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ग्लोबल शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी नीचे, आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने जताई चिंताभारत
24 सित॰ 2026, 2:26 pm (1 दिन पहले)· 0

ग्लोबल शिपबिल्डिंग में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी नीचे, आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने जताई चिंता

वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण में भारत की हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम है, जबकि चीन अकेले 55 फीसदी जहाज तैयार करता है। आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने इस भारी अंतर को रेखांकित करते हुए घरेलू क्षमता विस्तार की आवश्यकता बताई है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जहाज निर्माण के क्षेत्र में भारत और चीन के बीच एक बेहद असमान अंतर देखने को मिलता है। एक तरफ जहां चीन दुनिया के कुल जहाजों में से 55 फीसदी अकेले तैयार करता है, वहीं भारत की हिस्सेदारी अभी एक प्रतिशत से भी नीचे सिमटी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने इस आंकड़े को सामने रखते हुए देश में जहाज निर्माण क्षमता को तेजी से बढ़ाने पर बल दिया है। उनका कहना है कि इस बड़े अंतर को पाटने के लिए भारत को अपने समुद्री विनिर्माण क्षेत्र पर बेहद गंभीरता से काम करना होगा।

बुनियादी ताकत के बावजूद नीतिगत ढांचा बनी रुकावट

भारत के पास समुद्री विनिर्माण क्षेत्र में उतरने और विस्तार करने के लिए कई प्राकृतिक और औद्योगिक फायदे पहले से उपलब्ध हैं। देश में कामगारों की भारी संख्या मौजूद है और भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक राष्ट्र है। इस प्रकार कच्चा माल और मानव संसाधन दोनों प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद घरेलू शिपबिल्डिंग रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। सान्याल के अनुसार, इस क्षमता का समुचित उपयोग न हो पाने का असली कारण मौजूदा कार्यप्रणाली और उद्योग को नियंत्रित करने वाला नियामक ढांचा है। उन्होंने सुझाव दिया कि जब तक निजी क्षेत्र को खुलकर भागीदारी करने के स्पष्ट रास्ते नहीं मिलेंगे, तब तक बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल होगा।

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मानसिकता में बदलाव और समुद्री भूगोल की समझ जरूरी

ऐतिहासिक और पारंपरिक तौर पर भारत अक्सर खुद को जमीन से घिरे हुए एक विशाल भूभाग के रूप में देखता रहा है। सान्याल का मानना है कि यही संकुचित दृष्टिकोण हमारी समुद्री संभावनाओं के आड़े आता है। भारत को अपनी असल भौगोलिक स्थिति को पहचानने और समुद्री ताकतों के संदर्भ में नए सिरे से आंकने की जरूरत है। आर्थिक और रणनीतिक नजरिए से देखने पर भारत लगभग एक द्वीप जैसी विशिष्ट स्थिति में दिखाई देता है। इस दृष्टिकोण से हमारे सीधे और स्वाभाविक पड़ोसी केवल जमीनी सीमा वाले मुल्क नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे देश भी बन जाते हैं, जिनके साथ हमारा गहरा ऐतिहासिक और व्यापारिक नाता रहा है।

विदेशी जहाजों पर 95 फीसदी व्यापार की निर्भरता का जोखिम

वर्तमान समय में भारत का विदेशी व्यापार बहुत हद तक समुद्री रास्तों पर ही टिका हुआ है। कुल आयात-निर्यात में मात्रा के लिहाज से 95 प्रतिशत व्यापार और मूल्य के पैमाने पर 75 प्रतिशत लेन-देन जहाजों के माध्यम से संपन्न होता है। इस पूरे तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि इस समुद्री ढुलाई का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी शिपिंग कंपनियों के जहाजों द्वारा संचालित होता है। सान्याल ने आगाह किया कि विदेशी जहाजों पर यह अत्यधिक निर्भरता देश की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। यदि दुनिया की तीन-चार प्रमुख शिपिंग कंपनियां किसी कारणवश सेवाएं रोक दें, तो किसी औपचारिक प्रतिबंध के बिना भी देश के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

सवाल-जवाब

दुनिया के जहाज निर्माण बाजार में चीन और भारत की हिस्सेदारी कितनी है?
चीन अकेले दुनिया के 55 फीसदी जहाज बनाता है, जबकि भारत की हिस्सेदारी इस वैश्विक निर्माण में एक प्रतिशत से भी कम है।
भारत में पर्याप्त इस्पात और मजदूर होने के बाद भी जहाज निर्माण क्यों नहीं बढ़ पाया?
संजीव सान्याल के अनुसार, इस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला नियामक ढांचा और कार्य करने का तरीका ही क्षमता विस्तार में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है।
भारत का कितना व्यापार समुद्री मार्गों और जहाजों पर निर्भर है?
भारत का कुल व्यापार मात्रा के हिसाब से 95 प्रतिशत और कुल मूल्य के आधार पर 75 प्रतिशत जहाजों के जरिए होता है।
विदेशी शिपिंग कंपनियों पर अधिक निर्भरता से भारत के सामने क्या जोखिम है?
यदि दुनिया की तीन-चार प्रमुख शिपिंग कंपनियां सेवाएं देने से इनकार कर दें, तो भारत बिना किसी औपचारिक प्रतिबंध के भी बड़े आर्थिक संकट में फंस सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·20 घंटे पहले

लोकल लेवल पर खानापूरी और कच्चे माल की कोई कमी नहीं है, फिर भी ऐसी इंडस्ट्रीज में हम पिछड़ रहे हैं तो कहीं न कहीं नियमों का बहुत पेच है। जब तक सरकार घरेलू कंपनियों को खुलकर काम नहीं करने देगी, तब तक बात नहीं बनेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

अस्सी फीसदी व्यापार समंदर के रास्ते होता है और अपने पास एक भी बड़ा जहाज नहीं है। ये बात वाकई सोचने वाली है कि हम अब तक क्या कर रहे थे।

Priya Sharma@priya-sharma·1 दिन पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने। पिछले साल जब मैं सिंगापुर गई थी, वहाँ बंदरगाह पर सिर्फ विदेशी जहाजों का कब्ज़ा देख कर ही अहसास हुआ था कि हम समुद्र के रास्ते व्यापार में कितने पीछे छूट गए हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

संजीव सान्याल जी की बात सही है कि चीन बहुत आगे है, पर बात सिर्फ नियम बदलने की नहीं है। हमारे यहां बंदरगाहों पर काम की रफ्तार और पैसों के लेन-देन में जो दिक्कतें हैं, उन्हें रातों-रात ठीक करना मुमकिन नहीं लगता।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

करण, बात सिर्फ रफ्तार या पैसों की नहीं है। जब तक कच्चा माल और लेबर होने के बावजूद नियम नहीं बदलेंगे, तब तक कुछ नहीं सुधरेगा।

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