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बिना डिग्री के रांची के हिमांशु ने आंवले से खड़ा किया 40 लाख का बिजनेस ब्रांडझारखंड
30 अग॰ 2026, 7:28 am (26 दिन पहले)· 3

बिना डिग्री के रांची के हिमांशु ने आंवले से खड़ा किया 40 लाख का बिजनेस ब्रांड

रांची के साधारण बीए पास हिमांशु ने बिना किसी व्यावसायिक प्रशिक्षण के आंवले से सौ से अधिक उत्पाद बनाकर 'दीपांजलि' ब्रांड की स्थापना की है। उनके इस सफल उद्यम का सालाना कारोबार अब चालीस लाख रुपये से अधिक है और देश भर में उनके दस हजार से ज्यादा नियमित ग्राहक जुड़ चुके हैं।

झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हिमांशु ने अपनी अटूट मेहनत और बुलंद हौसलों के दम पर एक अनूठी मिसाल पेश की है। बिना किसी उच्च व्यावसायिक डिग्री या तकनीकी प्रशिक्षण के उन्होंने दीपांजलि नाम से अपने खुद के स्टार्टअप की नींव रखी। आज उनका यह उपक्रम आंवले से जुड़े सौ से अधिक तरह के उत्पादों का निर्माण कर रहा है और उनके इस बिजनेस का सालाना टर्नओवर चालीस लाख रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है।

साधारण शिक्षा और बड़े भाई से मिले गुर

हिमांशु ने अपनी औपचारिक शिक्षा के रूप में केवल साधारण बीए की पढ़ाई पूरी की है। व्यवसाय संचालन की कोई औपचारिक तालीम न होने के कारण उन्होंने व्यापार की बारीक और जरूरी सीख अपने बड़े भाई से हासिल की। चूंकि आंवला स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद गुणकारी और फायदेमंद माना जाता है, इसलिए उन्होंने इसी फल को अपने कारोबार का मुख्य आधार बनाने का निर्णय लिया। उनका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं तक उत्तम स्वास्थ्य लाभ पहुंचाना और अपने कारोबार को नई ऊंचाइयों पर ले जाना था।

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बाजार में उतारे कई तरह के अनूठे उत्पाद

बाजार में आंवले की पारंपरिक किस्मों से हटकर हिमांशु ने कई ऐसे नए और अनोखे उत्पाद तैयार किए हैं जो पहले आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे। बच्चों के खाने के लिए उन्होंने कैंडी के करीब पच्चीस अलग-अलग फ्लेवर बाजार में उतारे हैं। इसके अलावा आंवले का लड्डू, स्वादिष्ट बर्फी और दस से बारह प्रकार की अन्य मिठाइयां भी उनके कारखाने में तैयार की जाती हैं। युवा वर्ग और खासतौर पर लड़कियों को ध्यान में रखते हुए खट्टा-मीठा आंवला पापड़ भी विशेष तौर पर बनाया जाता है। बुजुर्गों के स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए आंवले का शुद्ध सिरका और जूस भी ग्राहकों को उपलब्ध कराया जाता है।

रोजगार सृजन और मजबूत ग्राहक नेटवर्क

उत्पादों के निर्माण के लिए हिमांशु का अपना खुद का कारखाना संचालित होता है, जिसमें लगभग पचास लोग कार्यरत हैं और अपनी आजीविका चला रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले सामान की पैकिंग पूरी तरह से पेशेवर और ब्रांडेड तरीके से की जाती है, जिसकी डिलीवरी पूरे भारत में की जाती है। वर्तमान में देश भर में उनके दस हजार से भी अधिक नियमित ग्राहक बन चुके हैं। ये वफादार ग्राहक हर महीने दो से तीन हजार रुपये तक का सामान नियमित रूप से मंगवाते हैं।

शुद्धता ही सबसे बड़ी ताकत

कारोबार की सफलता के पीछे अपनी मूल नीति के बारे में बताते हुए हिमांशु कहते हैं कि उनके उत्पादों की शुद्धता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनके अनुसार एक बार जब कोई ग्राहक उनके सामान का उपयोग कर लेता है, तो वह संतुष्ट होकर बार-बार ऑर्डर देता है। हिमांशु का दृढ़ विश्वास है कि जीवन में सफलता पाने के लिए केवल डिग्रियां होना जरूरी नहीं है, बल्कि इसके लिए सही नीयत, कड़ी मेहनत, अटूट जुनून और उचित दिशा में निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता होती है।

सवाल-जवाब

हिमांशु किस शहर के रहने वाले हैं?
हिमांशु झारखंड के रांची शहर के रहने वाले हैं।
उनके ब्रांड का नाम क्या है?
उनके द्वारा खड़े किए गए ब्रांड का नाम दीपांजलि है।
उनके व्यवसाय का सालाना टर्नओवर कितना है?
उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर चालीस लाख रुपये से अधिक हो चुका है।
वे मुख्य रूप से किस चीज से उत्पाद बनाते हैं?
वे मुख्य रूप से आंवले से सौ से अधिक प्रकार के विभिन्न उत्पाद तैयार करते हैं।
उनके कारखाने में कितने लोग काम करते हैं?
उनके कारखाने में लगभग पचास लोग काम करते हैं जिन्हें रोजगार मिल रहा है।
उनके कितने नियमित ग्राहक हैं?
देशभर में उनके दस हजार से भी ज्यादा नियमित ग्राहक बन चुके हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

हिमांशु की यह सफलता दिखाती है कि बिना डिग्री के भी मजबूत इरादों से बड़ा बाजार खड़ा किया जा सकता है। पचास लोगों को रोजगार देना और दस हजार नियमित ग्राहकों का नेटवर्क बनाना यह साबित करता है कि गुणवत्ता और सही नीयत ही किसी भी व्यापार की असली ताकत होती है। भविष्य में इस तरह के ग्रामीण और लघु उद्योगों को कानूनी और वित्तीय सुरक्षा मिलने से रोजगार सृजन की रफ्तार और तेज हो सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·25 दिन पहले

हिमांशु का यह मॉडल स्पष्ट करता है कि स्थानीय संसाधनों का मूल्यवर्धन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है। जब पचास स्थानीय लोगों को अपने क्षेत्र में ही आजीविका मिलती है, तो बड़े शहरों की तरफ होने वाले पलायन पर लगाम लगती है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी यदि ऐसे कृषि-आधारित और लघु उद्योगों को सही आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ा जाए, तो ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार के द्वार व्यापक स्तर पर खुल सकते हैं।

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