निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और आंतरिक निर्णयों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने संस्था के संचालन को लेकर विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि किसी भी संवैधानिक अथवा बहु-सदस्यीय संस्था में सदस्यों के बीच भिन्न राय होना बिल्कुल सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। हालांकि, जब संस्था के निर्णयों की विश्वसनीयता पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े होने लगें, तब आयोग की यह प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह पूरी स्पष्टता से यह बताए कि संबंधित निर्णय किस तरह लिए गए थे। यदि प्रक्रिया पर संशय बना रहता है, तो इससे संस्था की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
फैसलों में बहुमत और सर्वसम्मति की स्थिति
अशोक लवासा ने चुनाव आयोग के अंदर निर्णय लेने के तौर-तरीकों की व्याख्या करते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में सभी फैसले सर्वसम्मति से ही किए जाते हैं। जब किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति नहीं बन पाती, तो अंतिम निर्णय बहुमत के सिद्धांत पर आधारित होता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि तीन सदस्यीय आयोग में दो चुनाव आयुक्त किसी विषय पर एक समान राय रखते हैं, फिर भी अंतिम निर्णय उस राय से भिन्न दिशा में चला जाता है, तो इसके पीछे के ठोस कारणों का खुलासा होना बेहद आवश्यक है।
यदि आयोग का यह पक्ष है कि एसआईआर तथा अन्य नीतिगत निर्णय तीनों आयुक्तों की आपसी रजामंदी से लिए गए थे, तो इस दावे की पुष्टि पारदर्शी दस्तावेजों के माध्यम से होनी चाहिए। लवासा के अनुसार, आयोग को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि यह सहमति किस तारीख को और किस प्रक्रिया के तहत बनी थी। आयोग अपनी बैठकों के आधिकारिक मिनट्स जनता के सम्मुख रखकर या फाइल अप्रूवल का विवरण प्रस्तुत करके यह प्रमाणित कर सकता है कि तीनों आयुक्तों ने कब और किस रूप में अपनी स्वीकृति दी थी।
एसआईआर और तकनीकी प्रणालियों से जुड़ी जटिलताएं
एसआईआर से जुड़े तकनीकी ढांचे पर चर्चा करते हुए लवासा ने कुछ गंभीर तकनीकी और कानूनी पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि यदि आयोग द्वारा लागू किए गए किसी तकनीकी सिस्टम के चलते इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ को अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में बाधा आ रही है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। फील्ड अधिकारियों को कानून के दायरे में रहकर मतदाता सूचियों से जुड़े दायित्व निभाने होते हैं, और किसी भी सॉफ्टवेयर या तकनीकी तंत्र को इसमें रुकावट नहीं बनना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने फॉर्म 6 में कथित बदलावों से जुड़े मुद्दे पर भी सवाल उठाए। लवासा ने कहा कि यदि फॉर्म 6 में किसी भी प्रकार का संशोधन उचित और आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं तथा औपचारिक मंजूरियों के बिना लागू कर दिया गया है, तो यह वैधानिक दृष्टि से अनुचित है। जब कानून के तहत फॉर्म 6 के उपयोग और उसकी प्रक्रिया का एक स्पष्ट नियम पहले से निर्धारित है, लेकिन जमीनी स्तर पर उससे अलग कार्यप्रणाली अपनाई जा रही है, तो आयोग को यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करना होगा कि इस बदलाव का कानूनी आधार क्या था।
कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे जाने की पृष्ठभूमि
चुनाव आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्रों पर बात करते हुए अशोक लवासा ने उस असाधारण परिस्थिति पर भी टिप्पणी की जिसके चलते यह कदम उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह समझना आवश्यक है कि ऐसी क्या नौबत आ गई कि आयोग के आंतरिक प्रशासनिक मामलों को लेकर देश के कैबिनेट सचिव को पत्राचार करना पड़ गया।
लवासा ने स्पष्ट किया कि यदि मामला केवल चुनाव आयोग के आंतरिक कार्य विभाजन या वर्क अलोकेशन से जुड़ा है, तो उसमें कैबिनेट सचिव की कोई सीधी प्रशासनिक भूमिका नहीं होती। इसके विपरीत, यदि केंद्रीय सरकार से प्रतिनियुक्ति या डेप्युटेशन पर आए किसी अधिकारी के आचरण अथवा कार्यप्रणाली को लेकर कोई गंभीर आपत्ति या शिकायत थी और उस संबंध में कैबिनेट सचिव को औपचारिक सूचना दी गई, तो यह प्रशासनिक दृष्टि से एक अलग विषय बन जाता है। इस अंतर को समझा जाना चाहिए।
असहमति की अहमियत और संस्था की विश्वसनीयता
लवासा ने इस धारणा को पूरी तरह खारिज किया कि संस्था के भीतर असहमति होना कोई दोष है। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्था में अलग विचार होना कतई गलत नहीं है। बहु-सदस्यीय निकाय में प्रत्येक सदस्य का हर मसले पर एक ही राय रखना न तो अनिवार्य है और न ही हमेशा संभव। स्वस्थ बहस और मतभेद से ही नए विचार, बेहतर विकल्प और सुधार के रास्ते खुलते हैं। कई बार किसी मसले पर व्यक्त की गई अल्पमत की राय भी भविष्य में बड़े नीतिगत परिवर्तनों का आधार बन जाती है।
इसलिए किसी चुनाव आयुक्त का मुख्य धारा से अलग विचार रखना अपने आप में समस्या नहीं है। लवासा के मुताबिक, मौजूदा हालात में मूल चिंता अलग राय को लेकर नहीं, बल्कि उससे खड़े हुए विवाद और भ्रम को लेकर है। निर्वाचन आयोग जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का लगातार विवादों के घेरे में रहना उसकी प्रतिष्ठा के लिए शुभ संकेत नहीं है। वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब आयोग के काम करने की निष्पक्षता और निर्णयों की प्रक्रिया पर लगातार संदेह उठने लगें, तो आयोग को आगे आकर फाइलों और रिकॉर्ड के जरिए सब कुछ स्पष्ट कर देना चाहिए।





















