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गर्मी और उमस के दोहरे प्रहार से लखनऊ में बढ़ेगा हीट स्ट्रेस, 2050 तक सालाना 4,000 मौतों की चेतावनीउत्तर प्रदेश
26 अग॰ 2026, 11:52 pm (17 दिन पहले)· 3

गर्मी और उमस के दोहरे प्रहार से लखनऊ में बढ़ेगा हीट स्ट्रेस, 2050 तक सालाना 4,000 मौतों की चेतावनी

लखनऊ में तापमान के साथ बढ़ती उमस ने हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ा दिया है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक शहर में गर्मी से होने वाली मौतों में 50 फीसदी इजाफा हो सकता है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बढ़ती गर्मी अब केवल थर्मामीटर के पारे तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके साथ घुलती भारी नमी ने इंसानी सेहत के लिए घातक हीट स्ट्रेस की चुनौती खड़ी कर दी है। वायुमंडल में आर्द्रता का स्तर बढ़ने के कारण अक्सर वास्तविक तापमान सामान्य दिखने के बावजूद मानव शरीर कहीं अधिक भीषण तपन महसूस करता है। प्रतिष्ठित विज्ञान शोध पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित एक गहन रिपोर्ट के चेतावनी भरे निष्कर्ष बताते हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उच्च उत्सर्जन की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो वर्ष 2050 तक लखनऊ में अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली असामयिक मौतों में लगभग 50 फीसदी का इजाफा हो सकता है। शहर के लगातार फैलते दायरे और आबादी के घनत्व को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि लखनऊ में हर साल लगभग 4,000 लोगों की जान अत्यधिक गर्मी और उमस से जुड़ी जटिलताओं के कारण जा सकती है।

सिंधु गंगा के मैदानी इलाके और लखनऊ की भौगोलिक बनावट

ग्लोबल वार्मिंग के वैश्विक असर और स्थानीय मौसम के मिजाज पर चर्चा करते हुए भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के.जे. रमेश ने इस संकट के भौगोलिक कारणों को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के साथ ही सिंधु-गंगा के पूरे मैदानी क्षेत्र की हवा में नमी धारण करने की क्षमता काफी बढ़ गई है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इसी भौगोलिक क्षेत्र के ठीक मध्य में स्थित है। लखनऊ का निचला धरातल और एक बंद कटोरे अथवा बेसिन जैसी प्राकृतिक संरचना हवा के स्वाभाविक प्रवाह को धीमा कर देती है। इस कारण वायुमंडल में मौजूद आर्द्रता लंबी अवधि तक एक ही स्थान पर फंसी रह जाती है। जब हवा में नमी का प्रतिशत अत्यधिक होता है, तब इंसानी त्वचा से पसीना आसानी से नहीं वाष्पीकृत हो पाता। पसीना न सूखने से शरीर की प्राकृतिक तापीय नियंत्रण प्रणाली यानी थर्मोरेगुलेशन पूरी तरह प्रभावित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों में गंभीर सांस संबंधी बीमारियां और तापीय तनाव से जुड़ी अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने लगती हैं।

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एक दशक के आंकड़े: 35 फीसदी बढ़े उमस भरी भीषण गर्मी के दिन

पर्यावरण और जलवायु नीतियों पर शोध करने वाले थिंक टैंक 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के एक विस्तृत आंकड़े लखनऊ की चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2015 से लेकर 2024 के दस सालों के दौरान लखनऊ में ऐसे कुल 289 दिन दर्ज किए गए, जब दिन का अधिकतम तापमान 35 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक था और साथ ही हवा में सापेक्ष आर्द्रता 60 प्रतिशत या उससे ऊपर बनी रही। यदि हम इस दशक को दो पांच-वर्षीय चरणों में बांटकर देखें, तो स्थिति की गंभीरता साफ झलकती है। वर्ष 2015 से 2019 के बीच शहर में ऐसे भीषण उमस वाले 123 दिन रिकॉर्ड किए गए थे, यानी औसतन हर साल लगभग 24.6 दिन। वहीं, वर्ष 2020 से 2024 के अगले पांच वर्षों में यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 166 दिनों तक पहुंच गया। इस प्रकार पिछले पांच सालों में उमस भरी भीषण गर्मी के दिनों में सीधे 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अकेले वर्ष 2020 में रिकॉर्ड 45 दिन ऐसे रहे, जब लोगों को अत्यधिक तापमान और असहनीय उमस का एक साथ सामना करना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा लखनऊ का अनियोजित शहरी विकास, कंक्रीट के बढ़ते जंगल और अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव स्थानीय स्तर पर तापमान को और ज्यादा बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं।

गर्म होती रातें: शरीर को नहीं मिल पा रहा राहत का समय

लखनऊ में गर्मी का संकट सिर्फ दिन के उजाले तक सीमित नहीं है, बल्कि रात के समय का तापमान भी लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। जलवायु आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 के दौरान लखनऊ में 126 गर्म रातें दर्ज की गईं। इससे पहले वर्ष 2015 में 124 गर्म रातें और वर्ष 2016 में 128 ऐसी रातें दर्ज की गई थीं। यहां तक कि वर्ष 2018 में, जब इस दशक में गर्म रातों की संख्या सबसे कम रही, तब भी आंकड़ा 93 रातों पर था। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि रात के तापमान का असामान्य रूप से ऊंचा रहना अब कोई अपवाद नहीं बल्कि एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जब रात का तापमान ठंडा नहीं होता, तब मानव शरीर को दिनभर झेली गई भीषण गर्मी के असर और शारीरिक तनाव से उबरने के लिए आवश्यक कूलिंग टाइम नहीं मिल पाता। इससे अगले दिन के लिए शरीर की सहनशक्ति और कमजोर हो जाती है।

हीट स्ट्रोक का बढ़ा खतरा और सरकारी नीतियों में बदलाव की मांग

वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक सीमा जावेद ने नमी और गर्मी के इस खतरनाक मेल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वायुमंडल में अत्यधिक नमी के कारण शरीर से पसीने का वाष्पीकरण रुक जाता है। पसीना न सूखने से शरीर की आंतरिक शीतलन प्रक्रिया ठप पड़ जाती है, जिससे तुलनात्मक रूप से कम थर्मामीटर तापमान पर भी लोगों को अचानक हीट स्ट्रोक होने का जोखिम बहुत बढ़ जाता है। वैज्ञानिक सीमा जावेद का कहना है कि जनमानस को यह स्वीकार करना होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक गर्मियों का दौर खत्म हो चुका है। अब इस नई भीषण वास्तविकता का मुकाबला करने के लिए निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी वालों और अन्य खुले में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों की कार्य स्थितियों एवं काम के घंटों से जुड़ी सरकारी नीतियों में व्यापक बदलाव करना होगा, साथ ही सामाजिक और सामुदायिक स्तर पर आपातकालीन तैयारियां सुनिश्चित करनी होंगी।

काम के घंटों का नुकसान और अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा

एनआरडीसी इंडिया में जलवायु अनुकूलनशीलता एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अभियंत तिवारी ने आंकड़ों के विश्लेषण पर चिंता जताते हुए कहा कि 2015-19 और 2020-24 की अवधि के बीच उमस भरे दिनों में 35 फीसदी का उछाल बेहद गंभीर चेतावनी है। दिन की नमी और रात के लगातार उच्च तापमान का असर सीधे तौर पर देश की कार्यबल उत्पादकता पर पड़ रहा है। जब हवा का वेट बल्ब ग्लोब तापमान (WBGT) 30 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है, तब असुरक्षित गर्मी के कारण सालाना कुल कार्य घंटों का लगभग 20 फीसदी हिस्सा प्रभावित होने लगता है। यदि शहर में प्रदूषण का स्तर भी बहुत अधिक हो, तो कार्य समय का यह नुकसान बढ़कर 30 से 40 फीसदी तक पहुंच सकता है। कार्य उत्पादकता में इस बड़ी गिरावट के कारण स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को हर साल अरबों डॉलर का वित्तीय नुकसान होने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों की सर्वसम्मत राय है कि लखनऊ की भावी एक्शन प्लान नीति में केवल अधिकतम तापमान मापने के बजाय हवा की नमी, रात के ऊंचे तापमान, अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सुरक्षा को प्राथमिक आधार बनाया जाना चाहिए।

सवाल-जवाब

लखनऊ में वर्ष 2050 तक गर्मी से मौतों का क्या अनुमान है?
अध्ययन के अनुसार, उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 2050 तक लखनऊ में गर्मी से होने वाली मौतों में 50 फीसदी की वृद्धि हो सकती है, जिससे हर साल लगभग 4,000 असामयिक मौतों की आशंका है।
सिंधु-गंगा के मैदान में होने से लखनऊ पर उमस का क्या प्रभाव पड़ता है?
लखनऊ की कम ऊंचाई और कटोरी जैसी भौगोलिक बनावट हवा के प्रवाह को रोकती है, जिससे नमी फंसी रहती है और पसीना न सूखने के कारण शरीर का प्राकृतिक कूलिंग तंत्र प्रभावित होता है।
पिछले दशक में लखनऊ में उमस भरे दिनों की संख्या में कितनी बढ़ोतरी हुई है?
वर्ष 2015-19 में जहां औसतन 123 उमस भरे दिन दर्ज किए गए थे, वहीं 2020-24 में यह संख्या 35 फीसदी बढ़कर 166 दिन पहुंच गई। वर्ष 2020 में रिकॉर्ड 45 ऐसे दिन रहे।
लखनऊ में गर्म रातों की क्या स्थिति रही है?
वर्ष 2024 में लखनऊ में 126 गर्म रातें दर्ज की गईं, जबकि 2015 में 124 और 2016 में 128 ऐसी रातें दर्ज हुई थीं। गर्म रातें रहने से शरीर को दिन की तपन से उबरने का मौका नहीं मिलता।
वेट बल्ब ग्लोब तापमान (WBGT) 30 डिग्री सेल्सियस पार करने पर क्या असर होता है?
जब WBGT 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, तो असुरक्षित गर्मी के कारण सालाना काम के लगभग 20 फीसदी घंटों का नुकसान होता है, जो उच्च प्रदूषण में 30 से 40 फीसदी तक पहुंच सकता है।
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टिप्पणियाँ 5

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·16 दिन पहले

अंक ज्योतिष और प्राकृतिक संतुलन के गणितीय नियमों के अनुसार, प्रकृति का यह असंतोष आने वाले दशकों में मानव जीवन पर भारी पड़ेगा। वर्ष 2050 का अंक योग और जलवायु डेटा की यह वृद्धि दर्शाती है कि यदि हमने समय रहते अपने रहन-सहन और पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण में आध्यात्मिक और समग्र सुधार नहीं किए, तो भौगोलिक बेसिन और बढ़ती उष्णता का यह चक्र शहर की जीवनक्षमता को गंभीर रूप से बाधित कर देगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·16 दिन पहले

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, शहरी नियोजन और सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर राजनीतिक चुनौती बन चुका है। सिन्धु-गंगा के मैदानी इलाकों में बढ़ती उमस और हीट स्ट्रेस सीधे तौर पर प्रशासनिक प्राथमिकताओं में बदलाव की मांग करते हैं। यदि समय रहते नीति निर्माताओं ने ज़मीनी कार्ययोजना नहीं बनाई, तो वर्ष 2050 तक संभावित मानवीय क्षति हमारी शासन व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगी। अब यह आवश्यक है कि मास्टर प्लान में हीट एक्शन को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाए।

Ravikash Gupta@ravikash·16 दिन पहले

अर्जुन की इस बात को आगे बढ़ाते हुए यह समझना होगा कि इस तरह का भीषण हीट स्ट्रेस केवल मानवीय क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारी श्रम उत्पादकता, सप्लाई चेन और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ेगा। जब लगातार बढ़ते तापमान और उमस के कारण मजदूरों की कार्यक्षमता घटेगी, तो उत्तर भारत के इस प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र में लॉजिस्टिक्स, निर्माण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को भारी आर्थिक आघात पहुंचेगा। यदि शहरी विकास योजनाओं में इसे वित्तीय जोखिम के रूप में शामिल नहीं किया गया, तो भविष्य में कॉर्पोरेट निवेश और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·16 दिन पहले

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरणीय चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की शहरी नीतियों और बुनियादी ढांचे के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। जिस तरह से बेसिन जैसी भौगोलिक बनावट और बढ़ती आबादी के कारण लखनऊ में उमस भरे दिनों में 35 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, वह प्रशासनिक स्तर पर तत्काल एक्शन प्लान की मांग करती है। यदि समय रहते अर्बन हीट आइलैंड को नियंत्रित करने, हरित आवरण बढ़ाने और शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह संकट जनस्वास्थ्य और श्रम उत्पादकता पर भारी पड़ेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 दिन पहले

रोहन ने शहरी नियोजन और जलवायु संकट का सही मुद्दा उठाया है, लेकिन एक क्राइम और कानून-व्यवस्था संवाददाता के दृष्टिकोण से यह केवल पर्यावरणीय या स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय में प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। हीटवेव और उमस के कारण होने वाली संभावित मौतों, विशेषकर निर्माण श्रमिकों और खुले में काम करने वाले तबके के बीच, लापरवाही और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन से जुड़े कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं। जब तक प्रशासन आपदा प्रबंधन और श्रम कानूनों के तहत सख्त नियम लागू नहीं करता, तब तक जनजीवन की यह क्षति गंभीर कानूनी और मानवाधिकार के मामलों में तब्दील हो सकती है।

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