राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में 1 नवंबर को विपक्षी दलों के गठबंधन ने एकजुट होकर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। 'वोट बचाओ, देश बचाओ' के नारे के तहत आयोजित इस विशाल जनसभा और मार्च का मुख्य केंद्र चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना रहा। कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में हुए इस आयोजन में विभिन्न गैर-बीजेपी दलों के शीर्ष रणनीतिकार और प्रमुख नेता एक मंच पर जुटे, हालांकि महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरे इस शक्ति प्रदर्शन से नदारद रहे।
मल्लिकार्जुन खरगे के आवास से शुरू हुआ विरोध मार्च
इस बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की शुरुआत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सरकारी आवास पर नेताओं के जुटने के साथ हुई। रैली में शामिल होने वाले तमाम दलों के प्रतिनिधि पहले वहां एकत्रित हुए और प्रारंभिक चर्चा के बाद खुले वाहनों में सवार होकर आगे बढ़े। यह काफिला खुले वाहनों के जरिए मिंटो रोड तक पहुंचा। इसके बाद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पैदल मार्च शुरू किया, जो मिंटो रोड से अजमेरी गेट होते हुए सीधे रामलीला मैदान तक पहुंचा। इस पैदल मार्च के दौरान सड़क पर भारी संख्या में समर्थक मौजूद रहे और उन्होंने हाथों में तख्तियां लेकर नारेबाजी की।
मंच पर दिग्गज चेहरों का जमावड़ा, कुछ बड़े नाम रहे गैरहाजिर
इस विरोध प्रदर्शन में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी के अलावा समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव शामिल हुए। इनके साथ तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी, नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला, माकपा के महासचिव एमए बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा और भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी मंच पर मौजूद रहे। कांग्रेस पार्टी के लगभग सभी पूर्व मुख्यमंत्री और कई वरिष्ठ रणनीतिकार भी इस दौरान सभा में उपस्थित रहे।
दूसरी ओर, इस बड़े राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और एनसीपी के वरिष्ठ नेता शरद पवार जैसे कद्दावर चेहरे नजर नहीं आए। हालांकि, संबंधित राजनीतिक दलों के दूसरे प्रतिनिधियों की मौजूदगी कार्यक्रम में बनी रही। रैली में कुल 21 विपक्षी दलों के नेताओं और प्रतिनिधियों के शामिल होने का दावा किया गया, जिसका उद्देश्य देश भर में विपक्षी एकजुटता का ठोस संदेश देना था।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर गंभीर आरोप और इस्तीफे की मांग
विपक्षी गठबंधन के इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली रहा। विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में योग्य और पात्र नागरिकों के नाम बिना वैध आधार के हटा दिए गए हैं। गठबंधन ने इसे सीधे तौर पर वोट चोरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार दिया।
इन आरोपों को आधार बनाते हुए विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ तीखा रुख अख्तियार किया। गठबंधन ने औपचारिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। विपक्षी नेताओं का कहना था कि मतदाता सूची में की गई कथित गड़बड़ियों ने देश की संपूर्ण चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और साख पर गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। हालांकि, चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक मतभेद लगातार बने हुए हैं।
राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए इस साझा रैली के मायने
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस रैली से एक दिन पहले सोशल मीडिया के माध्यम से आम नागरिकों और कार्यकर्ताओं से इस मार्च का हिस्सा बनने का आह्वान किया था। उन्होंने देशवासियों से लोकतंत्र और मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए सड़क पर उतरने की अपील की थी। इस आह्वान के बाद विभिन्न राज्यों से पार्टी कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे और उन्होंने रामलीला मैदान में चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया के खिलाफ जमकर नारे लगाए।
राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से राहुल गांधी लगातार चुनावी प्रक्रिया और वोटर लिस्ट में कथित विसंगतियों का सवाल उठाते रहे हैं। रामलीला मैदान में आयोजित इस बड़े सम्मेलन के जरिए कांग्रेस ने इस मुद्दे को सिर्फ अपनी पार्टी तक सीमित रखने के बजाय पूरे गठबंधन का एक संयुक्त और साझा एजेंडा बनाने का प्रयास किया है। अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की सक्रिय मौजूदगी ने यह दर्शाने की कोशिश की कि चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर विपक्षी दलों में समान चिंता है, भले ही अलग-अलग राज्यों में चुनावी समीकरण और राजनीतिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से भिन्न हों।





















