बिहार में बड़े पैमाने पर की जाने वाली धान की खेती में पानी का सही प्रबंधन फसल की पैदावार तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खरीफ सीजन के दौरान धान की रोपाई के करीब तीन महीने पूरे होने को हैं, और ऐसे में कई खेतों में पौधों से कलियां निकलने लगी हैं। जिन फसलों में समय से कलियां आ चुकी हैं, उनकी कटाई अक्टूबर के अंत तक पूरी की जाएगी। चार महीने से अधिक समय में पककर तैयार होने वाली इस फसल में बीज के अंकुरण से लेकर कटाई तक पानी की भारी खपत होती है। आंकड़ों के अनुसार, मात्र एक किलो धान का बीज तैयार करने में लगभग 3000 लीटर पानी खर्च हो जाता है। अक्सर भूजल या सिंचाई जल की कमी के कारण धान की फसल पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ता है।
कम पानी में बेहतर पैदावार के लिए सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर
जल संकट की चुनौतियों से निपटने और सीमित पानी में भी धान की भरपूर फसल लेने के लिए खेतों में एक विशेष कृषि यंत्र लगाया जा सकता है, जिसे सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर कहा जाता है। यह सरल उपकरण धान के खेत की मिट्टी के भीतर नमी और जलस्तर की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। जहानाबाद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र गंधार में पदस्थापित कृषि यंत्र एक्सपर्ट इंजीनियर जितेंद्र कुमार ने बताया कि इस यंत्र को किसान स्वयं बहुत ही आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसे अपनाकर किसान न केवल सिंचाई में लगने वाले पानी की बर्बादी रोक सकते हैं, बल्कि अपनी फसल से बेहतर उत्पादन भी सुनिश्चित कर सकते हैं।
घर पर कैसे तैयार करें 35 सेंटीमीटर का यह पाइप इंडिकेटर
इस देसी मॉनिटरिंग डिवाइस को बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल है और इसके लिए बाजार से किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। इसके निर्माण के लिए 35 सेंटीमीटर ऊंचाई और 4 इंच मोटाई वाला एक सामान्य प्लास्टिक पाइप लिया जाता है। पाइप के निचले 20 सेंटीमीटर के हिस्से में छोटे-छोटे छिद्र यानी छेद बनाए जाते हैं। इसके बाद इस छिद्रयुक्त 20 सेंटीमीटर वाले हिस्से को धान के खेत में जमीन के अंदर ऐसी जगह धंसा दिया जाता है, जहां किसान की नजर आसानी से पड़ सके।
पाइप का शेष 15 सेंटीमीटर बिना छिद्र वाला हिस्सा जमीन की सतह से ऊपर खुला रहता है। जमीन में गाड़ने के बाद पाइप के अंदर की मिट्टी को बाहर निकालकर अलग कर दिया जाता है। ऐसा करने से पाइप के भीतर एक खोखली जगह बन जाती है, जिसमें जमीन के अंदर मौजूद पानी छिद्रों के रास्ते रिसकर जमा होता है। इसी पानी को देखकर यह स्पष्ट पता चल जाता है कि खेत की मिट्टी में नीचे कितनी गहराई तक पानी उपलब्ध है।
खेत में पटवन का सही समय निर्धारित करने में मदद
इंजीनियर जितेंद्र कुमार के अनुसार, जब तक खेत की सतह पर पानी का स्तर 4 सेंटीमीटर ऊपर बना रहता है, तब तक सिंचाई की कोई चिंता नहीं होती। वास्तविक समस्या तब खड़ी होती है जब खेत की ऊपरी सतह से पानी पूरी तरह सूख जाता है। ऐसे में किसान यह मान लेते हैं कि खेत को तुरंत पानी की जरूरत है और वे फौरन पटवन शुरू कर देते हैं, भले ही पौधों की जड़ों में पर्याप्त नमी मौजूद हो। यहीं पर यह सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर किसानों के काम आता है।
पाइप में बने छिद्रों के जरिए किसान यह आसानी से देख पाते हैं कि जमीन के अंदर पानी किस स्तर तक मौजूद है। जब तक जड़ों के आसपास का जलस्तर सुरक्षित दायरे में रहता है, तब तक दोबारा पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती। किसान केवल उसी समय पटवन करते हैं जब पाइप के भीतर पानी का स्तर आवश्यक न्यूनतम सीमा से नीचे चला जाता है।
20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत और उपज में बढ़ोतरी
इस प्रकार के सिंचाई इंडिकेटर को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक शोध किए जा चुके हैं। वैश्विक अध्ययनों के बाद भारत के कुछ चुनिंदा राज्यों में इसका उपयोग शुरू हुआ, और अब बिहार के जहानाबाद जिले के कृषि विज्ञान केंद्र में भी इसे व्यावहारिक तौर पर किसानों के बीच आजमाया जा रहा है। इस मॉनिटरिंग पाइप की मदद से जल स्तर पर नजर रखकर किसान 20 से 25 प्रतिशत तक बहुमूल्य पानी की बचत कर सकते हैं। इसके साथ ही, अनावश्यक जलभराव न होने और जड़ों को अनुकूल वातावरण मिलने से फसल की उपज क्षमता में भी 20 प्रतिशत तक का इजाफा दर्ज किया जा सकता है।
पटवन का अंतराल और समय सीमा पूरी तरह से खेत की मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि खेत की मिट्टी रेतीली है, तो उसमें पानी तेजी से नीचे रिस जाता है, जिससे जल्दी-जल्दी सिंचाई करनी पड़ती है। इसके विपरीत, यदि खेत में चिकनी मिट्टी है, तो उसमें जल धारण क्षमता अधिक होने के कारण 12 से 15 दिनों के अंतराल पर भी सिंचाई की जा सकती है।
























