झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली मीना ने पारिवारिक चुनौतियों और माता-पिता को खोने के गहरे दर्द को एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव में बदल दिया है। उन्होंने पारंपरिक हथकरघा वस्त्रों का एक विशेष काम शुरू किया, जिसके जरिए वह न केवल देश भर के दस्तकारों को रोजगार दे रही हैं, बल्कि कारोबार से होने वाले पूरे मुनाफे को जरूरतमंद बुजुर्गों और गरीब बच्चों की भलाई में लगा रही हैं। एक लाख रुपये से अधिक की मासिक कमाई तक पहुंचे इस कारोबार का मकसद केवल व्यापार करना नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों को संबल देना है।
पारंपरिक बुनकरों को मिला साझा मंच
इस उद्यम के तहत विशेष रूप से हस्तनिर्मित और पारंपरिक वस्त्र तैयार किए जा रहे हैं। इनमें बंगाल की मशहूर ब्लॉक प्रिंट साड़ियां, झारखंड का पारंपरिक तसर सिल्क और बिहार का जाना-माना भागलपुरी सिल्क प्रमुखता से शामिल हैं। इन अलग-अलग राज्यों के कारीगर न केवल बारीक कढ़ाई और हाथ के काम वाली साड़ियां तैयार करते हैं, बल्कि दुपट्टे और परांदा जैसे पारंपरिक उत्पाद भी बनाते हैं। इस पहल की बदौलत विभिन्न क्षेत्रों के 100 से अधिक बुनकरों को अपने हुनर की सीधी पहचान और उनकी मेहनत का पूरा व उचित दाम मिल पा रहा है।
वृद्धाश्रम और 10 स्कूलों को पूरी कमाई का दान
व्यापार से मिलने वाले लाभ को लेकर मीना की सोच आम कारोबारियों से बिल्कुल अलग है। वह अपने इस ब्रांड की 100 प्रतिशत शुद्ध कमाई सीधे वृद्धाश्रम को सौंप देती हैं। उनका कहना है कि माता-पिता के गुजर जाने के बाद उन्हें निजी तौर पर किसी साधन की कमी नहीं है, इसलिए वह चाहती हैं कि वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्गों को किसी तरह की असुविधा न उठानी पड़े। इसके अतिरिक्त, वह वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों की शिक्षा से जुड़े 10 स्कूलों की भी मदद करती हैं, जहां उनके द्वारा दी जाने वाली सहायता इन बच्चों के भविष्य को संवारने में बड़ी भूमिका निभा रही है। ग्राहकों की ओर से भी उनके इन उत्पादों को काफी अच्छा समर्थन मिल रहा है।
कठिनाइयों के बीच बड़े भाई का संबल
इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता मीना के लिए आसान नहीं रहा। पिता के देहांत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। ऐसी कठिन परिस्थितियों में उनके दिव्यांग बड़े भाई ने हिम्मत दिखाई और पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। उन्होंने पिता की तरह ही मीना का ख्याल रखा और हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया। मीना का मानना है कि हर काम केवल निजी फायदे के लिए नहीं किया जा सकता, समाज के प्रति भी हमारी एक बड़ी जवाबदेही होती है। माता-पिता की स्मृति में किए जा रहे इस सेवा कार्य से उन्हें गहरा आत्मसंतोष मिलता है।



















