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बिना रजिस्ट्रेशन लीज का कानूनी वजूद नहीं, एनसीएलएटी ने लिक्विडेटर के बेदखली अधिकार पर मुहर लगाईभारत
23 सित॰ 2026, 6:20 am (8 दिन पहले)· 0

बिना रजिस्ट्रेशन लीज का कानूनी वजूद नहीं, एनसीएलएटी ने लिक्विडेटर के बेदखली अधिकार पर मुहर लगाई

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया है कि अपंजीकृत लीज डीड साक्ष्य के रूप में अमान्य है और दिवाला प्रक्रिया में लिक्विडेटर बिना रेंट कंट्रोल कोर्ट जाए संपत्ति खाली करा सकता है।

व्यावसायिक या आवासीय संपत्ति किराये पर लेते समय पट्टा विलेख यानी लीज डीड को कानूनी रूप से पंजीकृत कराना अनिवार्य है। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने एक अहम व्यवस्था देते हुए साफ कर दिया है कि यदि लीज अनुबंध का विधिवत पंजीकरण नहीं कराया गया है, तो उसे कानूनी दस्तावेज या वैध किरायेदारी के प्रमाण के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती। इस आदेश के तहत दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता के प्रावधानों को राज्य स्तरीय किराया नियंत्रण कानूनों की तुलना में सर्वोपरि माना गया है, जिससे कॉरपोरेट मामलों में परिसमापक को विवादित परिसंपत्तियों को खाली कराने के सीधे अधिकार मिल गए हैं।

चंडीगढ़ पीठ के बेदखली आदेश के खिलाफ अपील नामंजूर

यह कानूनी विवाद लुधियाना स्थित दो कारोबारी उपक्रमों ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स से जुड़ा हुआ था। इन दोनों फर्मों ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की चंडीगढ़ पीठ द्वारा जारी उस निर्देश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें कराबारा तथा हुसैनपुरा स्थित दो व्यावसायिक परिसरों को दो सप्ताह के भीतर पूरी तरह खाली करने को कहा गया था। अपीलीय अधिकरण की दो-सदस्यीय पीठ ने दोनों अपीलों की समीक्षा के उपरांत उन्हें निरस्त करते हुए पूर्व में जारी बेदखली के फैसले को पूरी तरह जायज ठहराया।

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अनरजिस्टर्ड लीज और तीस साल के पट्टे का दावा हुआ खारिज

अपीलकर्ता कंपनियों का पक्ष था कि उनके पास 30 साल की अवधि का लीज डीड मौजूद है, जिसके आधार पर उन्हें किरायेदार के रूप में वैध दखल हासिल है। उनका यह भी तर्क था कि किसी भी प्रकार की बेदखली की कार्रवाई केवल 1949 के ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रिस्ट्रिक्शन एक्ट के अधीन रेंट कंट्रोलर के समक्ष ही चलाई जा सकती है, एनसीएलटी के जरिए नहीं। अपीलीय न्यायाधिकरण ने इस दलील को पूरी तरह अमान्य करार दिया। न्यायाधिकरण ने रेखांकित किया कि संबंधित लीज अनुबंध पंजीकृत नहीं थे, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम अथवा अन्य अदालती प्रक्रियाओं में इन्हें साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त यह तथ्य भी सामने आया कि अपीलकर्ता कंपनियों का संचालन करने वाले निदेशक दरअसल कॉरपोरेट देनदार के निलंबित निदेशकों के सगे रिश्तेदार थे।

आईबीसी की वैधानिक सर्वोच्चता और लिक्विडेटर की जिम्मेदारी

न्यायाधिकरण ने रेखांकित किया कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता कानून की धारा 35 के अंतर्गत कॉरपोरेट देनदार के स्वामित्व वाली संपत्तियों को अपने कब्जे में लेना लिक्विडेटर का अनिवार्य वैधानिक दायित्व है। इसके अलावा आईबीसी की धारा 238 के गैर-बाधाकारी प्रावधानों का हवाला देते हुए अधिकरण ने दोहराया कि यह केंद्रीय कानून अन्य परस्पर विरोधी कानूनों पर प्रभावी रहता है। लिहाजा, परिसमापक को परिसर का कब्जा हासिल करने के लिए रेंट कोर्ट में अलग से मुकदमा दायर करने की कतई आवश्यकता नहीं है।

वीनस गारमेंट्स के परिसमापन से जुड़ा है पूरा मामला

यह पूरा कानूनी प्रकरण वीनस गारमेंट्स (इंडिया) की परिसंपत्तियों से संबंधित है। उक्त कंपनी को एनसीएलटी की चंडीगढ़ पीठ द्वारा कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत लाया गया था। समाधान प्रक्रिया के विफल होने अथवा समयसीमा बीतने के बाद 22 जुलाई, 2025 को अधिकरण ने कंपनी के परिसमापन यानी लिक्विडेशन का औपचारिक आदेश पारित किया था, जिसके बाद लिक्विडेटर ने संपत्तियों को कब्जे में लेने की मुहिम शुरू की थी।

सवाल-जवाब

एनसीएलएटी ने बिना पंजीकरण वाली लीज डीड पर क्या निर्णय दिया है?
अपीलीय न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया है कि अनरजिस्टर्ड लीज डीड कानूनन मान्य नहीं है और उसे साक्ष्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्या लिक्विडेटर को संपत्ति खाली कराने के लिए रेंट कोर्ट जाना होगा?
नहीं, आईबीसी की धारा 238 और 35 के तहत लिक्विडेटर सीधे एनसीएलटी के आदेश से संपत्ति का कब्जा ले सकता है।
किन कंपनियों की याचिका अपीलीय न्यायाधिकरण ने खारिज की?
एनसीएलएटी ने लुधियाना स्थित ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स की अपीलों को खारिज किया।
विवादित संपत्तियां किन इलाकों में स्थित हैं?
यह संपत्तियां कराबारा और हुसैनपुरा स्थित व्यावसायिक परिसर हैं, जिन्हें दो सप्ताह के भीतर खाली करने का निर्देश दिया गया था।
यह मामला किस मुख्य कॉरपोरेट कंपनी से जुड़ा है?
यह पूरा मामला वीनस गारमेंट्स (इंडिया) से संबंधित है, जिसके परिसमापन का आदेश 22 जुलाई, 2025 को दिया गया था।
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टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·8 दिन पहले

किराए पर दुकान या दफ़्तर लेते वक़्त काग़ज़ात समय पर रजिस्टर न कराने का कितना बड़ा नुक़सान हो सकता है, ये इस मामले से साफ़ दिख रहा है। जब निदेशक ही संदिग्ध निकटके रिश्तेदार निकलें, तो शक और गहरा जाता है। क्या अब ऐसी दूसरी संपत्तियों के मामलों में भी बिना रेंट कोर्ट जाए तुरंत कार्रवाई शुरू हो जाएगी?

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

रेंट एग्रीमेंट रजिस्टर्ड न हो तो मुश्किल तय है। आईबीसी के मामले में अब किराएदारों के लिए बचना और भी कठिन हो गया है।

Michael Anderson@michael-anderson·8 दिन पहले

बिल्कुल अर्जुन, बिना रजिस्ट्रेशन के किराएदारी साबित करना वैसे भी मुश्किल होता है। अब लिक्विडेटर के लिए काम आसान हो गया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

लुधियाना वाली उस कोर्ट की सुनवाई के वक्त मैं वहीं मौजूद था। बिना रजिस्ट्रेशन वाले कागजों के सहारे सालों से कब्जा जमाए बैठे लोगों के चेहरे देखने लायक थे जब जज साहब ने सब खारिज कर दिया।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

करण भाई, लुधियाना वाले उस मामले में ड्यूक फैशन्स के वकीलों के चेहरे वाकई देखने लायक थे जब जज साहब ने तीस साल पुरानी अनरजिस्टर्ड लीज को एक झटके में खारिज कर दिया।

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