इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के एयरसाइड पर उस समय अचानक गहरा तनाव और हलचल का माहौल बन गया, जब कुछ लोग जमीन पर घुटनों के बल बैठे दिखाई दिए। ठीक उनके पीछे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल यानी सीआईएसएफ की क्विक रिएक्शन टीम के हथियारबंद कमांडोज पूरी तरह सतर्क मुद्रा में अपनी पिस्टल ताने खड़े थे। इसी बीच पास खड़े एक विमान से दो अन्य व्यक्ति बाहर निकलते नजर आए, जिनके दोनों हाथ ऊपर हवा में उठे हुए थे और उनके ठीक पीछे भी सीआईएसएफ के कमांडोज गन ताने उन्हें घेरे हुए थे। प्रथम दृष्टया यह पूरा दृश्य किसी विमान के अपहरण का आभास दे रहा था, लेकिन यह कोई वास्तविक संकट नहीं था। दरअसल, यह सीआईएसएफ की ओर से आयोजित एक पूर्व-नियोजित एंटी-हाइजैकिंग मॉक एक्सरसाइज का हिस्सा था, जिसे किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में सुरक्षाबलों की तुरंत कार्रवाई की क्षमता को परखने के लिए अंजाम दिया गया था।
संभावित अपहरण से निपटने की रणनीतिक तैयारी
राजधानी के इस प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की मुस्तैद सुरक्षा का दायित्व संभाल रही सीआईएसएफ ने यूनिट स्तर पर इस एंटी-हाइजैकिंग अभ्यास को संचालित किया। इस विशेष अभ्यास का मुख्य उद्देश्य यह सटीक आकलन करना था कि यदि कभी एयरपोर्ट परिसर में किसी विमान को हाईजैक करने का प्रयास होता है, तो सुरक्षा एजेंसियां कितनी त्वरित गति से घटनास्थल पर पहुंचती हैं। इसके साथ ही बंधक संकट या आतंकी खतरे के दौरान स्थिति को किस प्रकार नियंत्रित किया जाता है, इसका भी सघन अभ्यास किया गया। पूरी प्रक्रिया के दौरान आपातकालीन हालात को संभालने के लिए विभिन्न रिस्पॉन्स टीमों को अलग-अलग रणनीतिक बिंदुओं पर तैनात किया गया था। इस दौरान पूरे ऑपरेशन की लाइव मॉनिटरिंग और सुचारु नियंत्रण बनाए रखने के लिए मौके पर एक विशेष फॉरवर्ड कमांड पोस्ट भी स्थापित किया गया, ताकि जमीनी स्तर पर तैनात सभी दस्तों के बीच सटीक तालमेल बना रहे और अभियान को बिना किसी चूक के प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके।
डॉग स्क्वॉड और विशेषज्ञ दस्तों का साझा दखल
हवाई अड्डे की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस पूरे अभ्यास में न केवल त्वरित प्रतिक्रिया दल बल्कि सीआईएसएफ के प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। अभ्यास के दौरान विभिन्न रिस्पॉन्स टीमों के समन्वित हस्तक्षेप यानी कोऑर्डिनेटेड इंटरवेंशन की कार्यप्रणाली का बारीकी से निरीक्षण किया गया। वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अपहरण जैसी अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में केवल आधुनिक हथियारों के साथ मौके पर पहुंच जाना ही काफी नहीं होता है। ऐसे नाजुक पलों में सेकंडों के भीतर सटीक और सही निर्णय लेना, अलग-अलग शाखाओं के बीच बिना किसी रुकावट के निरंतर संचार बनाए रखना और पूरे ऑपरेशन को बिना किसी भ्रम के एक साझी रणनीति के तहत आगे बढ़ाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
प्रतिक्रिया समय और सामरिक दक्षता की सघन समीक्षा
सुरक्षा अधिकारी ने आगे स्पष्ट किया कि इस संपूर्ण ड्रिल का प्राथमिक केंद्र बिंदु ऑपरेशनल तैयारियों, रिस्पॉन्स टाइम और टैक्टिकल रेडीनेस का यथार्थवादी मूल्यांकन करना था। इसका अर्थ यह जांचना था कि आपात स्थिति की पहली सूचना मिलते ही सुरक्षा जवान कितनी सेकंडों में सक्रिय होकर हरकत में आते हैं, विभिन्न दस्तों की घेराबंदी कितनी मजबूत रहती है और अत्यधिक दबाव वाले चुनौतीपूर्ण हालात में सामरिक ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया जाता है। इस विस्तृत अभ्यास का मुख्य मकसद अलग-अलग रिस्पॉन्स टीमों के बीच आपसी समन्वय को और अधिक सुदृढ़ बनाना तथा हवाई अड्डे की सुरक्षा को भेदने वाले किसी भी संभावित खतरे का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सीआईएसएफ के पूरे तंत्र को चाक-चौबंद रखना था।



















