अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जहाज निर्माण के क्षेत्र में भारत और चीन के बीच एक बेहद असमान अंतर देखने को मिलता है। एक तरफ जहां चीन दुनिया के कुल जहाजों में से 55 फीसदी अकेले तैयार करता है, वहीं भारत की हिस्सेदारी अभी एक प्रतिशत से भी नीचे सिमटी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने इस आंकड़े को सामने रखते हुए देश में जहाज निर्माण क्षमता को तेजी से बढ़ाने पर बल दिया है। उनका कहना है कि इस बड़े अंतर को पाटने के लिए भारत को अपने समुद्री विनिर्माण क्षेत्र पर बेहद गंभीरता से काम करना होगा।
बुनियादी ताकत के बावजूद नीतिगत ढांचा बनी रुकावट
भारत के पास समुद्री विनिर्माण क्षेत्र में उतरने और विस्तार करने के लिए कई प्राकृतिक और औद्योगिक फायदे पहले से उपलब्ध हैं। देश में कामगारों की भारी संख्या मौजूद है और भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक राष्ट्र है। इस प्रकार कच्चा माल और मानव संसाधन दोनों प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद घरेलू शिपबिल्डिंग रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। सान्याल के अनुसार, इस क्षमता का समुचित उपयोग न हो पाने का असली कारण मौजूदा कार्यप्रणाली और उद्योग को नियंत्रित करने वाला नियामक ढांचा है। उन्होंने सुझाव दिया कि जब तक निजी क्षेत्र को खुलकर भागीदारी करने के स्पष्ट रास्ते नहीं मिलेंगे, तब तक बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल होगा।
मानसिकता में बदलाव और समुद्री भूगोल की समझ जरूरी
ऐतिहासिक और पारंपरिक तौर पर भारत अक्सर खुद को जमीन से घिरे हुए एक विशाल भूभाग के रूप में देखता रहा है। सान्याल का मानना है कि यही संकुचित दृष्टिकोण हमारी समुद्री संभावनाओं के आड़े आता है। भारत को अपनी असल भौगोलिक स्थिति को पहचानने और समुद्री ताकतों के संदर्भ में नए सिरे से आंकने की जरूरत है। आर्थिक और रणनीतिक नजरिए से देखने पर भारत लगभग एक द्वीप जैसी विशिष्ट स्थिति में दिखाई देता है। इस दृष्टिकोण से हमारे सीधे और स्वाभाविक पड़ोसी केवल जमीनी सीमा वाले मुल्क नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे देश भी बन जाते हैं, जिनके साथ हमारा गहरा ऐतिहासिक और व्यापारिक नाता रहा है।
विदेशी जहाजों पर 95 फीसदी व्यापार की निर्भरता का जोखिम
वर्तमान समय में भारत का विदेशी व्यापार बहुत हद तक समुद्री रास्तों पर ही टिका हुआ है। कुल आयात-निर्यात में मात्रा के लिहाज से 95 प्रतिशत व्यापार और मूल्य के पैमाने पर 75 प्रतिशत लेन-देन जहाजों के माध्यम से संपन्न होता है। इस पूरे तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि इस समुद्री ढुलाई का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी शिपिंग कंपनियों के जहाजों द्वारा संचालित होता है। सान्याल ने आगाह किया कि विदेशी जहाजों पर यह अत्यधिक निर्भरता देश की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। यदि दुनिया की तीन-चार प्रमुख शिपिंग कंपनियां किसी कारणवश सेवाएं रोक दें, तो किसी औपचारिक प्रतिबंध के बिना भी देश के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।























