मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश भर में भड़का राजनीतिक घमासान एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर शुरू हुआ विवाद उस समय बेहद आक्रामक हो गया जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठा दी। दिपके ने इस मुद्दे पर 2 अक्टूबर से मुंबई में एक बड़ा जनांदोलन छेड़ने की घोषणा की थी। इस ऐलान ने कांग्रेस नेतृत्व को तुरंत सतर्क कर दिया, क्योंकि पार्टी को यह अंदेशा सताने लगा कि अगर सड़क की लड़ाई और युवाओं की नाराजगी का नेतृत्व किसी नए राजनीतिक मंच के हाथ में चला गया, तो मुख्य विपक्ष की साख कमजोर पड़ जाएगी। इसी वजह से राहुल गांधी ने 24 घंटे के भीतर पूरे सियासी विमर्श की दिशा बदलते हुए देशव्यापी विरोध का बिगुल फूंक दिया। शुक्रवार को पूरे देश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरकर चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
सड़कों पर पुलिस के साथ तीखी झड़पें, पानी की बौछारें, बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिशें और राहुल गांधी के सीधे तीखे तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस विपक्ष की अग्रिम पंक्ति किसी अन्य समूह को सौंपने को तैयार नहीं है। इस तेज जवाबी कार्रवाई से पार्टी ने यह साबित करने की कोशिश की है कि चुनावी अनियमितताओं और संवैधानिक संस्थाओं के मुद्दे पर जनता की आवाज उठाने की मुख्य जिम्मेदारी अभी भी वही संभालना चाहती है।
युवा आंदोलन की चेतावनी और कांग्रेस की रणनीति
अभिजीत दिपके ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करने के साथ-साथ पारंपरिक विपक्षी दलों की भूमिका पर भी तंज कसा था। उनका कहना था कि विपक्षी दल कथित रूप से धांधली वाले चुनावों में भागीदारी करके उस पूरी चुनावी प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने का काम कर रहे हैं। दिपके की इस टिप्पणी ने सीधे तौर पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की सबसे संवेदनशील नस को छुआ था। सोशल मीडिया पर सीजेपी की सक्रियता और युवाओं के बीच उसका बढ़ता प्रभाव किसी राजनीतिक दल के लिए नजरअंदाज करने लायक नहीं था।
सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को शनिवार तक का समय देते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती यानी 2 अक्टूबर से 'जंतर मंतर 2.0' आंदोलन शुरू करने का खुला अल्टीमेटम दिया था। कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधकों ने यह तुरंत भांप लिया कि यदि मुंबई से शुरू होने वाला यह आंदोलन युवाओं को गोलबंद करने में कामयाब रहा, तो विपक्षी राजनीति की कमान औपचारिक रूप से नए युवाओं के हाथ में चली जाएगी। इसी राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए कांग्रेस ने गांधी जयंती तक का इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा। पार्टी ने निर्धारित तारीख से पहले ही, 25 सितंबर को देश के हर राज्य में निर्वाचन आयोग के प्रांतीय कार्यालयों का व्यापक घेराव शुरू कर दिया।
आयोग के आंतरिक मतभेदों से गरमाया विवाद
इस पूरे राजनीतिक टकराव की पृष्ठभूमि चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज से जुड़ी एक रिपोर्ट से तैयार हुई, जिसमें संस्थान के भीतर गंभीर प्रशासनिक मतभेदों का खुलासा हुआ था। इस जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों की अवधि में कम से कम 14 बार ज्ञानेश कुमार के कई निर्णयों पर लिखित रूप से अपनी असहमति और आपत्ति दर्ज कराई थी। इन असहमति पत्रों में मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम हटाने, नए नाम दर्ज करने और फॉर्म 6 से जुड़े नियमों में फेरबदल जैसे संवेदनशील प्रक्रियागत बिंदु शामिल थे।
चुनाव आयोग के दो वरिष्ठ आयुक्तों द्वारा उठाई गई इन लिखित आपत्तियों ने विपक्षी खेमे को सीधा हमला बोलने का आधार दे दिया। सीजेपी ने सबसे पहले इस विषय को उठाते हुए आरोप लगाया कि एक सुनियोजित तरीके से करोड़ों नागरिकों के नाम मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं। जैसे ही यह जानकारी सार्वजनिक विमर्श में आई, राहुल गांधी ने बिना देर किए प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने ज्ञानेश कुमार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को गंभीर आघात पहुंचाने का आरोप लगाते हुए उनके तत्काल इस्तीफे की मांग सार्वजनिक कर दी।
दिल्ली से लेकर सुदूर राज्यों तक का शक्ति प्रदर्शन
कांग्रेस ने अपने इस विरोध को केवल प्रेस बयानों या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहने दिया। शुक्रवार की सुबह से ही देश के विभिन्न राज्यों की राजधानियों से सड़क पर टकराव की तस्वीरें सामने आने लगीं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में यूथ कांग्रेस के सदस्य मुख्य चुनाव आयुक्त के चेहरे का मुखौटा पहनकर और प्रतीकात्मक रूप से अपने हाथों में जंजीरें बांधकर रायसीना रोड से निर्वाचन आयोग मुख्यालय की दिशा में आगे बढ़े। प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ने का प्रयास किया और नारेबाजी की, जिसके बाद दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव सहित कई नेताओं को सुरक्षाबलों ने हिरासत में ले लिया।
अन्य राज्यों में भी इसी तरह के आक्रामक प्रदर्शन देखने को मिले। बिहार की राजधानी पटना में प्रदर्शनकारी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को तितर-बितर करने के लिए पुलिस प्रशासन को वाटर कैनन का सहारा लेना पड़ा। असम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर उतरे और विरोध के दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया। इसके अलावा कोलकाता, चंडीगढ़, जम्मू और अरुणाचल प्रदेश में भी राज्य चुनाव आयोग के कार्यालयों के बाहर उग्र घेराव और नारेबाजी की गई। इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन के जरिए कांग्रेस ने मुख्यधारा के मीडिया और आम जनमानस का ध्यान प्रस्तावित आंदोलन से खींचकर अपनी तरफ केंद्रित करने में सफलता पाई।
युवा जनाधार पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश
सीजेपी पारंपरिक चुनावी पार्टी के ढांचे में काम नहीं करती, बल्कि यह युवाओं और रोजगार की तलाश में संघर्ष कर रहे छात्रों के बीच उपजे असंतोष से तैयार हुआ एक मंच है। पिछले कुछ समय में जिस प्रकार डिजिटल मंचों से निकलकर इस संगठन ने जमीनी स्तर पर मौजूदगी दर्ज कराई, उसने स्थापित राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी थी। राहुल गांधी पिछले काफी समय से खुद को युवाओं के अधिकारों, छात्रों के मुद्दों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने वाले प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
ऐसे में अगर निर्वाचन आयोग जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता के खिलाफ कोई नया गैर-पारंपरिक आंदोलन खड़ा होकर राष्ट्रीय स्तर पर जगह बना लेता, तो कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता था। राहुल गांधी ने स्थिति को समझते हुए इस पूरे मुद्दे को तुरंत अपने नेतृत्व में समेटने का फैसला किया। सीजेपी की योजना 2 अक्टूबर से आंदोलन शुरू करने की थी, परंतु कांग्रेस ने उससे पूरे एक सप्ताह पूर्व सड़कों पर जोरदार प्रदर्शन आयोजित करके यह संदेश दिया कि चुनावी और संस्थागत विसंगतियों के खिलाफ जमीनी स्तर पर सीधी लड़ाई लड़ने की क्षमता और ढांचा उसी के पास है।
चुनाव आयोग की सफाई और आगे का रुख
देश भर में बढ़ते राजनीतिक बवाल और विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। आयोग का कहना है कि किसी भी बड़े और बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्थान में अधिकारियों और आयुक्तों के बीच प्रशासनिक मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण और मतभेद होना एक सामान्य व स्वस्थ प्रक्रिया है। निर्वाचन आयोग के अनुसार मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े सभी निर्णय कानूनी प्रावधानों और तय नियमों के तहत ही लिए जाते हैं। हालांकि इस सफाई के बावजूद विपक्षी दल इस मुद्दे को चुनावी पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों से जोड़कर लगातार हमलावर बने हुए हैं।























