भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाने और सीमांत क्षेत्रों के समग्र सामाजिक व आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से एक विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई है। सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने सीमावर्ती इलाकों को देश के प्रमुख मुख्य शहरों से जोड़ने के लिए एक विशाल सड़क नेटवर्क के निर्माण का रोडमैप प्रस्तुत किया है। इसके अंतर्गत अगले 3 से 5 वर्षों में 5,000 किलोमीटर से अधिक लंबे नए हाईवे का निर्माण किया जाएगा। यह व्यापक मार्ग चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और म्यांमार से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास स्थित संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्रों से होकर गुजरेगा। इस संपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित किया गया है, जिसके माध्यम से सैन्य बलों की आवाजाही को सुगम बनाने के साथ-साथ व्यापार, पर्यटन और स्थानीय आजीविका को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
सीमाई सुरक्षा और त्वरित सैन्य आवाजाही को मजबूती
प्रस्तावित हाईवे नेटवर्क का प्राथमिक ध्येय देश के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों तक पहुंच को सुगम और त्वरित बनाना है। वर्तमान समय में कई दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में भौगोलिक चुनौतियों के कारण परिवहन और रसद पहुंचाना बेहद कठिन होता है। केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें इस प्रोजेक्ट का निर्माण संयुक्त रूप से मिलकर करेंगी। इस परियोजना के तहत कई आधुनिक पुलों और बारहमासी सड़कों का निर्माण किया जाएगा, जो विपरीत मौसम में भी संपर्क टूटने नहीं देंगे। इन संरचनाओं की मदद से भारतीय सैन्य बलों को अपनी रसद सामग्री, भारी उपकरण और टुकड़ियों को अग्रिम चौकियों तक तुरंत पहुंचाने में आसानी होगी। इसके साथ ही, सड़कों के निर्माण से दुर्गम और पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार संभव हो सकेगा।
राज्यों में निर्माण का गणित और प्राथमिक क्षेत्र
सीमावर्ती हाईवे योजना का सबसे बड़ा और प्रमुख हिस्सा पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में निर्मित होगा। अरुणाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति और चीन के साथ लगती लंबी सीमा को देखते हुए इसे अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। इसी कारण अरुणाचल प्रदेश के दायरे में अकेले 740 किलोमीटर लंबे हाईवे का निर्माण करने का खाका खींचा गया है। इसके अलावा अन्य प्रमुख राज्यों में बुनियादी ढांचे का विस्तार इस प्रकार रहेगा
- जम्मू-कश्मीर: सीमांत क्षेत्रों में सुरक्षा और संपर्क बढ़ाने के लिए 355 किलोमीटर सड़क बनाई जाएगी।
- उत्तराखंड: रणनीतिक इलाकों को जोड़ने के लिए 266 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण होगा।
- पश्चिम बंगाल: पड़ोसी देशों से सटे सीमावर्ती हिस्सों में 265 किलोमीटर हाईवे बनेगा।
- मणिपुर: पूर्वोत्तर सीमा पर कनेक्टिविटी को मजबूत करने हेतु 241 किलोमीटर मार्ग तैयार किया जाएगा।
इन मुख्य राज्यों के अतिरिक्त पंजाब, राजस्थान, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा के सीमावर्ती क्षेत्रों को भी इस योजना में शामिल किया गया है, ताकि देश की पूरी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर एक समान संपर्क मार्ग स्थापित किया जा सके।
राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर के आंकड़े
सड़क परिवहन के क्षेत्र में देश भर के अंदर बड़े पैमाने पर विकास कार्य संचालित हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में कुल 1,191 हाईवे प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है। ये सभी चालू योजनाएं मिलकर 25,917 किलोमीटर की कुल दूरी को कवर करती हैं, जिनकी कुल निर्माण लागत लगभग 7.15 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है। इन चल रही परियोजनाओं में से लगभग 3,100 किलोमीटर का हिस्सा विशेष रूप से देश के सीमावर्ती इलाकों में विकसित किया जा रहा है। सरकार राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे को एकीकृत करने के लिए पीएम गतिशक्ति योजना पर विशेष बल दे रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं के पूरे होने से देश के राष्ट्रीय मार्गों पर लगने वाले ट्रैफिक जाम से स्थायी राहत मिलेगी और आपात स्थिति में संवेदनशील क्षेत्रों तक सैन्य पहुंच का मार्ग पूरी तरह सुगम हो जाएगा।
फ्रंटियर हाईवे और आर्थिक विकास पर असर
चीन सीमा पर रणनीतिक मजबूती प्रदान करने के लिए अरुणाचल प्रदेश में 1,748 किलोमीटर लंबा अलग फ्रंटियर हाईवे भी तैयार किया जा रहा है। यह फ्रंटियर मार्ग चीन से सटी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के समानांतर विकसित किया जाएगा। यह सड़क परियोजना सीमावर्ती दूरदराज के गांवों को मुख्य वाणिज्यिक बाजारों से सीधे जोड़ेगी, जिससे स्थानीय उत्पादों की बिक्री आसान होगी और सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन व्यवसाय को नई गति मिलेगी। भारत की परिवहन प्रणाली की बात करें तो देश में 65 प्रतिशत से अधिक माल ढुलाई का कार्य सड़कों के जरिए ही संपन्न होता है। इसके अलावा 90 प्रतिशत से ज्यादा पैसेंजर यातायात भी राजमार्गों पर निर्भर रहता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक वृद्धि दोनों को बनाए रखने के लिए सीमावर्ती सड़कों का यह नया संजाल बेहद निर्णायक साबित होगा।




















