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धन की कमी नहीं बनेगी श्राद्ध में बाधा, हरिद्वार के पुरोहित ने बताए पितृ विसर्जन अमावस्या पर तर्पण के सरल उपायउत्तराखंड
8 अक्तू॰ 2026, 6:49 pm (30 दिन पहले)· 0

धन की कमी नहीं बनेगी श्राद्ध में बाधा, हरिद्वार के पुरोहित ने बताए पितृ विसर्जन अमावस्या पर तर्पण के सरल उपाय

पितृ पक्ष में आर्थिक तंगी के बावजूद पूर्वजों को तृप्त किया जा सकता है। हरिद्वार के पुरोहित पंडित नितिन शर्मा ने बिना खर्च केवल जल या सच्चे भाव से तर्पण करने के शास्त्रसम्मत नियम साझा किए हैं।

भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाला पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक बेहद पावन अवसर माना जाता है। पूरे संवत में आने वाली सभी अमावस्या तिथियों में आश्विन मास की पितृ अमावस्या को सर्वाधिक फलदायी माना गया है। इन 16 दिनों की अवधि में परिवार के सदस्य पिंडदान, तर्पण और पितृ हवन जैसे अनुष्ठानों के माध्यम से अपने कुल के सभी दिवंगत जनों को तृप्त करने का प्रयास करते हैं। आश्विन अमावस्या को पितृ विसर्जन अमावस्या भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पूर्वजों को पृथ्वी लोक से विदाई देकर उनके लोक भेजा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष तिथि पर निष्ठापूर्वक किया गया तर्पण और पिंडदान पूर्वजों को प्रसन्न करता है, जिससे जीवन के संकट समाप्त होते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है। अक्सर लोग इन 16 दिनों में तरह-तरह के अनुष्ठान आयोजित करते हैं, लेकिन कई बार गंभीर आर्थिक तंगी के कारण कुछ लोग पिंडदान या महंगे धार्मिक कर्मकांड करवाने में खुद को असमर्थ पाते हैं। यदि किसी के पास हवन, पिंडदान या नारायण बलि कराने के लिए धन की व्यवस्था न हो, तो भी शास्त्रों में ऐसे सहज और सुलभ मार्ग सुझाए गए हैं जिनसे बिना किसी खर्च के पूर्वजों को पूर्ण तृप्ति मिल सकती है।

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10 अक्टूबर को आ रही है पितृ विसर्जन अमावस्या

हरिद्वार के पुरोहित पंडित नितिन शर्मा ने बताया कि वर्ष 2026 में पितृ विसर्जन अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ रही है। यह तिथि उन सभी लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिन्हें अपने पूर्वजों के देहावसान की सही तिथि याद नहीं रहती या फिर किसी अपरिहार्य कारणवश जिनका श्राद्ध पक्ष के दौरान छूट गया हो। पंडित नितिन शर्मा का कहना है कि हिंदू धार्मिक परंपरा में पूर्वजों की तृप्ति के लिए विपुल धन-दौलत अथवा भव्य आयोजन का होना कतई अनिवार्य नहीं है, क्योंकि यहां बाहरी दिखावे के मुकाबले मन की सच्ची श्रद्धा को ही सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

बिना धन खर्च किए इस तरह करें पूर्वजों का तर्पण

पंडित नितिन शर्मा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निर्धनता या वित्तीय संकट के चलते पिंडदान, हवन अथवा नारायण बलि जैसी पूजन सामग्री जुटाने में असमर्थ है, तो उसे हताश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और सच्चे मन के साथ केवल एक लोटे में गंगाजल या कोई भी शुद्ध जल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों का स्मरण करते हुए अर्पित कर सकता है। शास्त्रों के अनुसार, केवल इतनी सरल विधि से जल अर्पित करने मात्र से भी पितर पूरी तरह संतुष्ट और तृप्त हो जाते हैं।

आंसुओं का जल भी कर देता है पितरों को हमेशा के लिए तृप्त

पंडित नितिन शर्मा ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी निर्धन व्यक्ति के पास तांबे का कोई पात्र जुटाने या साधारण जल अर्पित करने की भी परिस्थिति न हो, तो धार्मिक ग्रंथों में प्रेम और भक्ति से छलके आंसुओं को पूरे संसार का सबसे पवित्र जल स्वीकार किया गया है। पूर्वजों की स्मृति में सच्चे मन, अगाध प्रेम और कृतज्ञता के साथ आंखों से निकले आंसुओं का अर्घ्य देने मात्र से पूर्वज सदैव के लिए तृप्त हो जाते हैं। निर्धन व्यक्ति का यह सच्चा और निष्कपट भाव ही उसे पितृ ऋण से पूरी तरह मुक्त कर देता है, और पूर्वज अपने वंशजों को खुशहाली, वंश वृद्धि तथा लगातार उन्नति का आशीर्वाद प्रदान कर अपने लोक लौट जाते हैं।

सवाल-जवाब

वर्ष 2026 में पितृ विसर्जन अमावस्या किस तारीख को है?
साल 2026 में पितृ विसर्जन अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ रही है।
यदि किसी के पास पिंडदान के लिए पैसे न हों तो वह क्या करे?
वह दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके सच्चे मन से केवल एक लोटा गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित कर सकता है।
पितृ पक्ष की अवधि कब से कब तक मानी जाती है?
पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक पूरे 16 दिनों तक चलता है।
यदि किसी पूर्वज के देहावसान की तिथि याद न हो तो श्राद्ध कब करना चाहिए?
जिन पूर्वजों के देहावसान की तिथि याद न हो, उनका तर्पण पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन किया जाता है।
शास्त्रों में सबसे पावन जल किसे माना गया है?
धार्मिक ग्रंथों में पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा और प्रेम से छलके आंखों के आंसुओं को संसार का सबसे पावन जल माना गया है।
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टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·29 दिन पहले

श्रद्धा के लिए पैसे नहीं, बस भाव चाहिए। हरिद्वार के पंडित जी ने बहुत सही और सुकून भरी बात बताई है।

Ravikash Gupta@ravikash·30 दिन पहले

मुझे वो साल याद आ गया जब मेरे एक करीबी दोस्त के पास तर्पण का सामान खरीदने तक के पैसे नहीं थे और वो बहुत परेशान था। तब एक बुजुर्ग ने उसे बस एक लोटे जल से ही सब करने को कहा था। सचमुच, श्रद्धा मायने रखती है, पैसा नहीं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·30 दिन पहले

रविकेश जी, आपकी बात बिल्कुल सही है। नीति चाहे कैसी भी बने, असली चीज़ हमेशा सच्ची श्रद्धा ही होती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·30 दिन पहले

हरिद्वार में एक बुजुर्ग को ऐसे ही बिना पैसे सिर्फ गंगाजल से तर्पण करते देखा था, सच में भाव मायने रखते हैं दिखावा नहीं।

Rohan Verma@rohan-verma·30 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। हरिद्वार के पंडित नितिन शर्मा ने भी तो यही बताया है कि सच्चे भाव के आगे पैसे की कोई कीमत नहीं होती।

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