विज्ञापन की दुनिया में अक्सर सुर्खियां बटोरने के लिए कुछ ऐसा परोस दिया जाता है जो बाद में बड़े विवाद की वजह बन जाता है। कुछ समय पहले ही जीवा के रक्षाबंधन वाले विज्ञापन को लेकर काफी हंगामा खड़ा हुआ था और अब चेन्नई मेट्रो रेल के डिब्बों के भीतर लगाए गए एक नए विज्ञापन ने सियासी गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी की तुलना सीधे तौर पर गर्लफ्रेंड से करने वाले इस आपत्तिजनक विज्ञापन को लेकर सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल दोनों ने तीखा विरोध दर्ज कराया है और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की है।
किस सहकारी संस्था का था यह विज्ञापन और क्या थी उसकी रूपरेखा
यह पूरा मामला थिरुवल्लुवर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन एम्प्लॉईज को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड नामक एक सहकारी ऋण संस्था से जुड़ा हुआ है जिसे संक्षेप में दिकोस नाम से जाना जाता है। यह संस्था अपनी विभिन्न फिक्स्ड डिपॉजिट योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापनों का सहारा ले रही थी और इसी कड़ी में उसने चेन्नई मेट्रो की ट्रेनों के भीतर अपने होर्डिंग लगवाए थे। इन विज्ञापनों में निवेश आकर्षित करने के लिए शब्दों का ऐसा इस्तेमाल किया गया जो देखते ही देखते सार्वजनिक बहस का मुख्य विषय बन गया और आम लोगों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों का भी गुस्सा फूट पड़ा।
विज्ञापनों की भाषा और महिलाओं के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण
चेन्नई मेट्रो के कोच के अंदर चस्पा किए गए इस विज्ञापन में साफ शब्दों में लिखा गया था कि गर्लफ्रेंड शून्य प्रतिशत ब्याज दे सकती है लेकिन उनकी फिक्स्ड डिपॉजिट योजना पर शानदार रिटर्न मिलता है। इस विज्ञापन में रुचि और वित्तीय ब्याज के दोहरे अर्थ का इस्तेमाल करते हुए महिलाओं को कमतर आंकने की कोशिश की गई थी। चूँकि चेन्नई मेट्रो ट्रेन में हर रोज लाखों आम यात्री सफर करते हैं, इसलिए यह आपत्तिजनक संदेश बड़ी संख्या में लोगों की नजरों के सामने से गुजरा। जैसे ही यह होर्डिंग लोगों की नजरों में आया, इसकी तस्वीरें तेजी से इंटरनेट पर फैल गईं और लोगों ने सार्वजनिक परिवहन के साधनों में इस तरह की भाषा के प्रयोग पर गहरी आपत्ति जताई।
डीएमके सांसद थमिझाची थंगापांडियन का कड़ा रुख
इस विज्ञापन पर सबसे पहले डीएमके सांसद थमिझाची थंगापांडियन की नजर पड़ी और उन्होंने तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी तस्वीर साझा करते हुए अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर चेन्नई मेट्रो रेल प्रशासन ने ऐसे विज्ञापन को कोच के भीतर लगाने की अनुमति कैसे दे दी। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि मेट्रो के डिब्बों के अंदर महिलाओं को नीचा दिखाने और उन्हें केवल एक वस्तु के रूप में पेश करने वाली सामग्री देखकर उन्हें गहरा सदमा लगा है। सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों में महिलाओं की गरिमा और सम्मान का पूरा ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है।
सांसद थंगापांडियन ने मेट्रो प्रशासन से इस विज्ञापन को फौरन हटाने की मांग की और साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा कि भविष्य में इस तरह की सामग्री को कतई जगह न मिले। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चेन्नई मेट्रो का उपयोग प्रतिदिन लाखों लोग करते हैं, जिसके चलते इस प्रकार के आपत्तिजनक संदेश का समाज पर बहुत गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उनके इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई और अन्य नेताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं।
एआईएडीएमके प्रवक्ता कोवई साथियन की तीखी प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम ने जल्द ही राजनीतिक रंग ले लिया और मुख्य विपक्षी दल एआईएडीएमके के प्रवक्ता कोवई साथियन भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने इस विज्ञापन की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे महिलाओं की मर्यादा का सीधा उल्लंघन और कानून के दायरे में एक दंडनीय अपराध करार दिया। साथियन ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि इस तरह के कंटेंट को देखकर उनके पास शब्द ही नहीं बचे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए कि किसी विज्ञापन एजेंसी को अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है, इसका यह कतई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे लिंग के आधार पर किसी का भी अपमान करना शुरू कर दें।
मेट्रो प्रशासन और विज्ञापनदाता पर बढ़ता दबाव
दोनों बड़े दलों के प्रमुख नेताओं द्वारा एक साथ इस मामले में आपत्ति जताए जाने के बाद चेन्नई मेट्रो रेल प्रशासन के ऊपर इस विज्ञापन को हटाने का चौतरफा दबाव काफी ज्यादा बढ़ गया है। आम जनता और यात्रियों का भी यही मानना है कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था जैसी जगहों पर ऐसे भद्दे विज्ञापन न केवल शालीनता के खिलाफ हैं, बल्कि समाज में महिलाओं के प्रति एक बहुत ही गलत और पिछड़ी मानसिकता का संदेश देते हैं। कई यात्रियों ने इंटरनेट पर अपनी भड़ास निकालते हुए मेट्रो अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं और तुरंत प्रभाव से इन पोस्टरों को हटाने की मांग की है।
आगे की स्थिति और अब तक की प्रशासनिक प्रतिक्रिया
इस ताजा विवाद के बाद एक बार फिर से इस बात पर बहस छिड़ गई है कि विज्ञापनों की भाषा, उनका संदेश और समाज की सहनशीलता की सीमाएं कहां तक होनी चाहिए। खासकर तब यह सवाल और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है जब विज्ञापन ऐसी सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाते हैं जहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग के लोग आते-जाते हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक चेन्नई मेट्रो रेल प्रशासन या फिर विज्ञापन जारी करने वाली सहकारी संस्था की तरफ से कोई भी आधिकारिक सफाई या बयान सामने नहीं आया है। बावजूद इसके, बढ़ते राजनीतिक दबाव और जनता के भारी आक्रोश को देखते हुए यह माना जा रहा है कि इन विज्ञापनों को जल्द ही कोचों से हटा लिया जाएगा।





















