नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आम आदमी पार्टी द्वारा नेशनल टाउनहॉल अगेंस्ट ई-20 कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार के समक्ष देशवासियों की ओर से तीन प्रमुख मांगें रखीं। उन्होंने मांग की कि सभी पेट्रोल पंपों पर वाहन चालकों को ई-20 और शुद्ध पेट्रोल दोनों के बीच चयन करने का स्पष्ट विकल्प दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, इथेनॉल मिश्रित ई-20 ईंधन की कीमत शुद्ध पेट्रोल से कम होनी चाहिए और देश में पेट्रोल का खुदरा मूल्य 84 रुपये प्रति लीटर से नीचे लाया जाना चाहिए।
इथेनॉल मिश्रण पर तीन प्रमुख मांगें और कीमत का गणित
देशभर में ई-20 ईंधन के इस्तेमाल को लेकर उठ रहे सवालों के बीच आयोजित इस राष्ट्रीय टाउनहॉल में केंद्र सरकार की मौजूदा नीतियों की कड़ी समीक्षा की गई। अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि आम जनता पर जबरन मिलावटी ईंधन थोपना अनुचित है। वर्तमान में पेट्रोल पंपों पर शुद्ध पेट्रोल का विकल्प समाप्त कर दिए जाने से उपभोक्ताओं के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
ईंधन की दरों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बिना टैक्स जोड़े शुद्ध पेट्रोल की लागत लगभग 50 रुपये प्रति लीटर बैठती है, जबकि इथेनॉल की लागत करीब 70 रुपये प्रति लीटर आती है। इस प्रकार इथेनॉल शुद्ध पेट्रोल से महंगा होने के बावजूद वाहनों में मिलाया जा रहा है। इसके साथ ही इथेनॉल की कैलोरीफिक वैल्यू कम होने की वजह से वाहनों का माइलेज घट जाता है, जिससे वाहन चालकों की जेब पर दोहरा आर्थिक बोझ पड़ता है। इसलिए पेट्रोल का दाम 84 रुपये प्रति लीटर से कम करने और ई-20 को सस्ता बेचने की मांग उठाई गई है।
अमेरिका से इथेनॉल आयात और व्यापार समझौते का प्रभाव
अरविंद केजरीवाल ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अमेरिका को खुश करने के उद्देश्य से देश के नागरिकों पर इथेनॉल का दबाव बना रही है। अमेरिका वर्तमान में दुनिया भर में इथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भारत ने अमेरिका से 1 बिलियन लीटर इथेनॉल का आयात किया था।
ई-20 नीति लागू होने के पश्चात इस वर्ष अमेरिका से इथेनॉल का आयात 5 गुना तक बढ़कर लगभग 5 बिलियन लीटर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता हस्ताक्षरित हुआ है, जिसके तहत आगामी 5 वर्षों के भीतर भारत को अमेरिका से 100 बिलियन डॉलर मूल्य की सामग्री और वस्तुएं खरीदना अनिवार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि इस व्यापारिक दायित्व को पूरा करने के लिए देश की जनता के हितों से समझौता किया जा रहा है।
वाहन मालिकों के लिए चेतावनी और इलेक्ट्रिक व्हीकल का विकल्प
कार्यक्रम के दौरान अरविंद केजरीवाल ने देश के नागरिकों से एक महत्वपूर्ण अपील की। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि जब तक भारतीय बाजार में ई-100 क्षमता वाले इंजनों का निर्माण और बिक्री आधिकारिक रूप से शुरू नहीं हो जाती, तब तक वे नए पेट्रोल और डीजल वाहन खरीदने से बचें।
डीजल गाड़ियों के विषय में आगाह करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सरकार डीजल में भी इसी प्रकार का मिश्रण करने की योजना बना रही है। इसलिए वर्तमान परिस्थिति में केवल इलेक्ट्रिक वाहन (EV) खरीदना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। उन्होंने अंदेशा जताया कि यदि सरकार ई-25, ई-30 और ई-40 जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधन लागू करती है, तो पुराने वाहनों के इंजन पूरी तरह से खराब हो जाएंगे। सरकार वर्तमान में अध्ययन का हवाला देकर स्थिति शांत होने का इंतजार कर रही है और मुद्दा ठंडा पड़ते ही नए मिश्रण थोप दिए जाएंगे।
45 हजार ड्राइवरों का सर्वे और इंजन खराबी के आंकड़े
जनता की समस्याओं को सामने रखते हुए अरविंद केजरीवाल ने लोकल सर्कल्स नाम की एक स्वतंत्र संस्था द्वारा किए गए देशव्यापी सर्वेक्षण के आंकड़े पेश किए। इस सर्वेक्षण में देश भर के 45 हजार वाहन चालकों और मालिकों को शामिल किया गया था, जो दैनिक आधार पर अपनी गाड़ियों का उपयोग करते हैं।
सर्वेक्षण के नतीजों से यह खुलासा हुआ कि ई-20 ईंधन के प्रयोग के बाद 67 प्रतिशत लोगों ने अपने वाहनों के माइलेज में भारी कमी दर्ज की है। इसके अतिरिक्त, 45 प्रतिशत वाहन मालिकों ने बताया कि उनके वाहनों के इंजन में गंभीर तकनीकी खराबी आ गई है या इंजन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि 7 लाख से अधिक नागरिक इस विषय पर अपना समर्थन दर्ज करा चुके हैं। जब केंद्रीय मंत्री यह दावा करते हैं कि ई-20 पूरी तरह सुरक्षित है और इसका विरोध करने वाले देशविरोधी हैं, तो उन्हें इन 45 हजार लोगों के प्रत्यक्ष अनुभवों और साक्ष्यों का जवाब देना चाहिए।
वैज्ञानिक अध्ययन और डिग्रियों पर पारदर्शिता की मांग
सरकार द्वारा किए गए दावों पर सवाल उठाते हुए अरविंद केजरीवाल ने मांग की कि यदि ई-20 ईंधन पर कोई वैज्ञानिक शोध, इंजीनियरिंग रिपोर्ट या विस्तृत अध्ययन हुआ है, तो उसे देश की जनता के सामने सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना किसी प्रामाणिक रिपोर्ट के सरकारी दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
शिक्षा और डिग्रियों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनकी आईआईटी खड़गपुर की इंजीनियरिंग डिग्री सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई थी और संस्थान द्वारा प्रदान भी की गई। इसके विपरीत, जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री देखने की मांग की, तो उनके खिलाफ गुजरात में आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया गया और वहां मुकदमा चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश में नीतिगत फैसलों पर पारदर्शी चर्चा होनी आवश्यक है।
ऑटो कंपनियों का रुख और पूर्व-2023 मॉडल की सुरक्षा पर सवाल
इंजन की तकनीकी सुरक्षा को परखने के लिए अरविंद केजरीवाल ने देश में दोपहिया और चारपहिया वाहन बनाने वाली 29 प्रमुख ऑटोमोबाइल निर्माता कंपनियों को पत्र लिखे थे। इन पत्रों में कंपनियों से दो मुख्य सवाल पूछे गए थे।
पहला प्रश्न यह था कि क्या साल 2023 से पहले निर्मित वाहनों में ई-20 ईंधन का प्रयोग सुरक्षित है? दूसरा प्रश्न यह था कि यदि ई-20 के प्रयोग से वाहन का इंजन खराब होता है या माइलेज कम होता है, तो क्या ऑटो कंपनियां ग्राहक को मुआवजा देने का लिखित आश्वासन देंगी? यद्यपि किसी भी कंपनी ने लिखित जवाब नहीं भेजा, लेकिन 9 ऑटो कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से हुई विस्तृत बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि 2023 से पूर्व बनी गाड़ियां ई-10 ईंधन मानक पर आधारित थीं और उनमें ई-20 का उपयोग सुरक्षित नहीं है।
इथेनॉल का आर्थिक पक्ष, माइलेज और पर्यावरण पर असर
अरविंद केजरीवाल ने इथेनॉल उत्पादन के आर्थिक और पर्यावरणीय दुष्परिणामों का भी विस्तृत ब्योरा दिया। सरकार द्वारा विदेशी मुद्रा की बचत के दावे को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न स्वतंत्र गणनाओं से सिद्ध होता है कि इथेनॉल के आयात से कोई विदेशी मुद्रा नहीं बच रही है।
इसके साथ ही, इथेनॉल निर्माण से देश के किसानों को भी कोई प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ नहीं पहुंच रहा है। इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में इथेनॉल निर्माण संयंत्र स्थापित किए गए हैं, वहां 20 किलोमीटर के दायरे में भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है और उपजाऊ भूमि बंजर हो चुकी है। जल संकट और भूमि प्रदूषण के कारण स्थानीय किसान भारी परेशानी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जब न तो उपभोक्ताओं को फायदा हो रहा है, न किसानों को और न ही पर्यावरण को, तो केंद्र सरकार द्वारा इस नीति को पूरे देश पर थोपने का औचित्य समझ से परे है।



















