पीतल नगरी में खास मसालों और मक्खन के साथ परोसी जाती है मुरादाबादी मूंग दालतुला राशिफल 25 सितंबर 2026: राहु और मंगल के प्रभाव से करियर में आएगी गति, वित्तीय संतुलन और रिश्तों पर दें ध्यानअमेरिकी बॉन्ड यील्ड में जोरदार उछाल और भू-राजनीतिक तनाव से यूरो पस्त, डॉलर मजबूतगोवा वोटर लिस्ट विवाद पर चुनाव आयोग का रुख साफ, मतदाता सूची संशोधन पर विपक्ष ने उठाए सवालनागोया में भारत के पास आज कई मेडल पक्के करने का मौका, निशानेबाजी और कबड्डी पर टिकी निगाहेंशी जिनपिंग के स्वागत में व्हाइट हाउस का शाही मेन्यू, फ्रेंच स्वाद के साथ परोसे गए खास व्यंजनराजस्थान के तीन बड़े शहरों में महापौर चुनने की जंग, जयपुर में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामनेकश्मीरी गेट के पास ई-रिक्शा रोककर लूटपाट, चाकू के वार से युवक की जान गई और दो जख्मीछत और बालकनी पर सब्जियां उगाते समय न करें केमिकल का छिड़काव, पूसा विशेषज्ञ ने सुझाए जैविक खाद के आसान उपायबिटगेट पर बड़ा साइबर हमला, हॉट वॉलेट से उड़ाए गए 351 मिलियन डॉलर
छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो साल बाद मामला सीबीआई को सौंपा गयाभारत
12 अग॰ 2026, 11:35 pm (43 दिन पहले)· 1

छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो साल बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया

छत्तीसगढ़ में 2024 में हुई श्रवण की हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. एफआईआर दर्ज करने में दो साल की देरी पर अदालत ने राज्य पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए.

छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत के दौरान हुई एक संदिग्ध मौत के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. वर्ष 2024 में पुलिस कस्टडी में हुई श्रवण नाम के व्यक्ति की मौत की जांच अब राज्य पुलिस के बजाय केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) करेगी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र जांच का आदेश जारी किया है. यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हिरासत में हुई मौत के लगभग दो साल बाद तक स्थानीय पुलिस ने इस मामले में नियमानुसार प्राथमिक दर्ज नहीं की थी, जिसके बाद मामला अदालत के समक्ष पहुंचा था.

हिरासत में मौत और दो साल तक एफआईआर दर्ज न होने का मामला

यह पूरा घटनाक्रम साल 2024 का है, जब स्थानीय पुलिस ने श्रवण नामक व्यक्ति को अपनी हिरासत में लिया था. हिरासत में आने के केवल तीन दिनों के भीतर ही संदिग्ध परिस्थितियों में श्रवण की मौत हो गई थी. इस घटना के तुरंत बाद मृतक के परिजनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए मामले में निष्पक्ष जांच की पुरजोर मांग की थी. परिजनों का आरोप था कि हिरासत के दौरान श्रवण के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ, जिसके कारण उसकी जान चली गई.

हालांकि, इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आया. हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत होने पर कानूनन तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए, लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने लगभग दो साल तक इस संबंध में एफआईआर दर्ज ही नहीं की. इतने लंबे समय तक मामले को दबाए रखने और आपराधिक प्रक्रिया का पालन न करने के कारण पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए.

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और सीबीआई को दिए गए निर्देश

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पुलिस की इस लापरवाही और ढिलाई को बेहद संजीदगी से लिया. शीर्ष अदालत ने पाया कि हिरासत में मौत जैसी गंभीर घटना में दो साल तक प्राथमिकी दर्ज न होना किसी बड़ी गड़बड़ी का संकेत देता है. अदालत ने स्पष्ट माना कि ऐसे माहौल में राज्य पुलिस से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती.

अदालत के नए आदेश के अनुसार, अब सीबीआई इस पूरे मामले की नए सिरे से गहन जांच करेगी. केंद्रीय एजेंसी श्रवण की शुरुआती गिरफ्तारी, पुलिस कस्टडी की अवधि, हिरासत के दौरान घटी घटनाओं और मौत के सटीक कारणों की पड़ताल करेगी. इसके साथ ही, सीबीआई इस पहलू की भी विशेष रूप से जांच करेगी कि आखिर किन कारणों और किन अधिकारियों के दबाव में दो साल तक एफआईआर दर्ज करने में देरी की गई.

जाँच एजेंसी से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सभी की निगाहें सीबीआई की आगामी जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं. पीड़ित परिवार, जो लंबे समय से न्याय के लिए भटक रहा था, को अब सच सामने आने की उम्मीद जगी है. केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा जुटाए जाने वाले साक्ष्य और तथ्य ही यह तय करेंगे कि श्रवण की मौत के लिए कौन से पुलिसकर्मी दोषी हैं और एफआईआर रोकने के पीछे क्या साजिश थी.

ये भी पढ़ें

सवाल-जवाब

श्रवण केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस से जांच छीनकर मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का निर्देश दिया है.
इस मामले की सुनवाई किस बेंच ने की?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की.
श्रवण की मौत कब और किन परिस्थितियों में हुई थी?
साल 2024 में पुलिस हिरासत में लिए जाने के महज तीन दिन बाद ही श्रवण की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की भूमिका पर सवाल क्यों उठाए?
कस्टोडियल डेथ जैसी गंभीर घटना के बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस ने दो साल तक एफआईआर दर्ज नहीं की थी, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे.
सीबीआई अब इस मामले में किन पहलुओं की पड़ताल करेगी?
सीबीआई श्रवण की हिरासत, मौत के कारणों, पुलिसकर्मियों की भूमिका और एफआईआर दर्ज करने में हुई दो साल की देरी की जांच करेगी.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Karan Malhotra@karan-malhotra·42 दिन पहले

हिरासत में मौत के मामलों में प्राथमिक दर्ज करने में दो साल की यह देरी आपराधिक न्याय प्रणाली की गंभीर विफलता और संस्थागत संरक्षणवाद को दर्शाती है। सर्वोच्च अदालत द्वारा जांच सीबीआई को सौंपे जाने से उन पुलिस अधिकारियों पर कानूनी शिकंजा कसने का रास्ता साफ हो गया है जिन्होंने सबूत छिपाने और मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की थी। आगे की न्यायिक प्रक्रिया में यह देखना अहम होगा कि केंद्रीय एजेंसी इस प्रशासनिक मिलीभगत और लापरवाही के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर किस प्रकार कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करती है।

Rohan Verma@rohan-verma·42 दिन पहले

राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश भर के थानों में जवाबदेही तय करने का एक कड़ा संदेश है। दो साल तक एफआईआर न होना यह साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर साक्ष्यों को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया गया था। अब सीबीआई जांच के दायरे में सिर्फ मौत के कारण ही नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र को भी बेनकाब करना होगा जिसने इस संगीन अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश की थी। उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के पुलिस बलों को भी इस आदेश से यह सबक लेना चाहिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·42 दिन पहले

हिरासत में मौत के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों की रक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। दो साल तक एफआईआर दर्ज न होना महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि साक्ष्य छिपाने की मंशा को दर्शाता है। अब सीबीआई जांच से यह साफ होना जरूरी है कि कौन से अधिकारी इस कवर-अप में शामिल थे, ताकि न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कायम रह सके।

Rohan Verma@rohan-verma·42 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना आवश्यक है कि दो साल की देरी ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया होगा। उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के प्रशासनिक अनुभवों से यह स्पष्ट है कि जब तक स्थानीय पुलिस अधिकारियों की इस मामले में सीधी जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तब तक कस्टोडियल हिंसा की ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाना मुश्किल होगा। सीबीआई के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह विलंब से मिले अवशेषों और दस्तावेजों के बीच से सच को बाहर लाए।

Rohan Verma@rohan-verma·42 दिन पहले

यह मामला कानून प्रवर्तन एजेंसियों और उनके जवाबदेह होने के तंत्र पर बड़े सवाल खड़े करता है। जब राज्य की पुलिस ही दो साल तक प्राथमिकी दर्ज करने से कतराए, तो पीड़ित परिवार के लिए स्थानीय स्तर पर न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है। शीर्ष अदालत द्वारा इस मामले की बागडोर केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपना शासन और कानून के राज को बहाल करने की दिशा में एक जरूरी कदम है, जिससे पुलिसिया लापरवाही के दोषी अधिकारियों पर शिकंजा कसने का रास्ता साफ होगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp