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दिल्ली की जिला अदालतों में खाली पड़े हैं हजारों पद, आखिर क्यों लग रही हैं मुकदमों में तारीखेंदिल्ली
24 अग॰ 2026, 9:30 am (22 दिन पहले)· 3

दिल्ली की जिला अदालतों में खाली पड़े हैं हजारों पद, आखिर क्यों लग रही हैं मुकदमों में तारीखें

दिल्ली की जिला अदालतों में कर्मचारियों और अधिकारियों के भारी अभाव का खुलासा आरटीआई से हुआ है, जिससे मुकदमों के निस्तारण में देरी हो रही है।

भारतीय न्याय व्यवस्था में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि मुकदमों की सुनवाई में इतनी लंबी देरी क्यों होती है और तारीख पर तारीख मिलने का सिलसिला थमता क्यों नहीं है। अब इस व्यवस्थागत समस्या की एक बड़ी वजह आरटीआई के जरिए सामने आए ताजा आंकड़ों से साफ हो गई है। दिल्ली की जिला अदालतों में प्रशासनिक अमले और कर्मचारियों की भारी किल्लत चल रही है, जिसके कारण न्याय प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ रहा है और आम नागरिकों को न्याय के लिए कई-कई साल तक इंतजार करना पड़ रहा है।

खाली पड़े हैं हजारों पद और शीर्ष प्रशासनिक कुर्सियां

जिला एवं सत्र न्यायालय कर्मचारी कल्याण संघ द्वारा आरटीआई के माध्यम से जुटाई गई जानकारी से यह पता चला है कि दिल्ली की जिला अदालतों में कुल 8,575 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 1,711 पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। हाल ही में इस कर्मचारी संघ ने दिल्ली के कानून मंत्री कपिल मिश्रा को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है, जिसमें इन आंकड़ों का हवाला देते हुए स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया गया है। ज्ञापन के मुताबिक, 30 जून 2026 तक इन अदालतों में सिर्फ 6,864 अधिकारी और कर्मचारी ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जबकि कार्यभार लगातार बढ़ता जा रहा है।

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शीर्ष पदों पर सन्नाटा और पदोन्नति का अभाव

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अदालतों के उच्च प्रशासनिक और निर्णायक पदों पर सबसे ज्यादा रिक्तियां बनी हुई हैं। आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के सभी 10 स्वीकृत पद पूरी तरह से खाली पड़े हैं। इसके अलावा, न्यायिक प्रशासनिक अधिकारी के 50 में से 45 पद रिक्त हैं। निचले और मध्यम स्तर पर भी स्थिति कुछ ऐसी ही है, जहां वरिष्ठ न्यायिक सहायक के 709 पदों में से 277 पद और कनिष्ठ न्यायिक सहायक के 1,662 पदों में से 454 पद खाली चल रहे हैं।

लंबित मामलों का पहाड़ और कर्मचारियों का असंतोष

स्टाफ की इस भारी कमी का सीधा असर अदालतों में पेंडिंग मामलों की संख्या पर पड़ रहा है। आंकड़े गवाही देते हैं कि साल 2009 के अंत में दिल्ली की जिला अदालतों में लंबित मामलों का आंकड़ा 10,63,202 था, जो बढ़ते-बढ़ते 31 मई 2026 तक बढ़कर 16,85,990 तक पहुंच चुका है। संघ ने इस बदहाली के पीछे लंबे समय से रुकी हुई पदोन्नतियों को मुख्य वजह बताया है। स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में कनिष्ठ न्यायिक सहायकों ने बिना किसी प्रमोशन के अपनी नौकरी के करीब 17 साल गुजार दिए हैं।

विभागीय परीक्षाओं की अनदेखी और प्रशासनिक ठप पड़ना

कर्मचारी कल्याण संघ के मुताबिक, अनिवार्य विभागीय पदोन्नति परीक्षाओं का समय पर आयोजित न होना और कैडर पुनर्गठन में हो रही देरी की वजह से उच्च पद लगातार खाली रह गए हैं। संघ के महासचिव और आरटीआई आवेदक अरुण यादव ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि किसी संस्था का शीर्ष निर्णय लेने वाला प्रशासन साल 2012 से लगातार 15 साल तक खाली रहेगा, तो प्रशासनिक कामकाज सुचारू रूप से कैसे चल पाएगा। इसी हताशा और अत्यधिक दबाव के चलते कर्मचारी इस्तीफा देने या वीआरएस लेने को मजबूर हो रहे हैं।

कानून मंत्री का आश्वासन और भविष्य की चिंताएं

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद कर्मचारी संघ के प्रतिनिधियों ने कानून मंत्री कपिल मिश्रा से मुलाकात की है। संघ के सदस्यों के अनुसार, मंत्री ने यह भरोसा दिलाया है कि दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ होने वाली आगामी बैठक में इस गंभीर मुद्दे को पूरी प्राथमिकता के साथ उठाया जाएगा और इन कमियों को दूर करने के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार किया जाएगा। यदि इन समस्याओं का समाधान जल्द नहीं निकाला गया, तो अदालतों पर मुकदमों का बोझ और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है।

सवाल-जवाब

दिल्ली की जिला अदालतों में कुल कितने स्वीकृत पद हैं?
दिल्ली की जिला अदालतों में कुल 8,575 स्वीकृत पद हैं।
आरटीआई के अनुसार कितने पद खाली पड़े हैं?
आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार 8,575 स्वीकृत पदों में से 1,711 पद खाली पड़े हैं।
31 मई 2026 तक दिल्ली की जिला अदालतों में कितने मामले लंबित थे?
31 मई 2026 तक जिला अदालतों में कुल 16,85,990 मामले लंबित थे।
कर्मचारी संघ ने हाल ही में किसे ज्ञापन सौंपा है?
जिला एवं सत्र न्यायालय कर्मचारी कल्याण संघ ने दिल्ली के कानून मंत्री कपिल मिश्रा को ज्ञापन सौंपा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·21 दिन पहले

आरटीआई से उजागर इन आंकड़ों ने दिल्ली की जिला अदालतों की पोल खोल दी है, जहाँ एक तरफ सत्रह लाख के करीब लंबित मामले न्याय व्यवस्था पर भारी बोझ बने हैं, तो दूसरी तरफ शीर्ष प्रशासनिक पदों का खाली रहना बताता है कि जवाबदेही का स्तर क्या है। यदि समय पर पदोन्नति और विभागीय परीक्षाएं नहीं कराई गईं, तो यह प्रशासनिक लकवा आने वाले दिनों में न्याय पाने की प्रक्रिया को पूरी तरह ठप कर सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·21 दिन पहले

यह संकट सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश समेत देश भर के निचली अदालतों की प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलता है। जब तक प्रशासनिक कैडर का नियमित पुनर्गठन और समय पर विभागीय परीक्षाएं नहीं होंगी, तब तक बुनियादी स्तर पर सुधार असंभव है। यदि इस मोर्चे पर तत्काल नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो ज़मीनी स्तर पर न्याय की आस लगाए बैठे आम नागरिकों का सिस्टम से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।

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