राजनीतिक दलों के पंजीकरण और कर छूट के नियमों की आड़ में एक सुनियोजित वित्तीय फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है, जहां चुनाव आयोग में पंजीकृत होकर कागजी पार्टियों ने करोड़ों रुपये की कर चोरी को अंजाम दिया। इन दलों का चुनावी जीत-हार से कोई सरोकार नहीं था, बल्कि इनका एकमात्र मकसद चेक के माध्यम से दान स्वीकार कर, अपना कमीशन काटकर शेष राशि नकद में वापस लौटाना था। न कोई जमीनी कार्यकर्ता और न ही कोई संगठनात्मक ढांचा, ये दल महज एक या दो कमरों के परिसरों से संचालित हो रहे थे और चुनाव में केवल औपचारिकता के लिए प्रत्याशी उतारते थे।
फर्जी पार्टियों के जरिए करोड़ों रुपये की कर चोरी का खेल
आयकर कानून के प्रावधानों के अनुसार किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल को दिया गया चंदा आयकर छूट के दायरे में आता है। इसी कानूनी प्रावधान का दुरुपयोग कर इस पूरे नेटवर्क को खड़ा किया गया था। कुछ दलों को एक हजार करोड़ रुपये, कुछ को साढ़े पांच सौ करोड़ रुपये और कुछ को ढाई सौ करोड़ रुपये तक का चंदा दिखाया गया। अब अहमदाबाद अपराध शाखा ने प्राथमिकी दर्ज कर इस वित्तीय हेराफेरी में शामिल लोगों और इन कागजी दलों के संचालकों की तलाश तेज कर दी है।
भारतीय नेशनल जनता दल नामक संगठन यह धोखाधड़ी पिछले दस वर्षों से कर रहा था। वर्ष 2019 और 2024 के आम चुनावों से पहले करीब 56 हजार लोगों द्वारा इस दल को चंदे के रूप में 1143 करोड़ रुपये दिए गए। संगठन का कार्यालय दो कमरों के एक फ्लैट में चल रहा था, और जांच शुरू होने पर इसके कर्ताधर्ता दफ्तर पर ताला लगाकर फरार हो गए। आयकर विभाग द्वारा पिछले चार वर्षों से की जा रही तहकीकात के आधार पर 4 अलग-अलग प्राथमिकियां दर्ज कराई गई हैं।
शेल कंपनियों और छोटे चेकों का नेटवर्क
जांच के दायरे में आई एक अन्य पार्टी स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पार्टी है, जिसे 519 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ था। आयकर विभाग ने इस दल से जुड़े एक सनदी लेखाकार मुकेश खत्री के ठिकानों पर छापेमारी की, जहां से विभिन्न दलों को मिले चंदे से संबंधित दस्तावेज बरामद किए गए। स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेन्द्र तिवारी समेत तीन लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है और तीनों वर्तमान में लापता हैं। इसी प्रकार गरीब कल्याण पार्टी नामक एक अन्य संगठन को पिछले तीन वर्षों में 206 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जिसका कार्यालय भी ताला बंद पाया गया।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार यह वित्तीय जाल काफी जटिल था। इसमें किसी एक व्यक्ति से भारी रकम का चेक लेने के बजाय हजारों व्यक्तियों के नाम पर छोटी-छोटी राशियों के चेक लिए जाते थे। इसके बाद यह धन दर्जनों मुखौटा कंपनियों में स्थानांतरित किया जाता था। कंपनियों के खातों से विभिन्न खर्चों के नाम पर नकद निकासी की जाती थी और अपना कमीशन काटकर चंदा देने वालों को बाकी रकम नकद लौटा दी जाती थी। लाखों बैंक खातों और सैकड़ों मुखौटा कंपनियों के शामिल होने के कारण इस वित्तीय प्रवाह को चिन्हित करना बेहद पेचीदा कार्य था।
राजनीतिक संबंध और जांच के तथ्य
जब गुजरात में फर्जी राजनीतिक दलों और कर चोरी की यह जानकारी सार्वजनिक हुई, तो कुछ हलकों में यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि इन फर्जी कंपनियों और दलों का संबंध सत्तारूढ़ दल से है। चूंकि यह विषय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित हुआ, इसलिए तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। हालांकि राज्य सरकार द्वारा कराई गई जांच और आयकर विभाग की शिकायत पर की गई सीआईडी पड़ताल में इन दावों का खंडन हुआ।
बैंक खातों और दस्तावेजों की विस्तृत जांच से स्पष्ट हुआ कि इस पूरे प्रकरण का कोई राजनीतिक संबंध नहीं था। यह पूरी तरह से मुखौटा कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और कागजी चंदों के जरिए आयकर बचाने के लिए रचा गया एक अवैध वित्तीय गोरखधंधा था।
उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण और भ्रामक वीडियो पर कार्रवाई
मध्य प्रदेश के उज्जैन में विकास कार्यों को लेकर सामाजिक तनाव भड़काने का प्रयास किया गया। सोशल मीडिया पर इमरान खान और साजिद खान नामक व्यक्तियों के खातों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जनित फर्जी वीडियो प्रसारित किए गए। मोचीवाड़ा निवासी साजिद खान ने एक रील पोस्ट कर दावा किया कि शाही मस्जिद को गिराने की तैयारी हो चुकी है और जेसीबी मौके पर पहुंच गई है, साथ ही लोगों से वहां पहुंचने का आह्वान किया। वहीं मोचीवाड़ा के ही इमरान ने जेसीबी और पोकलेन मशीनों के दृश्य डालकर मस्जिद को गिराने की अफवाह फैलाई।
इसके अलावा गुलरेज खान, बिल्लू पठान और आरिफ पठान नामक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने भड़काऊ सामग्री तैयार की और शाही जामा मस्जिद की तुलना बाबरी मस्जिद से की। इन वीडियो को इंस्टाग्राम और फेसबुक पर 100 से अधिक खातों के माध्यम से प्रसारित किया गया, जिससे एक उग्र भीड़ एकत्र हो गई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 8 प्राथमिकियां दर्ज कीं और बिल्लू पठान, गुलरेज खान, आरिफ, साजिद और इमरान सहित 20 लोगों को गिरफ्तार किया।
धार्मिक स्थलों के हिस्सों को हटाने पर प्रशासनिक स्पष्टीकरण
उज्जैन के जिलाधिकारी रोशन कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि अब शहर में पूरी तरह शांति है और नागरिक प्रशासन का सहयोग कर रहे हैं। सिंहस्थ कुंभ के दृष्टिगत मार्गों का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसके तहत निजी भवनों के साथ-साथ कुल 30 धार्मिक स्थलों के सड़क पर आ रहे हिस्सों को हटाया गया है। जिलाधिकारी ने जोर देकर कहा कि इन 30 स्थलों में 20 से अधिक मंदिर शामिल हैं, इसलिए यह धारणा गलत है कि कार्रवाई केवल किसी एक समुदाय के स्थल पर हो रही है।
सड़क चौड़ीकरण की जद में आए प्रमुख मंदिरों में 250 वर्ष पुराना चिंताहरण गणेश मंदिर और 150 वर्ष पुराना संकट मोचन हनुमान मंदिर शामिल हैं। श्रद्धालुओं ने सिंहस्थ कुंभ में साधुओं की शाही सवारी के मार्ग को सुगम बनाने के लिए भारी मन से स्वयं प्रतिमाएं हटाकर संरचना के चिह्नित हिस्सों को हटाया। इसके अतिरिक्त 100 वर्ष पुराने राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर का 10 फीट हिस्सा और कोतवाली मार्ग पर स्थित 80 वर्ष पुराने मां सिंह भवानी मंदिर का 12 फीट हिस्सा हटाया गया है, जबकि कई मंदिरों को अन्यत्र स्थानांतरित किया जा रहा है। शाही मस्जिद का सड़क सीमा में आने वाला हिस्सा भी मस्जिद कमेटी के सदस्यों द्वारा आपसी सहमति से हटाया गया। प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच समन्वय के बावजूद कुछ बाहरी तत्वों ने मामले को तूल देने का प्रयास किया और यह मुद्दा दिल्ली में भी उठाया गया।
सनातन परंपरा और राजनीतिक बयानबाजी
धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थाओं को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी तीखी बहस देखने को मिली। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक सार्वजनिक बयान में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में 'जय श्रीराम' का नारा लगाते हैं लेकिन 'हर हर महादेव' नहीं बोलते। उन्होंने दावा किया कि दक्षिण भारत में भगवान शिव की पूजा की जाती है जो गरीबों के देवता हैं, जबकि उत्तर भारत में भगवान राम को माना जाता है जो अमीरों के देवता हैं।
इस टिप्पणी पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। गोरखपुर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा को क्षेत्र, जाति अथवा आर्थिक आधार पर बांटने वाले उसके सबसे बड़े विरोधी हैं। उन्होंने समाज को विभाजित करने वाले तत्वों से सतर्क रहने का आह्वान किया। भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में भगवान राम और भगवान शिव एक-दूसरे के पूरक और आराधक माने जाते हैं, तथा प्रधानमंत्री काशी विश्वनाथ की नगरी का प्रतिनिधित्व करते हैं जहां 'हर हर महादेव' का उद्घोष सामान्य परंपरा का हिस्सा है।












