पीतल नगरी में खास मसालों और मक्खन के साथ परोसी जाती है मुरादाबादी मूंग दालतुला राशिफल 25 सितंबर 2026: राहु और मंगल के प्रभाव से करियर में आएगी गति, वित्तीय संतुलन और रिश्तों पर दें ध्याननागोया में भारत के पास आज कई मेडल पक्के करने का मौका, निशानेबाजी और कबड्डी पर टिकी निगाहेंशी जिनपिंग के स्वागत में व्हाइट हाउस का शाही मेन्यू, फ्रेंच स्वाद के साथ परोसे गए खास व्यंजनराजस्थान के तीन बड़े शहरों में महापौर चुनने की जंग, जयपुर में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामनेकश्मीरी गेट के पास ई-रिक्शा रोककर लूटपाट, चाकू के वार से युवक की जान गई और दो जख्मीछत और बालकनी पर सब्जियां उगाते समय न करें केमिकल का छिड़काव, पूसा विशेषज्ञ ने सुझाए जैविक खाद के आसान उपायवृश्चिक राशिफल 25 सितंबर 2026: 12वें भाव में शुक्र जगाएगा सुख-सुविधाओं की चाहत, बजट और सेहत का रखें ध्यानबिटगेट पर बड़ा साइबर हमला, हॉट वॉलेट से उड़ाए गए 351 मिलियन डॉलरपंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर योगी आदित्यनाथ ने दी श्रद्धांजलि, अंत्योदय और एकात्म मानववाद के विचार को किया याद
देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर की बेजोड़ वास्तुकला, लंदन के विशेषज्ञ भी नहीं बना सके दूसरा रास्ताझारखंड
19 सित॰ 2026, 3:09 pm (6 दिन पहले)· 1

देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर की बेजोड़ वास्तुकला, लंदन के विशेषज्ञ भी नहीं बना सके दूसरा रास्ता

झारखंड के देवघर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ मंदिर की अद्भुत संरचना, एकल द्वार और गर्भगृह के पत्थरों की नमी आज भी लोगों के लिए विस्मय का विषय बनी हुई है।

झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यह पावन तीर्थ केवल करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अपनी रहस्यमयी स्थापत्य कला और सदियों पुरानी बनावट के कारण भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं को अचंभित करता आया है। मंदिर के विशाल प्रांगण में देवाधिदेव महादेव के साथ माता शक्ति और अन्य देवी-देवताओं के देवालय स्थापित हैं। इन सबके बीच मुख्य गर्भगृह की वास्तुकला और उसका निर्माण कौशल आज के आधुनिक दौर में भी लोगों के बीच गहरी जिज्ञासा पैदा करता है।

भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्माण से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं

धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन धाम में भगवान शिव साक्षात ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। देश के कोने-कोने से हर वर्ष लाखों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर क्षेत्र में अत्यंत रोचक आख्यान प्रचलित हैं। जनश्रुति के अनुसार, पूरे परिसर के पांच अति महत्वपूर्ण देवालयों की रचना स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने की थी। इन पांच विशिष्ट निर्माणों में बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर, माता शक्ति का मंदिर और लक्ष्मी नारायण मंदिर प्रमुख रूप से शामिल बताए जाते हैं।

ये भी पढ़ें

एकल द्वार और पत्थरों की बेजोड़ बनावट

देवघर के सुप्रसिद्ध तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, मुख्य मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रवेश और निकास द्वार है। गर्भगृह के अंदर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है, लेकिन इस पूरे मुख्य मंदिर में आने-जाने के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद है। मंदिर का समूचा ढांचा भारी-भरकम पत्थरों को इस जटिल और संतुलित ढंग से परस्पर जोड़कर बनाया गया है कि किसी भी हिस्से में थोड़ा-सा फेरबदल करना भी अत्यंत कठिन जान पड़ता है। इसी कारण मंदिर के मूल स्वरूप को समझे बिना किसी नए रास्ते की कल्पना करना संभव नहीं हो सका है।

साल 1962 में लंदन से बुलाए गए थे तकनीकी विशेषज्ञ

मंदिर की जटिल वास्तुकला और दूसरे द्वार की आवश्यकता को परखने के लिए कई बार विख्यात अभियंताओं ने स्थल का मुआयना किया। पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, वर्ष 1962 में जब बिहार और झारखंड संयुक्त राज्य के रूप में थे, उस दौरान तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा ने लंदन से विशेष इंजीनियरों के एक दल को देवघर आमंत्रित किया था। विदेशी विशेषज्ञों के इस दल ने मंदिर के ढांचे का बारीकी से अध्ययन किया और परिसर में एक अतिरिक्त मार्ग निकालने की तमाम वैज्ञानिक संभावनाओं की पड़ताल की। हालांकि, जांच-पड़ताल के बाद वे भी दूसरा रास्ता तैयार करने में सफल नहीं हो सके। विशेषज्ञों और जानकारों का मानना रहा है कि पत्थरों की इस परस्पर जुड़ी संरचना में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर पूरे प्राचीन ढांचे के ढहने या उसे भारी क्षति पहुंचने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

गर्भगृह के पत्थरों से रिसने वाली नमी और सात फीट चौड़ी नींव

बाबा बैद्यनाथ मंदिर के आंतरिक गर्भगृह से जुड़ा एक अन्य पहलू भी श्रद्धालुओं के बीच गहरे कौतूहल का कारण रहता है। गर्भगृह की दीवारों पर जड़े विशाल शिलाखंड अक्सर तरबतर या नम नजर आते हैं। वहां जाने वाले कई दर्शनार्थियों को ऐसा प्रतीत होता है मानो ठोस पत्थरों से पसीने की तरह पानी की बूंदें बाहर निकल रही हों। इसके अतिरिक्त, मंदिर की विशाल नींव को लेकर भी कई जानकारियां सामने आती रही हैं। प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, इस पूरे पावन भवन का आधार करीब सात फीट चौड़े पाषाण खंडों पर टिका हुआ है। ये भारी शिलाएं भूमि के भीतर कितनी गहराई तक समाई हुई हैं, इसका कोई स्पष्ट और प्रामाणिक ब्योरा आज तक सामने नहीं आ पाया है।

आस्था और प्राचीन भारतीय शिल्पकला का अनूठा संगम

यद्यपि मंदिर के निर्माण और इसकी विशेषताओं से जुड़ी अनेक बातें जनश्रुतियों, धार्मिक विश्वासों और स्थानीय परंपराओं का हिस्सा हैं, फिर भी यह प्राचीन वास्तुकला भक्तों और आगंतुकों को समान रूप से सम्मोहित करती है। बाबा बैद्यनाथ धाम में हर मौसम में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है, जहां वे शिवलिंग पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ-साथ पूर्वजों की इस अद्वितीय और अभेद्य निर्माण कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नजर आते हैं।

सवाल-जवाब

बाबा बैद्यनाथ मंदिर किस राज्य और शहर में स्थित है?
बाबा बैद्यनाथ मंदिर झारखंड राज्य के देवघर शहर में स्थित है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर के मुख्य देवालयों का निर्माण किसने किया था?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बाबा बैद्यनाथ, माता शक्ति और लक्ष्मी नारायण मंदिर सहित परिसर के पांच प्रमुख मंदिरों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था।
मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश और निकास की क्या व्यवस्था है?
मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद है।
वर्ष 1962 में मंदिर में इंजीनियरों को क्यों बुलाया गया था?
वर्ष 1962 में तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा ने मंदिर की संरचना का अध्ययन करने और दूसरा रास्ता तलाशने के लिए लंदन से इंजीनियरों को बुलाया था।
लंदन के इंजीनियर दूसरा दरवाजा क्यों नहीं बना सके?
इंजीनियरों ने पाया कि मंदिर की पत्थर वाली संरचना में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर पूरे प्राचीन ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा था।
गर्भगृह के पत्थरों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच क्या कौतूहल है?
गर्भगृह में लगे पत्थर अक्सर गीले दिखाई देते हैं, जिससे श्रद्धालुओं को लगता है कि पत्थरों से पसीने जैसी नमी निकल रही है।
मंदिर की नींव को लेकर तीर्थ पुरोहित ने क्या जानकारी दी है?
तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार मंदिर का ढांचा करीब सात फीट चौड़े पत्थरों के आधार पर टिका हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

बाबा बैद्यनाथ मंदिर की यह वास्तुकला प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की उत्कृष्ट मिसाल है, जहाँ पत्थरों का इंटरलॉकिंग सिस्टम आज के आधुनिक स्ट्रक्चरल डिज़ाइन को भी चुनौती देता है। 1962 में लंदन के विशेषज्ञों की असफलता यह साबित करती है कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान भौतिकी और गुरुत्वाकर्षण के संतुलन में कितना उन्नत था। इस तरह के प्राचीन धरोहरों का डिजिटल दस्तावेजीकरण और 3डी मैपिंग भविष्य के शोध और पर्यटन के लिए बेहद जरूरी है, जिससे बिना किसी छेड़छाड़ के इस अद्भुत स्थापत्य को सहेजा जा सके।

Li Wei@li-wei·5 दिन पहले

प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला में उपयोग की जाने वाली यह शुष्क चिनाई और इंटरलॉकिंग तकनीक वैश्विक स्तर पर भू-इंजीनियरिंग और लोड-बेयरिंग रिसर्च के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। आधुनिक निर्माण क्षेत्र में जिस प्रकार से सस्टेनेबिलिटी और भूकंपीय सुरक्षा पर जोर दिया जा रहा है, ऐसे में इस ऐतिहासिक धरोहर का आधुनिक लेजर स्कैनिंग और नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग के माध्यम से विश्लेषण किया जाना चाहिए। इससे न केवल प्राचीन निर्माण शैलियों के रहस्यों से पर्दा उठेगा, बल्कि आधुनिक वास्तुकला को टिकाऊ और आपदा-रोधी ढांचे तैयार करने में भी बहुमूल्य वैज्ञानिक इनपुट मिल सकेंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

बाबा बैद्यनाथ मंदिर की यह संरचना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग और लोक नीति के अंतर्गत पुराडेस्क तथा सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की अनूठी मिसाल है। 1962 में लंदन के विशेषज्ञों की विफलता यह साबित करती है कि हमारे पूर्वजों का स्थापत्य ज्ञान आधुनिक विज्ञान से कई मायनों में आगे था। ऐसे में, इस ऐतिहासिक धरोहर के प्रबंधन और पर्यटन विकास के लिए किसी भी प्रशासनिक या सरकारी नीति में इसके मूल ढांचे से छेड़छाड़ किए बिना सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के वैकल्पिक वैज्ञानिक उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

बाबा बैद्यनाथ मंदिर की इस अनोखी वास्तुकला और एकल द्वार की बनावट से जुड़े इस ऐतिहासिक मामले में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से एक गंभीर पहलू छिपा है। जब 1962 में लंदन के विशेषज्ञ भी दूसरा रास्ता नहीं बना सके, तो आज के दौर में बढ़ती भीड़ और जनसुरक्षा के दबाव के बीच आपातकालीन निकास की योजना बनाना जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। बिना मूल ढांचे को नुकसान पहुँचाए सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना न्यायसंगत और जनहित का एक अतिसंवेदनशील मामला है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

वर्ष 1962 में लंदन के विशेषज्ञों द्वारा दूसरा मार्ग न बना पाना केवल एक ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि आज के प्रशासनिक तंत्र के लिए सीधी चेतावनी है। श्रावण मास और महाशिवरात्रि जैसे बड़े आयोजनों में उमड़ने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच एकल द्वार की व्यवस्था भगदड़ और सुरक्षा के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील है। जिला प्रशासन को बिना प्राचीन ढांचे को क्षति पहुँचाए आधुनिक तकनीकी विकल्पों और क्राउड मैनेजमेंट के वैज्ञानिक तरीकों पर तत्काल गंभीर विचार करना चाहिए, ताकि जनसुरक्षा से कोई समझौता न हो।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp