नई दिल्ली: केंद्र सरकार की ओर से जानवरों पर किए जाने वाले एक्सपेरीमेंट के नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी शुरू कर दी गई है। इस संबंध में एक नया ड्राफ्ट जारी किया गया है, जिसमें शामिल प्रावधानों ने पशु प्रेमियों और जानकारों को हैरान कर दिया है। देश में अब तक कॉस्मेटिक टेस्टिंग पूरी तरह बैन रही है, लेकिन नए नियमों के लागू होने के बाद इस पर लगी रोक हट सकती है और इसकी अनुमति मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
अब तक प्रयोगशालाओं में होने वाले ट्रायल्स के लिए बेहद कड़े नियम तय किए गए थे और हर बार सरकारी अथॉरिटी से अनुमति लेनी अनिवार्य होती थी। हालांकि, नए प्रावधानों के तहत एक्सपेरिमेंट्स के लिए केवल उन्हीं मामलों में सरकारी अनुमति की आवश्यकता होगी, जिनमें ट्रायल के दौरान जानवर को असहनीय दर्द सहना पड़े या फिर कोई ऐसा दुष्प्रभाव सामने आए जिससे उस मूक प्राणी की जान पर बन आए। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जानवर को ट्रायल के दौरान असहनीय दर्द होगा या नहीं, इस बात का फैसला खुद उस परीक्षण को करने वाली कंपनी की आंतरिक एक्सपर्ट कमेटी करेगी।
सरकार की ओर से जारी किए गए इस ड्राफ्ट में न केवल प्रयोगशाला के सामान्य जानवरों, बल्कि जंगली जीवों के साथ-साथ आवारा कुत्तों, बिल्लियों और अन्य बेघर जानवरों पर भी एक्सपेरीमेंट करने की खुली छूट दी गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि लैब टेस्ट करने वाली कंपनियों और संस्थानों को जंगली जानवरों और सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा पशुओं को पकड़कर उन पर अपने परीक्षण करने की कानूनी छूट मिल जाएगी।
हालांकि, सरकार ने अभी इन नए नियमों को अंतिम रूप से लागू नहीं किया है और फिलहाल केवल एक ड्राफ्ट ही सामने आया है। इस मसौदे पर आम जनता और संबंधित पक्षों से 5 नवंबर तक अपनी राय और आपत्तियां दर्ज कराने को कहा गया है। जैसे ही यह ड्राफ्ट सार्वजनिक हुआ, देश भर के एनिमल लवर्स और संगठनों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। पेटा इंडिया ने केंद्र सरकार से तत्काल प्रभाव से इस प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की है। संगठन का साफ कहना है कि यदि यह कानून अमल में लाया गया, तो पशुओं के प्रति क्रूरता में भारी इजाफा होगा और हमारे जंगल तथा वन्यजीव भी पूरी तरह असुरक्षित हो जाएंगे। नए नियमों में मौजूद इन कानूनी लूपहोल्स का फायदा बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां उठाएंगी, इसलिए किसी भी कीमत पर इन बदलावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पेटा इंडिया का कड़ा रुख और आपत्तियां
पेटा इंडिया का यह भी कहना है कि आज पूरी दुनिया तकनीक के ऐसे दौर में आगे बढ़ रही है जहां वैज्ञानिक अनुसंधानों और एक्सपेरीमेंट्स के लिए पशुओं के इस्तेमाल को लगातार खत्म किया जा रहा है। इसके विपरीत, सरकार के इस नए प्रस्ताव के मंजूर होने के बाद देश में पशुओं पर होने वाले लैब टेस्ट और परीक्षणों की संख्या तेजी से बढ़ेगी और बेजुबान जीवों के खिलाफ क्रूरता की हदें पार होंगी। पेटा की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि पहले के नियम थोड़े नरम जरूर थे, लेकिन यह नया प्रस्ताव सीधे तौर पर पशुओं के हितों के खिलाफ है। इससे परीक्षणों के नाम पर वन्यजीवों को बड़ी संख्या में जंगलों से पकड़कर कैद करने का रास्ता भी खुल जाएगा।
संगठन के अनुसार, सबसे बड़ा खतरा उन बेघर और आवारा पशुओं पर मंडरा रहा है जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। नए नियमों की आड़ में इन मूक जीवों को अत्यधिक शारीरिक पीड़ा, यातना और गंभीर तनाव देने वाले प्रयोगों की अनुमति मिलने लगेगी। यहाँ तक कि यह भी आशंका है कि शैक्षणिक या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए भी पशुओं पर ऐसे प्रयोग किए जाने लगेंगे। यही वजह है कि पेटा इंडिया ने देश के आम नागरिकों से भी पुरजोर अपील की है कि वे आगे आएं और सरकार को अपने सुझाव तथा आपत्तियां भेजें, ताकि यह पता चल सके कि ये नए नियम बेजुबान पशुओं के लिए कितने विनाशकारी साबित हो सकते हैं।
कई सामाजिक संगठनों और हस्तियों का समर्थन
पेटा इंडिया की इस मुहिम को देश के कई प्रमुख सामाजिक संगठनों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और एनिमल लवर्स का भरपूर समर्थन मिल रहा है। इस कड़ी में मेनका गांधी ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि जब दुनिया के विकसित और बड़े देश अपने यहाँ लैब टेस्टिंग में पशुओं के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रहे हैं, ऐसे समय में हमारे देश में इस प्रकार की छूट देना किसी भी लिहाज से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
मेनका गांधी ने आगे कहा कि यदि नियमों में इस प्रकार के नकारात्मक बदलाव किए गए, तो देश-विदेश की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को एनिमल टेस्टिंग का ग्लोबल हब बना देंगी। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव हर दृष्टिकोण से गलत है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि सरकार पशु प्रेमियों की चिंताओं को गंभीरता से समझेगी और इस जनविरोधी प्रस्ताव को वापस लेगी।
जाने-माने एनिमल एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि आज जब पूरी दुनिया AI और आधुनिक तकनीक की रेस में तेजी से आगे निकल रही है, और भारत ने भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है, ऐसे दौर में मूक पशुओं को प्रयोगशाला के परीक्षणों के लिए इस्तेमाल करने का कोई औचित्य ही नहीं बनता है।
जानवरों की बढ़ती मुश्किलें और नैतिक संकट
यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि एनिमल टेस्टिंग के नियमों में होने जा रहे ये बदलाव देश में पशु क्रूरता को बढ़ावा देंगे। ये संशोधन बेजुबान जानवरों को वैज्ञानिक एक्सपेरीमेंट्स के लिए और अधिक आसानी से उपलब्ध करा देंगे। जब संस्थानों की अपनी नैतिकता समितियों को ही जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों के अप्रूवल देने की पूर्ण अथॉरिटी मिल जाएगी, तो इस मनमानी पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं बचेगा।
गौरतलब है कि जानवरों में भी इंसानों की तरह भावनाएं होती हैं, उन्हें भी दर्द, पीड़ा और डर का अहसास होता है, बस फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपनी तकलीफ बोलकर बयां नहीं कर सकते। वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के नाम पर खरगोशों, चूहों, बंदरों और कुत्तों को प्रयोगशालाओं के भीतर तंग पिंजरों में कैद रखना और उनके शरीर में बार-बार सुइयां चुभाना सरासर जुल्म है। इसमें उन बेजुबान मासूमों की रजामंदी या असहमति का तो कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि वे बोल नहीं सकते।
वर्तमान समय की मांग है कि इस पूरे विषय पर बिल्कुल नए सिरे से विचार किया जाए। ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए पशुओं का उपयोग कम से कम हो या फिर ऐसी प्रक्रियाएं अपनाई जाएं जो जीवों को प्रताड़ित न करें। यदि शोध की प्रक्रिया ऐसी हो जिसमें जानवरों पर टेस्ट करने की जरूरत ही न पड़े, तो यह मानवता के लिए सबसे बेहतर होगा। इसके विपरीत, सरकार के इन नए नियमों से तो स्थिति और अधिक बदतर होने की आशंका है।
विदेशी लैब्स का दबाव और आपत्ति दर्ज कराने की समयसीमा
इस नई व्यवस्था और नियमों के बदलाव को लेकर एक बड़ा डर यह भी जताया जा रहा है कि जिन विदेशी देशों में एनिमल टेस्टिंग से जुड़े कानून बेहद सख्त हैं, महंगे हैं या अनुमति मिलना मुश्किल है, वे देश भारत की प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल पशुओं पर एक्सपेरीमेंट कराने के लिए करने लगेंगे। इस प्रकार की तमाम गंभीर चिंताओं को देखते हुए जानवरों के पक्ष में बनाए जा रहे इन नए नियमों के खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए 5 नवंबर की डेडलाइन तय की गई है। यदि कोई भी नागरिक या संगठन इन नए नियमों पर अपना कड़ा विरोध जताना चाहता है, तो वह आसानी से उपलब्ध क्यूआर कोड का उपयोग करके अपनी प्रतिक्रिया सरकार तक पहुंचा सकता है।














