शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह पूरा मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए गए एक ऐसे विचार से जुड़ा है जिसमें महिलाओं से जुड़े कर और इतिहास के एक खास पहलू पर टिप्पणी की गई थी। राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद यह कानूनी लड़ाई सर्वोच्च अदालत तक पहुंची थी, जहां दो जजों की पीठ ने इस पूरी कार्रवाई के तौर-तरीकों पर कड़े सवाल किए।
इतिहास पर अपनी राय रखना अपराध नहीं
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि उस फेसबुक संदेश में ऐसा कुछ भी मौजूद नहीं था जिसे किसी भी तरह से संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा जा सके। उस पोस्ट में मुख्य रूप से यह विचार रखा गया था कि महिलाओं के वक्ष को ढकने पर लगने वाला कर किसी मुगल शासक द्वारा नहीं बल्कि एक ब्राह्मण द्वारा लगाया गया था, और इस बात से समाज को अवगत कराने की बात कही गई थी। इसे एक पूरी तरह से निराधार और महत्वहीन मामला बताते हुए बचाव पक्ष ने राहत की मांग की। इस पर न्यायालय की पीठ ने स्वतः टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि इसी वजह से इस विशेष याचिका पर सुनवाई करना आवश्यक समझा गया। वकील ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह किसी व्यक्ति का इतिहास को देखने का अपना नजरिया हो सकता है, जो भले ही तथ्यात्मक रूप से गलत साबित हो, लेकिन वह किसी भी कानून के तहत जुर्म नहीं बनता।
विवाद की पृष्ठभूमि और पुलिस कार्रवाई
इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के अंतर्गत आने वाले कुंकुरी पुलिस थाने में दर्ज उस प्राथमिकी से हुई है, जिसे भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत पंजीकृत किया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 अप्रैल 2025 के दिन इंटरनेट मीडिया पर हिंदू महिलाओं से संबंधित कुछ ऐसी सामग्री साझा की गई थी जिसे अपमानजनक माना गया। इसके बाद स्थानीय स्तर पर ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष दीपक मिश्रा की तरफ से इस बात की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके उपरांत राज्य के उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2025 और बाद में जुलाई 2026 में उनकी अग्रिम जमानत अर्जी को नामंजूर कर दिया था, जिसके चलते मामला शीर्ष अदालत तक पहुंच गया।
अदालत की नाराजगी और अगली तारीख
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ के एक अन्य सदस्य ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आखिर इस शिकायत में ऐसा क्या आधार मौजूद है जिसके दम पर यह प्राथमिकी दर्ज की गई। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को गंभीर और बड़े मामलों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि ऐसे विषयों पर समय गंवाना चाहिए। फिलहाल सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 4 दिसंबर की तारीख तय की है और तब तक याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान जारी रखी है।



















