थन दिया और परियोजना को औपचारिक मंजूरी मिल गई। इस तरह सतलुज नदी के पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर पश्चिमी राजस्थान तक लाने का मार्ग प्रशस्त हुआ, जो आगे चलकर पूरे क्षेत्र की किस्मत बदलने वाला साबित हुआ।
कठिन रेगिस्तानी भूगोल में ऊंटों का योगदान
वर्ष 1920 में गंगनहर का निर्माण कार्य आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। उस समय बीकानेर और आसपास का इलाका ऊंचे ऊंचे बालू के टीलों और विषम परिस्थितियों से घिरा हुआ था। चूंकि उस युग में आधुनिक निर्माण उपकरण उपलब्ध नहीं थे, इसलिए हजारों मजदूरों ने कसियों और फावड़ों के सहारे नहर की खुदाई का काम अपने हाथों में लिया।
रेत के समंदर में भारी मिट्टी को उठाकर दूर फेंकना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। ऐसे समय में रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंट सबसे भरोसेमंद साथी बनकर उभरे। मजदूरों द्वारा खोदी गई मिट्टी को ऊंटगाड़ियों में भरा जाता था और फिर ऊंट उन्हें खींचकर दूर इलाकों तक ले जाते थे। कठिन रेतीले रास्तों पर आसानी से चलने की अपनी शारीरिक क्षमता के कारण हजारों ऊंट इस परियोजना का अभिन्न अंग बने रहे और लगातार सात वर्षों तक दिन रात निर्माण कार्य में डटे रहे।
गंगनहर से श्रीगंगानगर में आई कृषि क्रांति
लगभग सात वर्षों की अनवरत कड़ी मेहनत के बाद वर्ष 1927 में गंगनहर का निर्माण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और सतलुज नदी का पवित्र जल पश्चिमी राजस्थान की सूखी धरती पर पहुंच गया। पानी पहुंचते ही श्रीगंगानगर और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र की रूपरेखा पूरी तरह बदल गई। जिस बंजर जमीन पर कभी केवल रेत के गुबार उठते थे, वहां उपजाऊ खेत लहलहाने लगे।
गंगनहर के आने से क्षेत्र में गेहूं, कपास और सरसों जैसी प्रमुख फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन शुरू हो गया। इससे स्थानीय किसानों की आमदनी में अभूतपूर्व इजाफा हुआ और क्षेत्र के सामाजिक व आर्थिक विकास को एक नई दिशा मिली। बाद के दशकों में इस नहर प्रणाली का और अधिक विस्तार किया गया, जिससे राजस्थान के अन्य जिलों को भी जल संकट से राहत मिली। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ नितिन गोयल के अनुसार, गंगनहर आज भी महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता, श्रमिकों के अथक परिश्रम और ऊंटों के अतुलनीय योगदान के एक जीवंत स्मारक के रूप में गर्व से खड़ी है।



















