बाजार में बिकने वाली हरी सब्जियों में हानिकारक कीटनाशकों और रासायनिक खादों की अत्यधिक मिलावट को लेकर लोगों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसी परेशानी से बचने के लिए कई परिवारों ने अपने घरों की छतों, बालकनी और खुले आंगनों में किचन गार्डन बनाकर खुद सब्जियां उगाना शुरू किया है। हालांकि, अधिकांश बागवानी प्रेमियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आती है कि पौधे तो लग जाते हैं, पर सही पोषण और खाद प्रबंधन की समझ न होने के कारण उनकी बढ़वार रुक जाती है। कृषि उप निदेशक जेएल गुप्ता ने चित्रकूट में इस समस्या का बेहद सस्ता और प्राकृतिक समाधान सुझाया है। घर में प्रतिदिन जमा होने वाले जैविक अपशिष्ट और पशुओं के गोबर से बिना कोई अतिरिक्त पैसा खर्च किए बेहतरीन जैविक खाद बनाई जा सकती है।
रसोई के कचरे से खाद तैयार करने की वैज्ञानिक विधि
शहरी इलाकों में रहने वाले परिवारों के पास अक्सर पशुपालन की सुविधा नहीं होती है। ऐसे नागरिकों के लिए रसोई से निकलने वाला गीला कचरा सबसे कारगर संसाधन साबित हो सकता है। रोजमर्रा के भोजन निर्माण के दौरान बचने वाले आलू, लौकी, तोरी जैसी सब्जियों और ताजे फलों के छिलकों को बेकार मानकर फेंकने के बजाय उन्हें सहेजने की जरूरत होती है।
इसके लिए एक मजबूत पॉलिथीन बैग या हवादार कंपोस्ट कंटेनर का प्रबंध किया जाना चाहिए। डिब्बे के तल में सबसे पहले लगभग 8 सेंटीमीटर मोटी सब्जियों और फलों के छिलकों की एक समान परत बिछाएं। इसके तुरंत बाद उस पर साधारण बगीचे की थोड़ी सी सूखी या नम मिट्टी छिड़क दें। यही क्रम बार-बार दोहराया जाना चाहिए, जिसमें पहले 8 सेंटीमीटर जैविक कचरे की परत और उसके ऊपर मिट्टी की हल्की तह लगाई जाती है। कुछ हफ्तों के भीतर यह पूरा कचरा सड़कर और विघटित होकर बदबू रहित, काले रंग की बेहद उपजाऊ कंपोस्ट में तब्दील हो जाता है, जिसे गमलों और क्यारियों में डाला जा सकता है।
पशुपालकों और किसानों के लिए गोबर से खाद बनाने की तकनीक
ग्रामीण क्षेत्रों अथवा जिन घरों में गाय और भैंस जैसे मवेशी पाले जाते हैं, वहां खाद बनाने के साधन और भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। मवेशियों के बाड़े में उनके बैठने के नीचे बिछाई जाने वाली सूखी घास, आसपास का खरपतवार और ताजा गोबर जैविक खाद का आधार बनते हैं। इन सभी अवशेषों को एक बड़े गड्ढे या ढेर में सड़ाकर कंपोस्ट का रूप दिया जाता है, जिसे सीधे किचन गार्डन के पौधों की जड़ों में उपयोग में लाया जा सकता है।
किचन गार्डन की मिट्टी को हमेशा जीवित और पोषक रखने के लिए वर्मी कंपोस्ट को सबसे बेहतरीन विकल्प माना गया है। इस विधि में जैविक कचरे और गोबर के मिश्रण में केंचुओं की मदद ली जाती है। केंचुए इस कार्बनिक सामग्री को खाकर बेहद महीन और दानेदार मल त्यागते हैं, जिसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और कई सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद रहते हैं। यह खाद पौधों की जड़ों का तेजी से विकास करने में सहायता करती है।
देसी गाय के पंचगव्य घटकों से जीवामृत का निर्माण
जिन किसानों या बागवानों के पास देसी नस्ल की गाय उपलब्ध है, वे पौधों की प्रतिरोधक क्षमता और विकास को कई गुना बढ़ाने के लिए जीवामृत भी तैयार कर सकते हैं। जीवामृत बनाने की विधि पूरी तरह से पारंपरिक और सूक्ष्मजीवों पर आधारित है। इसके निर्माण के लिए देसी गाय का ताजा गोबर, देसी गाय का गोमूत्र और किसी पुराने बड़े पेड़ या बरगद के नीचे की जीवाणु युक्त उपजाऊ मिट्टी को एक बड़े बर्तन में लेकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। इस पूरे घोल को निश्चित दिनों तक छांव में रखकर सही तरीके से सड़ाया और किण्वित किया जाता है। एक बार यह मिश्रण तैयार हो जाने पर इसे पानी के साथ मिलाकर किचन गार्डन और जैविक खेती की फसलों में इस्तेमाल करने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
















