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ग्लोबल कूटनीति में ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव, 50% आबादी और 45% जीडीपी के साथ बना ग्लोबल साउथ का मजबूत मंचभारत
16 सित॰ 2026, 4:31 pm (15 दिन पहले)· 0

ग्लोबल कूटनीति में ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव, 50% आबादी और 45% जीडीपी के साथ बना ग्लोबल साउथ का मजबूत मंच

पूर्व राजनयिकों के अनुसार ब्रिक्स दुनिया की आधी आबादी और 45 प्रतिशत जीडीपी का प्रतिनिधित्व करते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज बन चुका है। यह मंच टकराव के बजाय शांतिपूर्ण संवाद पर केंद्रित है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बदलते परिवेश में ब्रिक्स संगठन का प्रभाव लगातार मजबूत हो रहा है। पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे के अनुसार, यह सम्मेलन दुनिया के उन देशों को सशक्त मंच प्रदान कर रहा है जिन्हें लंबे समय से वैश्विक पटल पर अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया था। यह समूह अब दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी और करीब 45 प्रतिशत जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे वैश्विक मामलों में इसकी भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

ग्लोबल साउथ की आवाज और दायरे का विस्तार

ब्रिक्स का दायरा अब केवल इसके शुरुआती संस्थापक देशों तक सीमित नहीं रह गया है। शुरुआत में पांच देशों के साथ शुरू हुए इस संगठन में हाल के दिनों में 5 से 6 नए सदस्य देश शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा विश्व के कई अन्य राष्ट्र भी इस समूह का हिस्सा बनने या फिर सहयोगी सदस्य के रूप में जुड़ने की निरंतर इच्छा जता रहे हैं।

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इस समूह में शामिल होने वाले नए देशों में से अधिकांश वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ से आते हैं। चीन और रूस जैसी प्रमुख वैश्विक शक्तियों और कुछ विकसित देशों को छोड़ दें, तो इस मंच पर अधिकांश हिस्सेदारी विकासशील राष्ट्रों की ही है। इस वजह से यह संगठन व्यापक गुटनिरपेक्ष आंदोलन के भीतर एक अत्यंत प्रभावशाली और नई आवाज के रूप में उभर रहा है।

पश्चिम विरोधी दृष्टिकोण के बिना साझा हितों की सुरक्षा

वैश्विक मामलों में ब्रिक्स की भूमिका किसी विरोधी गुट के रूप में काम करने के बजाय अपने साझा हितों को सामने रखने पर केंद्रित रही है। सुधीर टी देवरे ने स्पष्ट किया कि यह सम्मेलन किसी भी देश या पश्चिम विरोधी भावना से प्रेरित नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य राष्ट्रों के साझा मुद्दों, प्राथमिकताओं और आर्थिक विकास की जरूरतों को वैश्विक स्तर पर रेखांकित करना है।

सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें किसी भी प्रकार का टकराव या विवाद सामने नहीं आया। पूरा ध्यान शांतिपूर्ण संवाद और आपसी सहयोग पर केंद्रित रहा। यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही ब्रिक्स की असली ताकत है, जो आने वाले वर्षों में भी विकासशील देशों के हितों को एक संगठित और शांतिपूर्ण तरीके से उठाने का काम करता रहेगा।

विदेश नीति निर्माण में आईसीडब्ल्यूए की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत के कूटनीतिक रुख को तय करने में भारतीय विश्व मामला परिषद (आईसीडब्ल्यूए) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। सुधीर टी देवरे ने बताया कि एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में आईसीडब्ल्यूए विश्वविद्यालयों, अकादमिक निकायों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को एक मंच पर लाता है।

यह संस्थान बदलती वैश्विक परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए भारत की विदेश नीति को नए विचार और दृष्टिकोण प्रदान करता है। भारत की प्राथमिकताओं और नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, यह परिषद खुले विचार-विमर्श और अकादमिक चर्चाओं के माध्यम से राजनयिक अनुभवों को समृद्ध बनाने का काम कर रही है।

अफ़्रीकी नेतृत्व के साथ भारत का रणनीतिक संवाद

ब्रिक्स सम्मेलन के अवसर पर भारत और अफ़्रीकी देशों के बीच संबंधों को भी एक नई दिशा मिली। नाइजीरिया में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और अल्जीरिया व नॉर्वे में पूर्व राजदूत महेश सचदेव, आईएफएस (सेवानिवृत्त) ने सम्मेलन के दौरान हुई उच्च स्तरीय बैठकों की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि इस दौरान अफ़्रीकी महाद्वीप के चार देशों के प्रमुखों ने सम्मेलन में भाग लिया और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। इन चार देशों में से तीन देश इजिप्ट, इथियोपिया और साउथ अफ्रीका पहले ही ब्रिक्स के पूर्णकालिक सदस्य बन चुके हैं। चौथा देश बुरुंडी था, जिसके राष्ट्रपति को अफ़्रीकी यूनियन के अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया था। इन शीर्ष नेताओं की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई चर्चाओं ने भारत और अफ़्रीकी राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक व रणनीतिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ किया है।

सवाल-जवाब

ब्रिक्स वैश्विक आबादी और जीडीपी का कितना हिस्सा कवर करता है?
ब्रिक्स समूह दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी और करीब 45 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है।
क्या ब्रिक्स एक पश्चिम विरोधी संगठन है?
नहीं, पूर्व राजनयिकों के अनुसार ब्रिक्स पश्चिम विरोधी समूह नहीं है, बल्कि यह केवल अपने सदस्य देशों और ग्लोबल साउथ के प्राथमिकताओं व हितों को बढ़ावा देने वाला शांतिपूर्ण मंच है।
हाल के दिनों में ब्रिक्स में कितने नए देश शामिल हुए हैं?
मूल पांच संस्थापक देशों के अलावा हाल में 5 से 6 नए सदस्य देश ब्रिक्स में शामिल हुए हैं और कई अन्य देश जुड़ने की प्रक्रिया में हैं।
सम्मेलन के दौरान किन अफ़्रीकी देशों के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की?
सम्मेलन के दौरान इजिप्ट, इथियोपिया, साउथ अफ्रीका और अफ़्रीकी यूनियन के अध्यक्ष के रूप में बुरुंडी के शीर्ष नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय बातचीत की।
विदेश नीति में आईसीडब्ल्यूए की क्या भूमिका है?
भारतीय विश्व मामला परिषद (आईसीडब्ल्यूए) राजनयिकों, शोधकर्ताओं और अकादमिक क्षेत्र को एक मंच पर लाकर भारत की विदेश नीति के निर्माण और नए विचारों के विकास में योगदान देता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·14 दिन पहले

वैश्विक मंचों पर टकराव के बजाय शांतिपूर्ण संवाद और सहयोग की नीति केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया की आधी आबादी के मानसिक कल्याण और सामाजिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। जब बहुपक्षीय संगठन विरोधी गुट बनने की जगह साझा हितों और विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो इससे वैश्विक तनाव कम होता है। इस तरह का सहयोगात्मक दृष्टिकोण आम नागरिकों के जीवन स्तर और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को मजबूत करने में दूरगामी भूमिका निभाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·14 दिन पहले

यह रिपोर्ट ब्रिक्स के बढ़ते जनसांख्यिकी और आर्थिक प्रभाव को सटीक रूप से रेखांकित करती है। जब यह समूह वैश्विक आबादी के 50% और जीडीपी के 45% का प्रतिनिधित्व करता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश प्राथमिकताओं और आर्थिक कूटनीति के वैश्विक समीकरणों में बदलाव आना तय है। टकराव के बजाय साझा विकास और शांतिपूर्ण संवाद पर ध्यान केंद्रित करने की यह रणनीति आने वाले समय में वैश्विक वित्तीय प्रणाली और बहुपक्षीय मंचों पर बहुध्रुवीय संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·14 दिन पहले

रविकाश जी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह समझना महत्वपूर्ण है कि ब्रिक्स का यह विस्तार केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बहुपक्षीय वैश्विक संस्थानों के पुनर्गठन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ है। जब ग्लोबल साउथ के देश एक मंच पर आकर आर्थिक और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देते हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापारिक निकायों पर समावेशी सुधारों के लिए दबाव बढ़ता है। भारत के दृष्टिकोण से, यह मंच किसी गुटबाज़ी में शामिल हुए बिना अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने और वैश्विक नीति-निर्माण में विकासशील देशों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने का एक सशक्त रणनीतिक माध्यम बनता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आर्थिक सहयोग का यह दायरा जब बढ़ता है, तो इसका सीधा असर सीमा पार कानूनी प्रक्रियाओं, साइबर सुरक्षा और वैश्विक अपराध नियंत्रण की व्यवस्थाओं पर भी पड़ता है। कूटनीतिक रूप से एकजुट होते देश अगर भविष्य में प्रत्यर्पण संधियों, मनी लॉन्ड्रिंग रोकने और संगठित अपराध के खिलाफ साझा कानूनी ढांचे मजबूत करते हैं, तो सार्वजनिक सुरक्षा को वैश्विक स्तर पर बड़ी मदद मिलेगी। लेख में आर्थिक आंकड़ों के साथ-साथ इन बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से कानूनी एवं सुरक्षा सहयोग की बढ़ती आवश्यकता पर प्रकाश डालना आगे के विश्लेषण को और अधिक व्यापक बनाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 दिन पहले

करण द्वारा उठाए गए सुरक्षा और कानूनी पहलुओं को आगे बढ़ाते हुए, ब्रिक्स के इस भू-राजनीतिक विस्तार का वास्तविक प्रभाव वैश्विक शासन संस्थानों के सुधार पर पड़ेगा। 50% आबादी और 45% जीडीपी का रणनीतिक वजन समूह को केवल एक संवाद मंच से आगे बढ़ाकर बहुध्रुवीय व्यवस्था को आकार देने की शक्ति देता है। भारत के लिए इस मंच के जरिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए नीतिगत आम सहमति बनाना सबसे महत्वपूर्ण होगा। लेख में वैश्विक संस्थागत सुधारों और नीतिगत संरेखण की इन चुनौतियों का विश्लेषण शामिल करने से रिपोर्ट अधिक व्यापक बनेगी।

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